महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 931, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाकुले निवेष्टव्यं सदृशे वा युधिष्ठिर । अवरा पतिता चैव न ग्राह्या भूतिमिच्छता ॥ १३५ ॥ युधिष्ठिर! अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अपनी अपेक्षा महान् या समान कुलमें विवाह करना चाहिये। नीच जातिवाली तथा पतिता कन्याका पाणिग्रहण कदापि नहीं करना चाहिये ॥ १३५ ॥
अग्नीनुत्पाद्य यत्नेन क्रियाः सुविहिताश्च याः । वेदे च ब्राह्मणैः प्रोक्तास्ताश्च सर्वाः समाचरेत् ॥ १३६ ॥ (अरणी-मन्थनद्वारा) अग्निका उत्पादन एवं स्थापन करके ब्राह्मणोंद्वारा बतायी हुई सम्पूर्ण वेदविहित क्रियाओंका यत्नपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये ॥ १३६ ॥
न चेर्ष्या स्त्रीषु कर्तव्या रक्ष्या दाराश्च सर्वशः । अनायुष्या भवेदीर्ष्या तस्मादीर्ष्यां विवर्जयेत् ॥ १३७ ॥ सभी उपायोंसे अपनी स्त्रीकी रक्षा करनी चाहिये। स्त्रियोंसे ईर्ष्या रखना उचित नहीं है। ईर्ष्या करनेसे आयु क्षीण होती है। इसलिये उसे त्याग देना ही उचित है ॥ १३७ ॥
अनायुष्यं दिवा स्वप्नं तथाभ्युदितशायिता । प्रगे निशामाशु तथा नैवोच्छिष्टाः स्वपन्ति वै ॥ १३८ ॥ दिनमें एवं सूर्योदयके पश्चात् शयन आयुको क्षीण करनेवाला है। प्रातःकाल एवं रात्रिके आरम्भमें नहीं सोना चाहिये। अच्छे लोग रातमें अपवित्र होकर नहीं सोते हैं ॥ १३८ ॥
पारदार्यमनायुष्यं नापितोच्छिष्टता तथा । यत्नतो वै न कर्तव्यमभ्यासश्चैव भारत ॥ १३९ ॥ परस्त्रीसे व्यभिचार करना और हजामत बनवाकर बिना नहाये रह जाना भी आयुका नाश करनेवाला है। भारत! अपवित्रावस्थामें वेदोंका अध्ययन यत्नपूर्वक त्याग देना चाहिये ॥ १३९ ॥
संध्यायां च न भुञ्जीत न स्नायेन्न तथा पठेत् । प्रयतश्च भवेत् तस्यां न च किंचित् समाचरेत् ॥ १४० ॥ संध्याकालमें स्नान, भोजन और स्वाध्याय कुछ भी न करे। उस बेलामें शुद्ध चित्त होकर ध्यान एवं उपासना करनी चाहिये। दूसरा कोई कार्य नहीं करना चाहिये ॥ १४० ॥
ब्राह्मणान् पूजयेच्चापि तथा स्नात्वा नराधिप । देवांश्च प्रणमेत् स्नातो गुरूंश्चाप्यभिवादयेत् ॥ १४१ ॥ नरेश्वर! ब्राह्मणोंकी पूजा, देवताओंको नमस्कार और गुरुजनोंको प्रणाम स्नानके बाद ही करने चाहिये ॥
अनिमन्त्रितो न गच्छेत यज्ञं गच्छेत दर्शकः । अनर्चिते ह्यानायुष्यं गमनं तत्र भारत ॥ १४२ ॥