महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 932, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंबिना बुलाये कहीं भी न जाय, परंतु यज्ञ देखनेके लिये मनुष्य बिना बुलाये भी जा सकता है। भारत! जहाँ अपना आदर न होता हो, वहाँ जानेसे आयुका नाश होता है ॥ १४२ ॥
न चैकेन परिव्रज्यं न गन्तव्यं तथा निशि ।
अनागतायां संध्यायां पश्चिमायां गृहे वसेत् ॥ १४३ ॥
अकेले परदेश जाना और रातमें यात्रा करना मना है। यदि किसी कामके लिये बाहर जाय तो संध्या होनेके पहले ही घर लौट आना चाहिये ॥ १४३ ॥
मातुः पितुर्गुरूणां च कार्यमेवानुशासनम् ।
हितं चाप्यहितं चापि न विचार्यं नरर्षभ ॥ १४४ ॥
नरश्रेष्ठ! माता-पिता और गुरुजनोंकी आज्ञाका अविलम्ब पालन करना चाहिये। इनकी आज्ञा हितकर है या अहितकर, इसका विचार नहीं करना चाहिये ॥
धनुर्वेदे च वेदे च यत्नः कार्यो नराधिप ।
हस्तिपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च रथचर्यासु चैव ह ॥ १४५ ॥
यत्नवान् भव राजेन्द्र यत्नवान् सुखमेधते ।
अप्रधृष्यश्च शत्रूणां भृत्यानां स्वजनस्य च ॥ १४६ ॥
नरेश्वर! क्षत्रियको धनुर्वेद और वेदाध्ययनके लिये यत्न करना चाहिये। राजेन्द्र! तुम हाथी-घोड़ेकी सवारी और रथ हाँकनेकी कलामें निपुणता प्राप्त करनेके लिये प्रयत्नशील बनो, क्योंकि यत्न करनेवाला पुरुष सुखपूर्वक उन्नतिशील होता है। वह शत्रुओं, स्वजनों और भृत्योंके लिये दुर्धर्ष हो जाता है ॥ १४५-१४६ ॥
प्रजापालनयुक्तश्च न क्षतिं लभते क्वचित् ।
युक्तिशास्त्रं च ते ज्ञेयं शब्दशास्त्रं च भारत ॥ १४७ ॥
जो राजा सदा प्रजाके पालनमें तत्पर रहता है, उसे कभी हानि नहीं उठानी पड़ती। भरतनन्दन! तुम्हें तर्कशास्त्र और शब्दशास्त्र दोनोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ १४७ ॥
गान्धर्वशास्त्रं च कलाः परिज्ञेया नराधिप ।
पुराणमितिहासाश्च तथाख्यानानि यानि च ॥ १४८ ॥
महात्मनां च चरितं श्रोतव्यं नित्यमेव ते ।
नरेश्वर! गान्धर्वशास्त्र (संगीत) और समस्त कलाओंका ज्ञान प्राप्त करना भी तुम्हारे लिये आवश्यक है। तुम्हें प्रतिदिन पुराण, इतिहास, उपाख्यान तथा महात्माओंके चरित्रका श्रवण करना चाहिये ॥ १४८½ ॥
(मान्यानां माननं कुर्यान्निन्द्यानां निन्दनं तथा ।
गोब्राह्मणार्थे युध्येत प्राणानपि परित्यजेत् ॥)
राजा माननीय पुरुषोंका सम्मान और निन्दनीय मनुष्योंकी निन्दा करे। वह गौओं तथा ब्राह्मणोंके लिये युद्ध करे। उनकी रक्षाके लिये आवश्यकता हो तो प्राणोंको भी निछावर कर