भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 933, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 933

दे ।।

पत्नी रजस्वला या च नाभिगच्छेन्न चाह्वयेत् ॥ १४९ ॥
स्नातां चतुर्थे दिवसे रात्रौ गच्छेद् विचक्षणः ।
पञ्चमे दिवसे नारी षष्ठेऽहनि पुमान् भवेत् ॥ १५० ॥
अपनी पत्नी भी रजस्वला हो तो उसके पास न जाय और न उसे ही अपने पास बुलाये। जब चौथे दिन वह स्नान कर ले, तब रातमें बुद्धिमान् पुरुष उसके पास जाय। पाँचवें दिन गर्भाधान करनेसे कन्याकी उत्पत्ति होती है और छठे दिन पुत्रकी अर्थात् समरात्रिमें गर्भाधानसे पुत्रका और विषमरात्रिमें गर्भाधान होनेसे कन्याका जन्म होता है ॥ १४९-१५० ॥

एतेन विधिना पत्नीमुपगच्छेत् पण्डितः ।
ज्ञातिसम्बन्धिमित्राणि पूजनीयानि सर्वशः ॥ १५१ ॥
इसी विधिसे विद्वान् पुरुष पत्नीके साथ समागम करे। भाई-बन्धु, सम्बन्धी और मित्र—इन सबका सब प्रकारसे आदर करना चाहिये ॥ १५१ ॥

यष्टव्यं च यथाशक्ति यज्ञैर्विविधदक्षिणैः ।
अत ऊर्ध्वमरण्यं च सेवितव्यं नराधिप ॥ १५२ ॥
अपनी शक्तिके अनुसार भाँति-भाँतिकी दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये। नरेश्वर! तदनन्तर गार्हस्थ्यकी अवधि समाप्त हो जानेपर वानप्रस्थके नियमोंका पालन करते हुए वनमें निवास करना चाहिये ॥ १५२ ॥

एष ते लक्षणोद्देश आयुष्याणां प्रकीर्तितः ।
शेषस्त्रैविद्यवृद्धेभ्यः प्रत्याहार्यो युधिष्ठिर ॥ १५३ ॥
युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने तुमसे आयुकी वृद्धि करनेवाले नियमोंका संक्षेपसे वर्णन किया है। जो नियम बाकी रह गये हैं, उन्हें तुम तीनों वेदोंके ज्ञानमें बढ़े-चढ़े ब्राह्मणोंसे पूछकर जान लेना ॥ १५३ ॥

आचारो भूतिजनन आचारः कीर्तिवर्धनः ।
आचाराद् वर्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १५४ ॥
सदाचार ही कल्याणका जनक और सदाचार ही कीर्तिको बढ़ानेवाला है। सदाचारसे आयुकी वृद्धि होती है और सदाचार ही बुरे लक्षणोंका नाश करता है ॥ १५४ ॥

आगमानां हि सर्वेषामाचारः श्रेष्ठ उच्यते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मादायुर्र्विवर्धते ॥ १५५ ॥
सम्पूर्ण आगमोंमें सदाचार ही श्रेष्ठ बतलाया जाता है। सदाचारसे धर्मकी उत्पत्ति होती है और धर्मसे आयु बढ़ती है ॥ १५५ ॥

एतद् यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् ।
अनुकम्प्य सर्ववर्णान् ब्रह्मणा समुदाहृतम् ॥ १५६ ॥