महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 954, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंदीप्तसूर्याग्नितेजोभिर्दिव्यमालाभिरेव च ।। ४१ ।। नीयते रुद्रकन्याभिः सोऽन्तरिक्षं सनातनम् । अष्टादश सहस्राणि वर्षाणां कल्पमेव च ।। ४२ ।। कोटीशतसहस्रं च तेषु लोकेषु मोदते । तथा वह पुण्डरीकके समान श्वेत वर्णोंका विमान पाता है। दीप्तिमान् सूर्य और अग्निके समान तेजस्विनी और दिव्यमालाधारिणी रुद्रकन्याएँ उसे सनातन अन्तरिक्ष-लोकमें ले जाती हैं और वहाँ वह एक कल्प लाख करोड़ एवं अठारह हजार वर्षोंतक सुख भोगता है ।।
यस्तु संवत्सरं भुङ्क्ते दशाहे वै गते गते ।। ४३ ।। सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । ब्रह्मकन्यानिवासे च सर्वभूतमनोहरे ।। ४४ ।। अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् । रूपवत्यश्च तं कन्या रमयन्ति सनातनम् ।। ४५ ।। जो एक वर्षतक दस-दस दिन बीतनेपर एक बार भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह सम्पूर्ण भूतोंके लिये मनोहर ब्रह्मकन्याओंके निवास-स्थानमें जाकर एक हजार अश्व-मेध यज्ञोंका परम उत्तम फल पाता है और उस सनातन पुरुषका वहाँकी रूपवती कन्याएँ मनोरंजन करती हैं ।।
नीलोत्पलनिभैर्वर्णै रक्तोत्पलनिभैस्तथा । विमानं मण्डलावर्तमावर्तगहनाकुलम् ।। ४६ ।। सागरोर्मिप्रतीकाशं लभेद यानमनुत्तमम् । विचित्रमणिमालाभिर्नादितं शंखनिःस्वनैः ।। ४७ ।। वह नीले और लाल कमलके समान अनेक रंगोंसे सुशोभित, मण्डलाकार घूमनेवाला, भँवरके समान गहन चक्कर लगानेवाला, सागरकी लहरोंके समान ऊपर-नीचे होनेवाला, विचित्र मणिमालाओंसे अलंकृत और शंखध्वनिसे परिपूर्ण सर्वोत्तम विमान प्राप्त करता है ।।
स्फाटिकैर्वज्रसारैश्च स्तम्भैः सुकृतवेदिकम् । आरोहति महद् यानं हंससारसनादितम् ।। ४८ ।। उसमें स्फटिक और वज्रसारमणिके खम्भे लगे होते हैं। उसपर सुन्दर ढंगसे बनी हुई वेदी शोभा पाती है तथा वहाँ हंस और सारस पक्षी कलरव करते रहते हैं। ऐसे विशाल विमानपर चढ़ता और स्वच्छन्द घूमता है ।।
एकादशे तु दिवसे यः प्राप्ते प्राश्ते हविः । सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ।। ४९ ।। परस्त्रियं नाभिलषेद् वाचाथ मनसापि वा ।