भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 953, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 953

सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । सरस्वतीं गोपमानो ब्रह्मचर्यं समाचरन् ॥ ३३ ॥ सुमनोवर्णकं चैव मधुमांसं च वर्जयन् । पुरुषो मरुतां लोकमिन्द्रलोकं च गच्छति ॥ ३४ ॥ जो बारह महीनोंतक प्रति सातवें दिन एक समय भोजन करता, प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता, वाणीको संयममें रखता और ब्रह्मचर्यका पालन करता एवं फूलोंकी माला, चन्दन, मधु और मांसका सदाके लिये त्याग कर देता है, वह पुरुष मरुद्गणों तथा इन्द्रके लोकमें जाता है ॥ ३२—३४ ॥ तत्र तत्र हि सिद्धार्थो देवकन्याभिरर्च्यते । फलं बहुसुवर्णस्य यज्ञस्य लभते नरः ॥ ३५ ॥ संख्यामतिगुणां चापि तेषु लोकेषु मोदते । उन सभी स्थानोंमें सफलमनोरथ होकर वह देवकन्याओंद्धारा पूजित होता है तथा जिस यज्ञमें बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा दी जाती है, उसके फलको वह प्राप्त कर लेता है और असंख्य वर्षोंतक वह उन लोकोंमें आनन्द भोगता है ॥ ३५ १/२ ॥ यस्तु संवत्सरं क्षान्तो भुङ्क्तेऽहन्यष्टमे नरः ॥ ३६ ॥ देवकार्यपरो निन्यं जुह्वानो जातवेदसम् । पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ३७ ॥ जो एक वर्षतक प्रति आठवें दिन एक बार भोजन करता, सबके प्रति क्षमाभाव रखता, देवताओंके कार्यमें तत्पर रहता और नित्यप्रति अग्निहोत्र करता है, उसे पौण्डरीक यागका सर्वश्रेष्ठ फल मिलता है ॥ ३६-३७ ॥ पद्मवर्णनिभं चैव विमानमधिरोहति । कृष्णाः कनकगौरैश्च नार्यः श्यामास्तथापराः ॥ ३८ ॥ वयोरूपविलासिन्यो लभते नात्र संशयः । वह कमलके समान वर्णवाले विमानपर चढ़ता है और वहाँ उसे श्यामवर्णा, सुवर्णसदृश गौर वर्णवाली, सोलह वर्षकी-सी अवस्थावाली और नूतन यौवन तथा मनोहर रूप-विलाससे सुशोभित देवांगनाएँ प्राप्त होती हैं। इसमें संशय नहीं है ॥ ३८ १/२ ॥ यस्तु संवत्सरं भुङ्क्ते नवमे नवमेऽहनि ॥ ३९ ॥ सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ४० ॥ जो एक वर्षतक नौ-नौ दिनपर एक समय भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञका परम उत्तम फल प्राप्त होता है ॥ ३९-४० ॥ पुण्डरीकप्रकाशं च विमानं लभते नरः ।

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