भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 952, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 952

जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर पाँचवें दिन एक समय भोजन करता है और लोभहीन, सत्यवादी, ब्राह्मणभक्त, अहिंसक और अदोषदर्शी होकर सदा पापकर्मोंसे दूर रहता है, उसे द्वादशाह यज्ञका फल प्राप्त होता है ।। २२-२३ १/२ ।। जाम्बूनदमयं दिव्यं विमानं हंसलक्षणम् ।। २४ ।। सूर्यमालासभासमारोहेत् पाण्डुरं गृहम् । आवर्तनानि चत्वारि तथा पद्मानि द्वादश ।। २५ ।। शराग्निपरिमाणं च तत्रासौ वसते सुखम् । वह सूर्यकी किरणमालाओंके समान प्रकाशमान तथा जाम्बूनद नामक सुवर्णके बने हुए श्वेतकान्तिवाले हंसलक्षित दिव्य विमानपर आरूढ़ होता तथा चार, बारह एवं पैंतीस (कुल मिलाकर इक्यावन) पद्म वर्षोंतक स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है ।। २४-२५ १/२ ।। दिवसे यस्तु षष्ठे वै मुनिः प्राशेत भोजनम् ।। २६ ।। सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । सदा त्रिषवणस्नायी ब्रह्मचार्यनसूयकः ।। २७ ।। गवां मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् । जो बारह महीनेतक सदा अग्निहोत्र करता, तीनों संध्याओंके समय स्नान करता, ब्रह्मचर्यका पालन करता, दूसरोंके दोष नहीं देखता तथा मुनिवृत्तिसे रहकर प्रति छठे दिन एक बार भोजन करता है, वह गोमेध यज्ञका सर्वोत्तम फल पाता है ।। २६-२७ १/२ ।। अग्निज्वालासभासं हंसबर्हिणसेवितम् ।। २८ ।। शातकुम्भसमायुक्तं साधयेद् यानमुत्तमम् । तथैवाप्सरसामङ्के प्रतिसुप्तः प्रबोध्यते ।। २९ ।। नूपुराणां निनादेन मेखलानां च निःस्वनैः । उसे अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान, हंस और मयूरोंसे सेवित, सुवर्णजटित उत्तम विमान प्राप्त होता है और वह अप्सराओंके अंकमें सोकर उन्हींके कांचीकलाप तथा नूपुरोंकी मधुर ध्वनिसे जगाया जाता है ।। कोटीसहस्रं वर्षाणां त्रीणि कोटिशतानि च ।। ३० ।। पद्मान्यष्टादश तथा पताके द्वे तथैव च । अयुतानि च पञ्चाशदृक्षचर्मशतस्य च ।। ३१ ।। लोम्नां प्रमाणेन समं ब्रह्मलोके महीयते । वह मनुष्य दो पताका (महापद्म), अठारह पद्म, एक हजार तीन सौ करोड़ और पचास अयुत वर्षोंतक तथा सौ रीछोंके चमड़ोंमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक ब्रह्मलोकमें सम्मानित होता है ।। ३०-३१ १/२ ।। दिवसे सप्तमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम् ।। ३२ ।।

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