महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 955, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनृतं च न भाषेत मातापित्रोः कृतेपि वा ॥ ५० ॥ अभिगच्छेन्महादेवं विमानस्थं महाबलम् । अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ५१ ॥ जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ प्रति ग्यारहवें दिन एक बार हविष्यान्न ग्रहण करता है, मन-वाणीसे भी कभी परस्त्रीकी अभिलाषा नहीं करता है और माता-पिताके लिये भी कभी झूठ नहीं बोलता है, वह विमानमें विराजमान परम शक्तिमान् महादेवजीके समीप जाता और हजार अश्वमेध यज्ञोंका सर्वोत्तम फल पाता है ॥ ४९—५१ ॥
स्वायम्भुवं च पश्येत विमानं समुपस्थितम् । कुमार्यः काञ्चनाभासा रूपवत्यो नयन्ति तम् ॥ ५२ ॥ रुद्राणां तमधीवासं दिवि दिव्यं मनोहरम् । वह अपने पास ब्रह्माजीका भेजा हुआ विमान स्वतः उपस्थित देखता है। सुवर्णके समान रंगवाली रूपवती कुमारियाँ उसे उस विमानद्वारा द्युलोकमें दिव्य मनोहर रुद्रलोकमें ले जाती हैं ॥ ५२ १/२ ॥
वर्षाण्यपरिमेयानि युगान्ताग्निसमप्रभः ॥ ५३ ॥ कोटीशतसहस्रं च दशकोटिशतानि च । रुद्रं नित्यं प्रणमते देवदानवसम्मत्तम् ॥ ५४ ॥ स तस्मै दर्शनं प्राप्तो दिवसे दिवसे भवेत् । वहाँ वह प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी शरीर धारण करके असंख्य वर्षोंतक एक लाख एक हजार करोड़ वर्षोंतक निवास करता हुआ प्रतिदिन देवदानव-सम्मानित भगवान् रुद्रको प्रणाम करता है। वे भगवान् उसे नित्य-प्रति दर्शन देते रहते हैं ॥
दिवसे द्वादशे यस्तु प्राप्ते वै प्राशते हविः ॥ ५५ ॥ सदा द्वादशमासान् वै सर्वमेधफलं लभेत् । जो बारह महीनोंतक प्रति बारहवें दिन केवल हविष्यान्न ग्रहण करता है, उसे सर्वमेध यज्ञका फल मिलता है ॥ ५५ १/२ ॥
आदित्यद्वादशं तस्य विमानं संविधीयते ॥ ५६ ॥ मणिमुक्ताप्रवालैश्च महार्हैरुपशोभितम् । हंसमालापरिक्षिप्तं नागवीथीसमाकुलम् ॥ ५७ ॥ मयूरैश्चक्रवाकैश्च कूजद्भिरुपशोभितम् । अट्टैर्महद्भिः संयुक्तं ब्रह्मलोके प्रतिष्ठितम् ॥ ५८ ॥ नित्यमावसथं राजन् नरनारीसमावृतम् । ऋषिरेवं महाभागस्त्वङ्गिरा प्राह धर्मवित् ॥ ५९ ॥