महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 957, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजिनके यौवन तथा रूपका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी देवकन्याएँ तपाये हुए शुद्ध स्वर्णके अंगद (बाजूबन्द) और अन्यान्य अलंकार धारण करके विमानोंद्वारा उस पुरुषकी सेवामें उपस्थित होती हैं ॥ ६६ ॥
कलहंसविनिर्घोषैर्नूपुराणां च निःस्वनैः ।
काञ्चीनां च समुत्कर्षैस्तत्र तत्र निबोध्यते ॥ ६७ ॥
वह सो जानेपर कलहंसोंके कलरवों, नूपुरोंकी मधुर झनकारों तथा काञ्चीकी मनोहर ध्वनियोंद्वारा जगाया जाता है ॥ ६७ ॥
देवकन्यानिवासे च तस्मिन् वसति मानवः ।
जाह्नवीवालुकाकीर्णं पूर्णं संवत्सरं नरः ॥ ६८ ॥
वह मानव देवकन्याओंके उस निवासस्थानमें उतने वर्षोंतक निवास करता है, जितने कि गंगाजीमें बालूके कण हैं ॥ ६८ ॥
यत्तु पक्षे गते भुङ्क्ते एकभक्तं जितेन्द्रियः ।
सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् ॥ ६९ ॥
राजसूयसहस्रस्य फलं प्राप्नोत्यनुत्तमम् ।
यानमारोहते दिव्यं हंसबर्हिणसेवितम् ॥ ७० ॥
जो जितेन्द्रिय पुरुष बारह महीनोंतक प्रति पंद्रहवें दिन एक बार खाता और प्रतिदिन अग्निहोत्र करता है, वह एक हजार राजसूय यज्ञका सर्वोत्तम फल पाता है और हंस तथा मोरोंसे सेवित दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है ॥ ६९-७० ॥
मणिमण्डलकैश्चित्रं जातरूपसमावृतम् ।
दिव्याभरणशोभाभिर्वरस्त्रीभिरलंकृतम् ॥ ७१ ॥
वह विमान सुवर्णपत्रसे जटिल तथा मणिमय मण्डलाकार चिह्नोंसे विचित्र शोभासम्पन्न है। दिव्य वस्त्राभूषणोंसे शोभायमान सुन्दरी रमणियाँ उसे सुशोभित किये रहती है ॥ ७१ ॥
एकस्तम्भं चतुर्द्वारं सप्तभौमं सुमंगलम् ।
वैजयन्तीसहस्रैश्च शोभितं गीतनिःस्वनैः ॥ ७२ ॥
उस विमानमें एक ही खम्भा होता है, चार दरवाजे लगे होते हैं। वह सात तल्लोंसे युक्त एवं परममंगलमय विमान सहस्रों वैजयन्ती पताकाओंसे सुशोभित तथा गीतोंकी मधुर-ध्वनिसे व्याप्त होता है ॥
दिव्यं दिव्यगुणोपेतं विमानमधिरोहति ।
मणिमुक्ताप्रवालैश्च भूषितं वैद्युतप्रभम् ॥ ७३ ॥
वसेद् युगसहस्रं च खड्गकुञ्जरवाहनः ।