महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 958, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमणि, मोती और मूँगोंसे विभूषित वह दिव्य विमान विद्युत्की-सी प्रभासे प्रकाशित तथा दिव्य गुणोंसे सम्पन्न होता है। वह व्रतधारी पुरुष उसी विमानपर आरूढ़ होता है। उसमें गेंडे और हाथी जुते होते हैं तथा वहाँ एक सहस्र युगोंतक वह निवास करता है।। ७३ १/२ ।। षोडशे दिवसे प्राप्ते यः कुर्यादेकभोजनम् ।। ७४ ।। सदा द्वादशमासान् वै सोमयज्ञफलं लभेत् । जो बारह महीनोंतक प्रति सोलहवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे सोमयागका फल मिलता है।। सोमकन्यानिवासेषु सोऽध्यावसति नित्यशः ।। ७५ ।। सौम्यगन्धानुलिप्तश्च कामकारगतिर्भवेत् । वह सोम-कन्याओंके महलोंमें नित्य निवास करता है, उसके अंगोंमें सौम्य गन्धयुक्त अनुलेप लगाया जाता है। वह अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ चाहता है, घूमता है।। सुदर्शनाभिनारीभिर्मधुराभिस्तथैव च ।। ७६ ।। अर्च्यते वै विमानस्थः कामभोगैश्च सेव्यते । वह विमानपर विराजमान होता है और देखनेमें परम सुन्दरी तथा मधुरभाषिणी दिव्य नारियाँ उसकी पूजा करती तथा उसे काम-भोगका सेवन कराती हैं।। फलं पद्मशतप्रख्यं महाकल्पं दशाधिकम् ।। ७७ ।। आवर्तनानि चत्वारि साधयेच्चाप्यसौ नरः । वह पुरुष सौ पद्म वर्षोंके समान दस महाकल्प तथा चार चतुर्युगीतक अपने पुण्यका फल भोगता है।। ७७ १/२ ।। दिवसे सप्तदशमे यः प्राप्ते प्राश्नाते हविः ।। ७८ ।। सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । स्थानं वारुणमैन्द्रं च रौद्रं वाप्यधिगच्छति ।। ७९ ।। मारुतौशनसे चैव ब्रह्मलोकं स गच्छति । तत्र दैवतकन्याभिरासनेनोपचर्यते ।। ८० ।। जो मनुष्य बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ सोलह दिन उपवास करके सत्रहवें दिन केवल हविष्यान्न भोजन करता है, वह वरुण, इन्द्र, रुद्र, मरुत, शुक्राचार्यजी तथा ब्रह्माजीके लोकमें जाता है और उन लोकोंमें देवताओंकी कन्याएँ आसन देकर उसका पूजन करती हैं।। ७८—८० ।। भूर्भुवं चापि देवर्षिं विश्वरूपमवेक्षते । तत्र देवाधिदेवस्य कुमार्यो रमयन्ति तम् ।। ८१ ।। द्वात्रिंशद् रूपधारिण्यो मधुराः समलंकृताः ।