भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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पृष्ठ 959

वह पुरुष भूर्लोक, भुवर्लोक तथा विश्वरूपधारी देवर्षिका वहाँ दर्शन करता है और देवाधिदेवकी कुमारियाँ उसका मनोरंजन करती हैं। उनकी संख्या बत्तीस है। वे मनोहर रूपधारिणी, मधुरभाषिणी तथा दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत होती हैं॥ ८१ १/२॥
चन्द्रादित्यावुभौ यावद् गगने चरतः प्रभो॥ ८२॥
तावच्चरत्यसौ धीरः सुधामृतरसाशनः।
प्रभो! जबतक आकाशमें चन्द्रमा और सूर्य विचरते हैं, तबतक वह धीर पुरुष सुधा एवं अमृतरसका भोजन करता हुआ ब्रह्मलोकमें विहार करता है॥ ८२ १/२॥
अष्टादशे यो दिवसे प्राश्नीयादेकभोजनम्॥ ८३॥
सदा द्वादशमासान् वै सप्तलोकान् स पश्यति।
जो लगातार बारह महीनोंतक प्रति अठारहवें दिन एक बार भोजन करता है, वह भू आदि सातों लोकोंका दर्शन करता है॥ ८३ १/२॥
रथैः सनन्दिघोषैश्च पृष्ठतः सोऽनुगम्यते॥ ८४॥
देवकन्याधिरूढैस्तु भ्राजमानैः स्वलंकृतैः।
उसके पीछे आनन्दपूर्वक जयघोष करते हुए बहुत-से तेजस्वी एवं सजे-सजाये रथ चलते हैं। उन रथोंपर देवकन्याएँ बैठी होती हैं॥ ८४ १/२॥
व्याघ्रसिंहप्रयुक्तं च मेघस्वननिनादितम्॥ ८५॥
विमानमुत्तमं दिव्यं सुसुखी ह्याधिरोहति।
उसके सामने व्याघ्र और सिंहोंसे जुता हुआ तथा मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाला दिव्य एवं उत्तम विमान प्रस्तुत होता है, जिसपर वह अत्यन्त सुखपूर्वक आरोहण करता है॥ ८५ १/२॥
तत्र कल्पसहस्रं स कन्याभिः सह मोदते॥ ८६॥
सुधारयं च भुञ्जीत मृतोपममुत्तमम्।
उस दिव्य लोकमें वह एक हजार कल्पोंतक देवकन्याओंके साथ आनन्द भोगता और अमृतके समान उत्तम सुधारसका पान करता है॥ ८६ १/२॥
एकोनविंशतिदिने यो भुङ्क्ते एकभोजनम्॥ ८७॥
सदा द्वादशमासान् वै सप्तलोकान् स पश्यति।
जो लगातार बारह महीनोंतक उन्नीसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह भी भू आदि सातों लोकोंका दर्शन करता है॥ ८७ १/२॥
उत्तमं लभते स्थानमप्सरोगणसेवितम्॥ ८८॥
गन्धर्वरुपगीतं च विमानं सूर्यवर्चसम्।
उसे अप्सराओंद्वारा सेवित उत्तम स्थान—गन्धर्वोंके गीतोंसे गूँजता हुआ सूर्यके समान तेजस्वी विमान प्राप्त होता है॥ ८८ १/२॥