महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 960, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्रामरवरस्त्रीभिर्मोदते विगतज्वरः ॥ ८९ ॥ दिव्याम्बरधरः श्रीमानयुतानां शतं शतम् । उस विमानमें वह सुन्दरी देवांगनाओंके साथ आनन्द भोगता है। उसे कोई चिन्ता तथा रोग नहीं सताते। दिव्यवस्त्रधारी और श्रीसम्पन्न रूप धारण करके वह दस करोड़ वर्षोंतक वहाँ निवास करता है ॥ ८९ १/२ ॥
पूर् parse: पूर्णेऽथ विंशे दिवसे यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् ॥ ९० ॥ सदा द्वादशमासांस्तु सत्यवादी धृतव्रतः । अमांसाशी ब्रह्मचारी सर्वभूतहिते रतः ॥ ९१ ॥ स लोकान् विपुलान् रम्यानादित्यानामुपाश्नुते । जो लगातार बारह महीनेतक पूरे बीस दिनपर एक बार भोजन करता, सत्य बोलता, व्रतका पालन करता, मांस नहीं खाता, ब्रह्मचर्यका पालन करता तथा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहता है, वह सूर्यदेवके विशाल एवं रमणीय लोकोंमें जाता है ॥ ९०-९१ १/२ ॥
गन्धर्वरप्सरोभिश्च दिव्यमाल्यानुलेपनैः ॥ ९२ ॥ विमानैः काञ्चनैर्हृद्यैः पृष्ठतश्चानुगम्यते । उसके पीछे-पीछे दिव्यमाला और अनुलेपन धारण करनेवाले गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे सेवित सोनेके मनोरम विमान चलते हैं ॥ ९२ १/२ ॥
एकविंशे तु दिवसे यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् ॥ ९३ ॥ सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । लोकमौशनसं दिव्यं शक्रलोकं च गच्छति ॥ ९४ ॥ अश्विनोर्मरुतां चैव सुखेष्वभिरतः सदा । अनभिज्ञश्च दुःखानां विमानवरमास्थितः ॥ ९५ ॥ सेव्यमानो वरस्त्रीभिः क्रीडत्यमरवत् प्रभुः । जो लगातार बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ इक्कीसवें दिनपर एक बार भोजन करता है, वह शुक्राचार्य तथा इन्द्रके दिव्यलोकमें जाता है। इतना ही नहीं, उसे अश्विनीकुमारों और मरुद्गणोंके लोकोंकी भी प्राप्ति होती है। उन लोकोंमें वह सदा सुख भोगनेमें ही तत्पर रहता है। दुःखोंका तो वह नाम भी नहीं जानता है और श्रेष्ठ विमानपर विराजमान हो सुन्दरी स्त्रियोंसे सेवित होता हुआ शक्तिशाली देवताके समान क्रीड़ा करता है ॥ ९३—९५ १/२ ॥
द्वाविंशे दिवसे प्राप्ते यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् ॥ ९६ ॥ सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । अहिंसानिरतो धीमान् सत्यवागनसूयकः ॥ ९७ ॥ लोकान् वसूनामाप्नोति दिवाकरसमप्रभः । कामचारी सुधाहारो विमानवरमास्थितः ॥ ९८ ॥