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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

तत्रामरवरस्त्रीभिर्मोदते विगतज्वरः ॥ ८९ ॥ दिव्याम्बरधरः श्रीमानयुतानां शतं शतम् । उस विमानमें वह सुन्दरी देवांगनाओंके साथ आनन्द भोगता है। उसे कोई चिन्ता तथा रोग नहीं सताते। दिव्यवस्त्रधारी और श्रीसम्पन्न रूप धारण करके वह दस करोड़ वर्षोंतक वहाँ निवास करता है ॥ ८९ १/२ ॥

पूर् parse: पूर्णेऽथ विंशे दिवसे यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् ॥ ९० ॥ सदा द्वादशमासांस्तु सत्यवादी धृतव्रतः । अमांसाशी ब्रह्मचारी सर्वभूतहिते रतः ॥ ९१ ॥ स लोकान् विपुलान् रम्यानादित्यानामुपाश्नुते । जो लगातार बारह महीनेतक पूरे बीस दिनपर एक बार भोजन करता, सत्य बोलता, व्रतका पालन करता, मांस नहीं खाता, ब्रह्मचर्यका पालन करता तथा समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहता है, वह सूर्यदेवके विशाल एवं रमणीय लोकोंमें जाता है ॥ ९०-९१ १/२ ॥

गन्धर्वरप्सरोभिश्च दिव्यमाल्यानुलेपनैः ॥ ९२ ॥ विमानैः काञ्चनैर्हृद्यैः पृष्ठतश्चानुगम्यते । उसके पीछे-पीछे दिव्यमाला और अनुलेपन धारण करनेवाले गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे सेवित सोनेके मनोरम विमान चलते हैं ॥ ९२ १/२ ॥

एकविंशे तु दिवसे यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् ॥ ९३ ॥ सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । लोकमौशनसं दिव्यं शक्रलोकं च गच्छति ॥ ९४ ॥ अश्विनोर्मरुतां चैव सुखेष्वभिरतः सदा । अनभिज्ञश्च दुःखानां विमानवरमास्थितः ॥ ९५ ॥ सेव्यमानो वरस्त्रीभिः क्रीडत्यमरवत् प्रभुः । जो लगातार बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ इक्कीसवें दिनपर एक बार भोजन करता है, वह शुक्राचार्य तथा इन्द्रके दिव्यलोकमें जाता है। इतना ही नहीं, उसे अश्विनीकुमारों और मरुद्गणोंके लोकोंकी भी प्राप्ति होती है। उन लोकोंमें वह सदा सुख भोगनेमें ही तत्पर रहता है। दुःखोंका तो वह नाम भी नहीं जानता है और श्रेष्ठ विमानपर विराजमान हो सुन्दरी स्त्रियोंसे सेवित होता हुआ शक्तिशाली देवताके समान क्रीड़ा करता है ॥ ९३—९५ १/२ ॥

द्वाविंशे दिवसे प्राप्ते यो भुङ्क्ते ह्येकभोजनम् ॥ ९६ ॥ सदा द्वादशमासान् वै जुह्वानो जातवेदसम् । अहिंसानिरतो धीमान् सत्यवागनसूयकः ॥ ९७ ॥ लोकान् वसूनामाप्नोति दिवाकरसमप्रभः । कामचारी सुधाहारो विमानवरमास्थितः ॥ ९८ ॥

रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषितः । जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बाईसवाँ दिन प्राप्त होनेपर एक बार भोजन करता है तथा अहिंसामें तत्पर, बुद्धिमान्, सत्यवादी और दोषदृष्टिसे रहित होता है, वह सूर्यके समान तेजस्वी रूप धारण करके श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो वसुओंके लोकमें जाता है। वहाँ इच्छानुसार विचरता, अमृत पीकर रहता और दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो देवकन्याओंके साथ रमण करता है ॥ ९६—९८ १/२ ॥ त्रयोविंशे तु दिवसे प्राशेद यस्त्वेकभोजनम् ॥ ९९ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु मिताहारो जितेन्द्रियः । वायोरुशनसश्चैव रुद्रलोकं च गच्छति ॥ १०० ॥ जो लगातार बारह महीनोंतक मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर तेईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह वायु, शुक्राचार्य तथा रुद्रके लोकमें जाता है ॥ कामचारी कामगमः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः । अनेकगुणपर्यन्तं विमानवरमास्थितः ॥ १०१ ॥ रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषितः । वहाँ अनेक गुणोंसे युक्त श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो इच्छानुसार विचरता, जहाँ इच्छा होती वहाँ जाता और अप्सराओंद्वारा पूजित होता है। उन लोकोंमें वह दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो देवकन्याओंके साथ रमण करता है ॥ १०१ १/२ ॥ चतुर्विंशे तु दिवसे यः प्राप्ते प्राश्ते हविः ॥ १०२ ॥ सदा द्वादशमासांश्च जुह्वानो जातवेदसम् । आदित्यानामधीवासे मोदमानो वसेच्चिरम् ॥ १०३ ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धानुलेपनः । जो लगातार बारह महीनोंतक अग्निहोत्र करता हुआ चौबीसवें दिन एक बार हविष्यान्न भोजन करता है, वह दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यगन्ध तथा दिव्य अनुलेपन धारण करके सुदीर्घकालतक आदित्यलोकमें सानन्द निवास करता है ॥ १०२-१०३ १/२ ॥ विमाने काञ्चने दिव्ये हंसयुक्ते मनोरमे ॥ १०४ ॥ रमते देवकन्यानां सहस्रैरयुतैस्तथा । वहाँ हंसयुक्त मनोरम एवं दिव्य सुवर्णमय विमानपर वह सहस्रों तथा अयुतों देवकन्याओंके साथ रमण करता है ॥ १०४ १/२ ॥ पञ्चविंशे तु दिवसे यः प्राशेदकभोजनम् ॥ १०५ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु पुष्कलं यानमारुहेत् । जो लगातार बारह महीनोंतक पचीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसको सवारीके लिये बहुत-से विमान या वाहन प्राप्त होते हैं ॥ १०५ १/२ ॥

सिंहव्याघ्रप्रयुक्तैस्तु मेघनिःस्वननादितैः ॥ १०६ ॥ स रथैर्नन्दिघोषैश्च पृष्ठतो ह्यनुगम्यते । देवकन्यासमारूढैः काञ्चनैर्विमलैः शुभैः ॥ १०७ ॥ उसके पीछे सिंहों और व्याघ्रोंसे जुते हुए तथा मेघोंकी गम्भीर गर्जनासे निनादित बहुसंख्यक रथ सानन्द विजयघोष करते हुए चलते हैं। उन सुवर्णमय, निर्मल एवं मंगलकारी रथोंपर देवकन्याएँ आरूढ़ होती हैं ॥ १०६-१०७ ॥ विमानमुत्तमं दिव्यमास्थाय सुमनोहरम् । तत्र कल्पसहस्रं वै वसते स्त्रीशतावृते ॥ १०८ ॥ सुधारसं चोपजीवन्नमृतोपममुत्तमम् । वह दिव्य, उत्तम एवं मनोहर विमानपर विराजमान हो सैकड़ों सुन्दरियोंसे भरे हुए महलमें सहस्र कल्पोंतक निवास करता है। वहाँ देवताओंके भोज्य अमृतके समान उत्तम सुधारसको पीकर वह जीवन बिताता है ॥ १०८ १/२ ॥ षड्विंशे दिवसे यस्तु प्रकुर्यादेकभोजनम् ॥ १०९ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु नियतो नियताशनः । जितेन्द्रियो वीतरागो जुह्वानो जातवेदसम् ॥ ११० ॥ स प्राप्नोति महाभागः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः । सप्तानां मरुतां लोकान् वसूनां चापि सोऽश्नुते ॥ १११ ॥ जो लगातार बारह महीनोंतक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर मिताहारी हो छब्बीसवें दिन एक बार भोजन करता है तथा वीतराग और जितेन्द्रिय हो प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह महाभाग मनुष्य अप्सराओंसे पूजित हो सात मरुद्गणों और आठ वसुओंके लोकोंमें जाता है ॥ १०९—१११ ॥ विमानैः स्फाटिकैर्दिव्यैः सर्वरत्नैरलंकृतैः । गन्धर्वैरप्सरोभिश्च पूज्यमानः प्रमोदते ॥ ११२ ॥ द्वे युगानां सहस्रे तु दिव्ये दिव्येन तेजसा । सम्पूर्ण रत्नोंसे अलंकृत स्फटिक मणिमय दिव्य विमानोंसे सम्पन्न हो गन्धर्वों और अप्सराओं‌द्वारा पूजित होता हुआ दिव्य तेजसे युक्त हो देवताओंके दो हजार दिव्य युगोंतक वह उन लोकोंमें आनन्द भोगता है ॥ ११२ १/२ ॥ सप्तविंशेऽथ दिवसे यः कुर्यादेकभोजनम् ॥ ११३ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् । फलं प्राप्नोति विपुलं देवलोके च पूज्यते ॥ ११४ ॥ जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर सत्ताईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह प्रचुर फलका भागी होता और देवलोकमें सम्मान पाता है ॥ ११३-११४ ॥

अमृताशी वसंस्तत्र स वितृष्णः प्रमोदिते । देवर्षिचरितं राजन् राजर्षिभिरनुष्ठितम् ॥ ११५ ॥ अध्यावसति दिव्यात्मा विमानवरमास्थितः । स्त्रीभिर्मनोभिरामाभी रममाणो मदोत्कटः ॥ ११६ ॥ युगकल्पसहस्राणि त्रीण्यावसति वै सुखम् । वहाँ उसे अमृतका आहार प्राप्त होता है तथा वह तृणारहित हो वहाँ रहकर आनन्द भोगता है। राजन्! वह दिव्यरूपधारी पुरुष राजर्षियोंद्वारा वर्णित देवर्षियोंके चरित्रका श्रवण-मनन करता है और श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो मनोरम सुन्दरियोंके साथ मदोन्मत्तभावसे रमण करता हुआ तीन हजार युगों एवं कल्पोंतक वहाँ सुखपूर्वक निवास करता है ॥ ११५-११६ ½ ॥

योऽष्टाविंशे तु दिवसे प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ ११७ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु जितात्मा विजितेन्द्रियः । फलं देवर्षिचरितं विपुलं समुपामुते ॥ ११८ ॥ जो बारह महीनोंतक सदा अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर अट्ठाईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह देवर्षियोंको प्राप्त होनेवाले महान् फलका उपभोग करता है ॥ ११७-११८ ॥

भोगवांस्तेजसा भाति सहस्रांशुरिवामलः । सुकुमार्यश्च नार्यस्तं रममाणाः सुवर्चसः ॥ ११९ ॥ पीनस्तनोरुजघना दिव्याभरणभूषिताः । रमयन्ति मनःकान्ते विमाने सूर्यसंनिभे ॥ १२० ॥ सर्वकामगमे दिव्ये कल्पायुतशतं समाः । वह भोगसे सम्पन्न हो अपने तेजसे निर्मल सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है और सुन्दर कान्तिवाली, पीन उरोज, जाँघ और जघन प्रदेशवाली, दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुकुमारी रमणियाँ सूर्यके समान प्रकाशित और सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाले मनोरम दिव्य विमानपर बैठकर उस पुण्यात्मा पुरुषका दस लाख कल्पोंके वर्षोंतक मनोरंजन करती हैं ॥ ११९-१२० ½ ॥

एकोनत्रिंशे दिवसे यः प्राशेदकभोजनम् ॥ १२१ ॥ सदा द्वादशमासान् वै सत्यव्रतपरायणः । तस्य लोकाः शुभा दिव्या देवराजर्षिपूजिताः ॥ १२२ ॥ जो बारह महीनोंतक सदा सत्यव्रतके पालनमें तत्पर हो उन्तीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे देवर्षियों तथा राजर्षियोंद्वारा पूजित दिव्य मंगलमय लोक प्राप्त होते हैं ॥ १२१-१२२ ॥ विमानं सूर्यचन्द्राभं दिव्यं समधिगच्छति ।

जातरूपमयं युक्तं सर्वरत्नसमन्वितम् ॥ १२३ ॥ वह सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित, सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित तथा आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त सुवर्णमय दिव्य विमान प्राप्त करता है ॥ १२३ ॥ अप्सरोगणसम्पूर्णं गन्धर्वैरभिनादितम् । तत्र चैनं शुभा नार्यो दिव्याभरणभूषिताः ॥ १२४ ॥ मनोऽभिरामा मधुरा रमयन्ति मदोत्कटाः । उस विमानमें अप्सराएँ भरी रहती हैं, गन्धर्वोंके गीतोंकी मधुर ध्वनिसे वह विमान गूँजता रहता है। उस विमानमें दिव्य आभूषणोंसे विभूषित, शुभ लक्षणसम्पन्न, मनोभिराम, मदमत्त एवं मधुरभाषिणी रमणियाँ उस पुरुषका मनोरंजन करती हैं ॥ १२४ ½ ॥ भोगवांस्तेजसा युक्तो वैश्वानरसमप्रभः ॥ १२५ ॥ दिव्यो दिव्येन वपुषा भ्राजमान इवामरः । वसूनां मरुतां चैव साध्यानामश्विनोस्तथा ॥ १२६ ॥ रुद्राणां च तथा लोकं ब्रह्मलोकं च गच्छति । वह पुरुष भोगसम्पन्न, तेजस्वी, अग्निके समान दीप्तिमान्, अपने दिव्य शरीरसे देवताकी भाँति प्रकाशमान तथा दिव्यभावसे युक्त हो वसुओं, मरुद्गणों, साध्यगणों, अश्विनीकुमारों, रुद्रों तथा ब्रह्माजीके लोकमें भी जाता है ॥ १२५-१२६ ½ ॥ यस्तु मासे गते भुङ्क्ते एकभक्तं शमात्मकः ॥ १२७ ॥ सदा द्वादशमासान् वै ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् । जो बारह महीनोंतक प्रत्येक मास व्यतीत होनेपर तीसवें दिन एक बार भोजन करता और सदा शान्तभावसे रहता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ॥ १२७ ½ ॥ सुधारसकृताहारः श्रीमान् सर्वमनोहरः ॥ १२८ ॥ तेजसा वपुषा लक्ष्म्या भ्राजते रश्मिवानिव । वह वहाँ सुधारसका भोजन करता और सबके मनको हर लेनेवाला कान्तिमान् रूप धारण करता है। वह अपने तेज, सुन्दर शरीर तथा अंगकान्तिसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है ॥ १२८ ½ ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धानुलेपनः ॥ १२९ ॥ सुखेष्वभिरतो भोगी दुःखानामविजानकः । दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यगन्ध और दिव्य अनुलेपन धारण करके वह भोगकी शक्ति और साधनसे सम्पन्न हो सुख-भोगमें ही रत रहता है। दुःखोंका उसे कभी अनुभव नहीं होता है ॥ १२९ ½ ॥ स्वयंप्रभाभिर्नारीभिर्विमानस्थो महीयते ॥ १३० ॥ रुद्रदेवर्षिकन्याभिः सततं चाभिपूज्यते ।

नानारमणरूपाभिर्नानारागाभिरेव च ।। १३१ ।। नानामधुरभाषाभिर्नानारतिभिरेव च । वह विमानपर आरूढ़ हो अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होनेवाली दिव्य नारियोंद्वारा सम्मानित होता है। रुद्रों तथा देवर्षियोंकी कन्याएँ सदा उसकी पूजा करती हैं। वे कन्याएँ नाना प्रकारके रमणीय रूप, विभिन्न प्रकारके राग, भाँति-भाँतिकी मधुर भाषणकला तथा अनेक तरहकी रति-क्रीड़ाओंसे सुशोभित होती हैं ।। १३०-१३१ १/२ ।। विमाने गगनाकारे सूर्यवैदूर्यसंनिभे ।। १३२ ।। पृष्ठतः सोमसंकाशे उदर्कै चाभ्रसन्निभे । दक्षिणायां तु रक्ताभे अधस्तान्नीलमण्डले ।। १३३ ।। ऊर्ध्वं विचित्रसंकाशे नैको वसति पूजितः । जिस विमानपर वह विराजमान होता है, वह आकाशके समान विशाल दिखायी देता है। सूर्य और वैदूर्यमणिके समान तेजस्वी जान पड़ता है। उसका पिछला भाग चन्द्रमाके समान, वामभाग मेघके सदृश, दाहिना भाग लाल प्रभासे युक्त, निचला भाग नीलमण्डलके समान तथा ऊपरका भाग अनेक रंगोंके सम्मिश्रणसे विचित्र-सा प्रतीत होता है। उसमें वह अनेक नर-नारियोंके साथ सम्मानित होकर रहता है ।। १३२-१३३ १/२ ।। यावद् वर्षसहस्रं वै जम्बूद्वीपे प्रवर्षति ।। १३४ ।। तावत् संवत्सराः प्रोक्ता ब्रह्मलोकेऽस्य धीमतः । मेघ जम्बूद्वीपमें जितने जलबिन्दुओंकी वर्षा करता है, उतने हजार वर्षोंतक उस बुद्धिमान् पुरुषका ब्रह्मलोकमें निवास बताया गया है ।। १३४ १/२ ।। विप्रुषश्चैव यावन्त्यो निपतन्ति नभस्तलात् ।। १३५ ।। वर्षासु वर्षतस्तावन्निवसत्यमरप्रभः । वर्षा-ऋतुमें आकाशसे धरतीपर जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने वर्षोंतक वह देवोपम तेजस्वी पुरुष ब्रह्मलोकमें निवास करता है ।। १३५ १/२ ।। मासोपवासी वर्षैस्तु दशभिः स्वर्गमुत्तमम् ।। १३६ ।। महर्षित्वमथासाद्य सशरीरगतिर्भवेत् । दस वर्षोंतक एक-एक मास उपवास करके इकतीसवें दिन भोजन करनेवाला पुरुष उत्तम स्वर्ग लोकको जाता है। वह महर्षि पदको प्राप्त होकर सशरीर दिव्यलोककी यात्रा करता है ।। १३६ १/२ ।। मुनिर्दान्तो जितक्रोधो जितशिश्वोदरः सदा ।। १३७ ।। जुह्वन्नग्नींश्च नियतः संध्योपासनसेविता । बहुभिर्नियमैरेवं शुचिरश्राति यो नरः ।। १३८ ।। अभ्रावकाशशीलश्च तस्य भानोरिव त्विषः ।

जो मनुष्य सदा मुनि, जितेन्द्रिय, क्रोधको जीतनेवाला, शिश्न और उदरके वेगको सदा काबूमें रखनेवाला, नियमपूर्वक तीनों अग्नियोंमें आहुति देनेवाला और संध्योपासनामें तत्पर रहनेवाला है तथा जो पवित्र होकर इन पहले बताये हुए अनेक प्रकारके नियमोंके पालनपूर्वक भोजन करता है, वह आकाशके समान निर्मल होता है और उसकी कान्ति सूर्यकी प्रभाके समान प्रकाशित होती है॥

दिवं गत्वा शरीरेण स्वेन राजन् यथामरः ॥ १३९ ॥ स्वर्गं पुण्यं यथाकाममुपभुङ्क्ते तथाविधः । राजन्! ऐसे गुणोंसे युक्त पुरुष देवताके समान अपने शरीरके साथ ही देवलोकमें जाकर वहाँ इच्छाके अनुसार स्वर्गके पुण्यफलका उपभोग करता है॥ १३९ १/२॥

एष ते भरतश्रेष्ठ यज्ञानां विधिरुत्तमः ॥ १४० ॥ व्याख्यातो ह्यानुपूर्व्येण उपवासफलात्मकः । दरिद्रैर्मनुजैः पार्थ प्राप्तं यज्ञफलं यथा ॥ १४१ ॥ भरतश्रेष्ठ! यह तुम्हें यज्ञोंका उत्तम विधान क्रमशः विस्तारपूर्वक बताया गया है। इसमें उपवासके फलपर प्रकाश डाला गया है। कुन्तीनन्दन! दरिद्र मनुष्योंने इन उपवासात्मक व्रतोंका अनुष्ठान करके यज्ञोंका फल प्राप्त किया है॥ १४०-१४१ ॥

उपवासानिमान् कृत्वा गच्छेच्च परमां गतिम् । देवद्विजातिपूजायां रतो भरतसत्तम ॥ १४२ ॥ भरतश्रेष्ठ! देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजामें तत्पर रहकर जो इन उपवासोंका पालन करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है॥ १४२ ॥

उपवासविधिस्त्वेष विस्तरेण प्रकीर्तितः । नियतेष्वप्रमत्तेषु शौचवत्सु महात्मसु ॥ १४३ ॥ दम्भद्रोहनिवृत्तेषु कृतबुद्धिषु भारत । अचलेष्वप्रकम्पेषु मा ते भूदत्र संशयः ॥ १४४ ॥ भारत! नियमशील, सावधान, शौचाचारसे सम्पन्न, महामनस्वी, दम्भ और द्रोहसे रहित, विशुद्ध बुद्धि, अचल और स्थिर स्वभाववाले मनुष्योंके लिये मैंने यह उपवासकी विधि विस्तारपूर्वक बतायी है। इस विषयमें तुम्हें संदेह नहीं करना चाहिये॥ १४३-१४४॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उपवासविधिर्नाम सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उपवासकी विधिनामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०७॥

१०८-

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अष्टाधिकशततमोऽध्यायः

मानस तथा पार्थिव तीर्थकी महत्ता

युधिष्ठिर उवाच

यद् वरं सर्वतीर्थानां तन्मे ब्रूहि पितामह ।
यत्र चैव परं शौचं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! जो सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ हो तथा जहाँ जानेसे परम शुद्धि हो जाती हो, उस तीर्थको मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

सर्वाणि खलु तीर्थानि गुणवन्ति मनीषिणः ।
यत्तु तीर्थं च शौचं च तन्मे शृणु समाहितः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सब मनीषी पुरुषोंके लिए गुणकारी होते हैं; किंतु उन सबमें जो परम पवित्र और प्रधान तीर्थ हैं, उसका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ २ ॥

अगाधे विमले शुद्धे सत्यतोये धृतिह्रदे ।
स्नातव्यं मानसे तीर्थे सत्त्वमालम्ब्य शाश्वतम् ॥ ३ ॥
जिसमें धैर्यरूप कुण्ड और सत्यरूप जल भरा हुआ है तथा जो अगाध, निर्मल एवं अत्यन्त शुद्ध है, उस मानस तीर्थमें सदा परमात्माका आश्रय लेकर स्नान करना चाहिये ॥ ३ ॥

तीर्थशौचमनर्थित्वमार्जवं सत्यमार्दवम् ।
अहिंसा सर्वभूतानामानृशंस्यं दमः शमः ॥ ४ ॥
कामना और याचनाका अभाव, सरलता, सत्य, मृदुता, अहिंसा, समस्त प्राणियोंके प्रति क्रूरताका अभाव—दया, इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह—ये ही इस मानस तीर्थके सेवनसे प्राप्त होनेवाली पवित्रताके लक्षण हैं ॥ ४ ॥

निर्ममा निरहंकारा निर्द्वन्द्वा निष्परिग्रहाः ।
शुचयस्तीर्थभूतास्ते ये भैक्ष्यमुपभुञ्जते ॥ ५ ॥
जो ममता, अहंकार, राग-द्वेषादि द्वन्द्व और परिग्रहसे रहित एवं भिक्षासे जीवन निर्वाह करते हैं, वे विशुद्ध अन्तःकरणवाले साधु पुरुष तीर्थस्वरूप हैं ॥ ५ ॥

तत्त्ववित्तवनहंबुद्धिस्तीर्थप्रवरमुच्यते ।
(नारायणेऽथ रुद्रे वा भक्तिस्तीर्थं परं मता ।)
शौचलक्षणमेतत् ते सर्वत्रैवान्ववेक्षतः ॥ ६ ॥

किंतु जिसकी बुद्धिमें अहंकारका नाम भी नहीं है, वह तत्त्वज्ञानी पुरुष श्रेष्ठ तीर्थ कहलाता है। भगवान् नारायण अथवा भगवान् शिवमें जो भक्ति होती है, वह भी उत्तम तीर्थ मानी गयी है। पवित्रताका यह लक्षण तुम्हें विचार करनेपर सर्वत्र ही दृष्टिगोचर होगा॥ ६॥

रजस्तमः सत्त्वमथो येषां निर्धौतमात्मनः।
शौचाशौचसमायुक्ताः स्वकार्यपरिमार्गिणः॥ ७॥
सर्वत्यागेष्वभिरताः सर्वज्ञाः समदर्शिनः।
शौचेन वृत्तशौचार्थास्ते तीर्थाः शुचयश्च ये॥ ८॥
जिनके अन्तःकरणसे तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण धुल गये हैं अर्थात् जो तीनों गुणोंसे रहित हैं, जो बाह्य पवित्रता और अपवित्रतासे युक्त रहकर भी अपने कर्तव्य (तत्त्वविचार, ध्यान, उपासना आदि) का ही अनुसंधान करते हैं। जो सर्वस्वके त्यागमें ही अभिरुचि रखते हैं, सर्वज्ञ और समदर्शी होकर शौचाचारके पालनद्वारा आत्मशुद्धिका सम्पादन करते हैं, वे सत्पुरुष ही परम पवित्र तीर्थस्वरूप हैं॥ ७-८॥

नोदकक्लिन्नगात्रस्तु स्नात इत्यभिधीयते।
स स्नातो यो दमस्नातः स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥ ९॥
शरीरको केवल पानीसे भिगो लेना ही स्नान नहीं कहलाता है। सच्चा स्नान तो उसीने किया है, जिसने मन-इन्द्रियके संयमरूपी जलमें गोता लगाया है। वही बाहर और भीतरसे भी पवित्र माना गया है॥ ९॥

अतीतेष्वनपेक्षा ये प्राप्तेष्वर्थेषु निर्ममाः।
शौचमेव परं तेषां येषां नोत्पद्यते स्पृहा॥ १०॥
जो बीते या नष्ट हुए विषयोंकी अपेक्षा नहीं रखते, प्राप्त हुए पदार्थोंमें ममताशून्य होते हैं तथा जिनके मनमें कोई इच्छा पैदा ही नहीं होती, उन्हींमें परम पवित्रता होती है॥ १०॥

प्रज्ञानं शौचमेवेह शरीरस्य विशेषतः।
तथा निष्किंचनत्वं च मनसश्च प्रसन्नता॥ ११॥
इस जगत्में प्रज्ञान ही शरीर-शुद्धिका विशेष साधन है। इसी प्रकार अकिंचनता और मनकी प्रसन्नता भी शरीरको शुद्ध करनेवाले हैं॥ ११॥

वृत्तशौचं मनःशौचं तीर्थशौचमतः परम्।
ज्ञानोत्पन्नं च यच्छौचं तच्छौचं परमं स्मृतम्॥ १२॥
शुद्धि चार प्रकारकी मानी गयी है—आचारशुद्धि, मनःशुद्धि, तीर्थशुद्धि और ज्ञानशुद्धि; इनमें ज्ञानसे प्राप्त होनेवाली शुद्धि ही सबसे श्रेष्ठ मानी गयी है॥ १२॥

मनसा च प्रदीप्तेन ब्रह्मज्ञानजलेन च।
स्नाति यो मानसे तीर्थे तत्स्नानं तत्त्वदर्शिनः॥ १३॥

जो प्रसन्न एवं शुद्ध मनसे ब्रह्मज्ञानरूपी जलके द्वारा मानसतीर्थमें स्नान करता है, उसका वह स्नान ही तत्त्वदर्शी ज्ञानीका स्नान माना गया है ॥ १३ ॥

समारोपितशौचस्तु नित्यं भावसमाहितः ।
केवलं गुणसम्पन्नः शुचिरेव नरः सदा ॥ १४ ॥
जो सदा शौचाचारसे सम्पन्न, विशुद्ध भावसे युक्त और केवल सद्गुणोंसे विभूषित है, उस मनुष्यको सदा शुद्ध ही समझना चाहिये ॥ १४ ॥

शरीरस्थानि तीर्थानि प्रोक्तान्येतानि भारत ।
पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यानि शृणु तान्यपि ॥ १५ ॥
भारत! यह मैंने शरीरमें स्थित तीर्थोंका वर्णन किया; अब पृथ्वीपर जो पुण्यतीर्थ हैं, उनका महत्त्व भी सुनो ॥ १५ ॥

शरीरस्य यथोद्देशाः शुचयः परिकीर्तिताः ।
तथा पृथिव्या भागाश्च पुण्यानि सलिलानि च ॥ १६ ॥
जैसे शरीरके विभिन्न स्थान पवित्र बताये गये हैं, उसी प्रकार पृथ्वीके भिन्न-भिन्न भाग भी पवित्र तीर्थ हैं और वहाँका जल पुण्यदायक है ॥ १६ ॥

कीर्तनाच्चैव तीर्थस्य स्नानाच्च पितृतर्पणात् ।
धुनन्ति पापं तीर्थेषु ते प्रयान्ति सुखं दिवम् ॥ १७ ॥
जो लोग तीर्थोंके नाम लेकर तीर्थोंमें स्नान करके तथा उनमें पितरोंका तर्पण करके अपने पाप धो डालते हैं, वे बड़े सुखसे स्वर्गमें जाते हैं ॥ १७ ॥

परिग्रहाच्च साधूनां पृथिव्याश्चैव तेजसा ।
अतीव पुण्यभागास्ते सलिलस्य च तेजसा ॥ १८ ॥
पृथ्वीके कुछ भाग साधु पुरुषोंके निवाससे तथा स्वयं पृथ्वी और जलके तेजसे अत्यन्त पवित्र माने गये हैं ॥ १८ ॥

मनसश्च पृथिव्याश्च पुण्यास्तीर्थास्तथापरे ।
उभयोरेव यः स्नायात् स सिद्धिं शीघ्रमाप्नुयात् ॥ १९ ॥
इस प्रकार पृथ्वीपर और मनमें भी अनेक पुण्यमय तीर्थ हैं। जो इन दोनों प्रकारके तीर्थोंमें स्नान करता है, वह शीघ्र ही परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥ १९ ॥

यथा बलं क्रियाहीनं क्रिया वा बलवर्जिता ।
नेह साधयते कार्यं समायुक्ता तु सिध्यति ॥ २० ॥
एवं शरीरशौचेन तीर्थशौचेन चान्वितः ।
शुचिः सिद्धिमवाप्नोति द्विविधं शौचमुत्तमम् ॥ २१ ॥
जैसे क्रियाहीन बल अथवा बलरहित क्रिया इस जगत्में कार्यका साधन नहीं कर सकती। बल और क्रिया दोनोंके संयुक्त होनेपर ही कार्यकी सिद्धि होती है, इसी प्रकार

शरीरशुद्धि और तीर्थशुद्धिसे युक्त पुरुष ही पवित्र होकर परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि प्राप्त करता है। अतः दोनों प्रकारकी शुद्धि ही उत्तम मानी गयी है ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शौचानुपृच्छा नामाष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शुद्धिकी जिज्ञासानाम एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पावका १/३ श्लोक मिलाकर कुल २१ १/३ श्लोक हैं)

प्रत्येक मासकी द्वादशी तिथिको उपवास और भगवान् विष्णुकी पूजा करनेका विशेष माहात्म्य

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नवाधिकशततमोऽध्यायः

प्रत्येक मासकी द्वादशी तिथिको उपवास और भगवान् विष्णुकी पूजा करनेका विशेष माहात्म्य

युधिष्ठिर उवाच

सर्वेषामुपवासानां यच्छ्रेयः सुमहत्फलम् ।
यच्चाप्यसंशयं लोके तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**पितामह! समस्त उपवासोंमें जो सबसे श्रेष्ठ और महान् फल देनेवाला है तथा जिसके विषयमें लोगोंको कोई संशय नहीं है, वह आप मुझे बताइये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

शृणु राजन् यथा गीतं स्वयमेव स्वयम्भुवा ।
यत् कृत्वा निर्वृतो भूयात् पुरुषो नाज संशयः ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! स्वयम्भू भगवान् विष्णुने इस विषयमें जैसा कहा है, उसे बताता हूँ, सुनो। उसका अनुष्ठान करके पुरुष परम सुखी हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥

द्वादश्यां मार्गशीर्षे तु अहोरात्रेण केशवम् ।
अर्च्यश्वमेधं प्राप्नोति दुष्कृतं चास्य नश्यति ॥ ३ ॥
मार्गशीर्षमासमें द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके भगवान् केशवकी पूजा-अर्चा करनेसे मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पा लेता है और उसका सारा पाप नष्ट हो जाता है ॥ ३ ॥

तथैव पौषमासे तु पूज्यो नारायणेति च ।
वाजपेयमवाप्नोति सिद्धिं च परमां व्रजेत् ॥ ४ ॥
इसी प्रकार पौषमासमें द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक भगवान् नारायणकी पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाले पुरुषको वाजपेय यज्ञका फल मिलता है और वह परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ॥ ४ ॥

अहोरात्रेण द्वादश्यां माघमासे तु माधवम् ।
राजसूयमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ५ ॥
माघमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके भगवान् माधवकी पूजा करनेसे उपासकको राजसूय यज्ञका फल प्राप्त होता है और वह अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ५ ॥

तथैव फाल्गुने मासि गोविन्देति च पूजयन् । अतिरात्रमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥ ६ ॥ इसी तरह फाल्गुनमासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक गोविन्द नामसे भगवान्‌की पूजा करनेवाला पुरुष अतिरात्र यज्ञका फल पाता है और मृत्युके पश्चात् सोमलोकमें जाता है ॥ ६ ॥ अहोरात्रेण द्वादश्यां चैत्रे विष्णुरिति स्मरन् । पौण्डरीकमवाप्नोति देवलोकं च गच्छति ॥ ७ ॥ चैत्रमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके विष्णुनामसे भगवान्‌का चिन्तन करनेवाला मनुष्य पौण्डरीक यज्ञका फल पाता है और देवलोकमें जाता है ॥ ७ ॥ वैशाखमासे द्वादश्यां पूजयन् मधुसूदनम् । अग्निष्टोममवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ॥ ८ ॥ वैशाखमासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक भगवान् मधुसूदनका पूजन करनेवाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता और सोमलोकमें जाता है ॥ ८ ॥ अहोरात्रेण द्वादश्यां ज्येष्ठे मासि त्रिविक्रमम् । गवां मेधमवाप्नोति अप्सरोभिश्च मोदते ॥ ९ ॥ ज्येष्ठमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके जो भगवान् त्रिविक्रमकी पूजा करता है, वह गोमेधयज्ञका फल पाता और अप्सराओंके साथ आनन्द भोगता है ॥ आषाढे मासि द्वादश्यां वामनेति च पूजयन् । नरमेधमवाप्नोति पुण्यं च लभते महत् ॥ १० ॥ आषाढ़मासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक वामन नामसे भगवान्‌का पूजन करनेवाला पुरुष नरमेध यज्ञका फल पाता और महान् पुण्यका भागी होता है ॥ १० ॥ अहोरात्रेण द्वादश्यां श्रावणे मासि श्रीधरम् । पञ्चयज्ञानवाप्नोति विमानस्थश्च मोदते ॥ ११ ॥ श्रावणमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके जो भगवान् श्रीधरकी आराधना करता है, वह पंच महायज्ञोंका फल पाता और विमानपर बैठकर सुख भोगता है ॥ ११ ॥ तथा भाद्रपदे मासि हृषीकेशेति पूजयन् । सौत्रामणिमवाप्नोति पूतात्मा भवते च हि ॥ १२ ॥ भाद्रपदमासकी द्वादशी तिथिको उपवासपूर्वक हृषीकेश नामसे भगवान्‌की पूजा करनेवाला मनुष्य सौत्रामणि यज्ञका फल पाता और पवित्रात्मा होता है ॥ द्वादश्यामाश्विने मासि पद्मनाभेति चार्चयन् । गोसहस्रफलं पुण्यं प्राप्नुयान्नात्र संशयः ॥ १३ ॥

आश्विनमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके पद्मनाभ नामसे भगवान्‌की पूजा करनेवाला पुरुष सहस्र गोदानका पुण्यफल पाता है, इसमें संशय नहीं है ।। १३ ।। द्वादश्यां कार्तिके मासि पूज्य दामोदरेति च ।
गवां यज्ञमवाप्नोति पुमान् स्त्री वा न संशयः ।। १४ ।।
कार्तिकमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके भगवान् दामोदरकी पूजा करनेसे स्त्री हो या पुरुष गो-यज्ञका फल पाता है, इसमें संशय नहीं है ।। १४ ।।
अर्चयेत् पुण्डरीकाक्षमेवं संवत्सरं तु यः ।
जातिस्मरत्वं प्राप्नोति विन्द्याद् बहु सुवर्णकम् ।। १५ ।।
इस प्रकार जो एक वर्षतक कमलनयन भगवान् विष्णुका पूजन करता है, वह पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेवाला होता है और उसे बहुत-सी सुवर्ण-राशि प्राप्त होती है ।। १५ ।।
अहन्यहनि तद्भावमुपेन्द्रं योऽधिगच्छति ।
समाप्ते भोजयेद् विप्रानथवा दापयेद् घृतम् ।। १६ ।।
जो प्रतिदिन इसी प्रकार भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह विष्णुभावको प्राप्त होता है। यह व्रत समाप्त होनेपर ब्राह्मणोंको भोजन करावे अथवा उन्हें घृत दान करे ।। १६ ।।
अतः परं नोपवासो भवतीति विनिश्चयः ।
उवाच भगवान् विष्णुः स्वयमेव पुरातनम् ।। १७ ।।
इस उपवाससे बढ़कर दूसरा कोई उपवास नहीं है, इसे निश्चय समझना चाहिये। साक्षात् भगवान् विष्णुने ही इस पुरातन व्रतके विषयमें बताया है ।। १७ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विष्णोर्द्वादशकं नाम
नवाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भगवान् विष्णुका द्वादशी-व्रत नामक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०९ ।।

११०-

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दशाधिकशततमोऽध्यायः

रूप-सौन्दर्य और लोकप्रियताकी प्राप्तिके लिये मार्गशीर्षमासमें चन्द्र-व्रत करनेका प्रतिपादन

वैशम्पायन उवाच

शरतल्पगतं भीष्मं वृद्धं कुरुपितामहम् ।
उपगम्य महाप्राज्ञः पर्यपृच्छद् युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! महाज्ञानी युधिष्ठिरने बाणशय्यापर सोये हुए कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मजीके निकट जाकर इस प्रकार प्रश्न किया ॥ १ ॥

युधिष्ठिर उवाच

अङ्गानां रूपसौभाग्यं प्रियं चैव कथं भवेत् ।
धर्मार्थकामसंयुक्तः सुखभागी कथं भवेत् ॥ २ ॥
युधिष्ठिर बोले— पितामह! मनुष्यके अंगोंको सुन्दर रूपका सौभाग्य कैसे प्राप्त होता है? मनुष्यमें लोकप्रियता कैसे आती है? धर्म, अर्थ और कामसे युक्त पुरुष किस प्रकार सुखका भागी हो सकता है? ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

मार्गशीर्षस्य मासस्य चन्द्रे मूलेन संयुते ।
पादौ मूलेन राजेन्द्र जङ्घायामथ रोहिणीम् ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— राजेन्द्र! मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाको मूल नक्षत्रसे चन्द्रमाका योग होनेपर चन्द्रसम्बन्धी व्रत आरम्भ करे। चन्द्रमाके स्वरूपका इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये। देवता-सहित मूलनक्षत्रके द्वारा उनके दोनों चरणोंकी भावना करे और पिण्डलियोंमें रोहिणीको स्थापित करे ॥ ३ ॥

अश्विन्यां सक्थिनी चैव ऊरू चाषाढयोस्तथा ।
गुह्यं तु फाल्गुनी विद्यात् कृत्तिका कटिकास्तथा ॥ ४ ॥
जाँघोंमें अश्विनी नक्षत्र, ऊरुओंमें पूर्वाषाढ़ा और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र, गुह्य भागमें पूर्वाफाल्गुनी और उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र तथा कटिभागमें कृत्तिकाकी स्थिति समझे ॥ ४ ॥

नाभिं भाद्रपदे विद्याद् रेवत्यामक्षिमण्डलम् ।
पृष्ठमेव धनिष्ठासु अनुराधोत्तरास्तथा ॥ ५ ॥
नाभिमें पूर्वाभाद्रपदा और उत्तराभाद्रपदाको जाने, नेत्रमण्डलमें रेवती, पृष्ठभागमें धनिष्ठा, अनुराधा तथा उत्तराको स्थापित समझे ॥ ५ ॥

बाहुभ्यां तु विशाखासु हस्तौ हस्तेन निर्दिशेत् ।
पुनर्वस्वङ्गुली राजन्नाश्लेषासु नखास्तथा ॥ ६ ॥
राजन्! दोनों भुजाओंमें विशाखाका, हाथोंमें हस्तका, अंगुलियोंमें पुनर्वसुका तथा नखोंमें आश्लेषाकी स्थापना करे ॥ ६ ॥
ग्रीवां ज्येष्ठा च राजेन्द्र श्रवणेन तु कर्णयोः ।
मुखं पुष्येण दानेन दन्तौष्ठौ स्वातिरुच्यते ॥ ७ ॥
राजेन्द्र! ज्येष्ठा नक्षत्रसे ग्रीवाकी, श्रवणसे दोनों कानोंकी, पुष्य नक्षत्रकी स्थापनासे मुखकी तथा स्वाती नक्षत्रसे दाँतों और ओठोंकी भावना बतायी जाती है ॥
हासं शतभिषां चैव मघां चैवाथ नासिकाम् ।
नेत्रे मृगशिरो विद्याल्ललाटे मित्रमेव तु ॥ ८ ॥
शतभिषाको हास, मघाको नासिका, मृगशिराको नेत्र और मित्र (अनुराधा) को ललाट समझे ॥ ८ ॥
भरण्यां तु शिरो विद्यात् केशानाद्र्रां नराधिप ।
समाप्ते तु घृतं दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे ॥ ९ ॥
नरेश्वर! भरणीको सिर और आर्द्राको चन्द्रमाके केश समझे। (इस प्रकार विभिन्न अंगोंमें नक्षत्रोंकी स्थापना करके तत्सम्बन्धी मन्त्रोंद्वारा उन-उन अंगोंकी पूजा एवं जप) होम आदि प्रतिदिन करे। पौर्णमासीको व्रत समाप्त होनेपर वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको घृत दान करे ॥ ९ ॥
सुभगो दर्शनीयश्च ज्ञानभाग्यथ जायते ।
जायते परिपूर्णाङ्गः पौर्णमास्येव चन्द्रमाः ॥ १० ॥
ऐसा करनेसे मनुष्य पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति परिपूर्णांग सौभाग्यशाली, दर्शनीय तथा ज्ञानका भागी होता है ॥ १० ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११० ॥

बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन

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एकादशाधिकशततमोऽध्यायः

बृहस्पतिका युधिष्ठिरसे प्राणियोंके जन्मके प्रकारका और नानाविध पापोंके फलस्वरूप नरकादिकी प्राप्ति एवं तिर्यग्योनियोंमें जन्म लेनेका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
श्रोतुमिच्छामि मर्त्यानां संसारविधिमुत्तमम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण महाप्राज्ञ पितामह! अब मैं मनुष्योंकी संसारयात्राके निर्वाहकी उत्तम विधि सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥

केन वृत्तेन राजेन्द्र वर्तमाना नरा भुवि ।
प्राप्नुवन्त्युत्तमं स्वर्गं कथं च नरकं नृप ॥ २ ॥
राजेन्द्र! पृथ्वीपर रहनेवाले मनुष्य किस बर्तावसे उत्तम स्वर्गलोक पाते हैं? और नरेश्वर! कैसा बर्ताव करनेसे वे नरकमें पड़ते हैं? ॥ २ ॥

मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः ।
प्रयान्त्यमुं लोकमितः को वै ताननुगच्छति ॥ ३ ॥
लोग अपने मृत शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेके समान छोड़कर जब यहाँसे परलोककी राह लेते हैं, उस समय उनके पीछे कौन जाता है? ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

अयमायाति भगवान् बृहस्पतिरुदारधीः ।
पृच्छैनं सुमहाभागमेतद् गुह्यं सनातनम् ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— वत्स! ये उदारबुद्धि भगवान् बृहस्पतिजी यहाँ पधार रहे हैं। इन्हीं महाभागसे इस सनातन गूढ़ विषयको पूछो ॥ ४ ॥

नैतदन्येन शक्यं हि वक्तुं केनचिदद्य वै ।
वक्ता बृहस्पतिसमो न ह्यन्यो विद्यते क्वचित् ॥ ५ ॥
आज दूसरा कोई इस विषयका प्रतिपादन नहीं कर सकता। बृहस्पतिजीके समान वक्ता दूसरा कोई कहीं भी नहीं है ॥ ५ ॥

वैशम्पायन उवाच

तयोः संवदतोरेवं पार्थगांगेययोस्तदा ।
आजगाम विशुद्धात्मा नाकपृष्ठाद् बृहस्पतिः ॥ ६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर और गंगानन्दन भीष्म, इन दोनोंमें इस प्रकार बात हो ही रही थी कि विशुद्ध अन्तःकरणवाले बृहस्पतिजी स्वर्गलोकसे वहाँ आ पहुँचे ।। ६ ।।

ततो राजा समुत्थाय धृतराष्ट्रपुरोगमः ।
पूजामनुपमां चक्रे सर्वे ते च सभासदः ॥ ७ ॥
उन्हें देखते ही राजा युधिष्ठिर धृतराष्ट्रको आगे करके खड़े हो गये। फिर उन्होंने तथा उन सभी सभासदोंने बृहस्पतिजीकी अनुपम पूजा की ।। ७ ।।

ततो धर्मसुतो राजा भगवन्तं बृहस्पतिम् ।
उपगम्य यथान्यायं प्रश्नं पप्रच्छ तत्त्वतः ॥ ८ ॥
तदनन्तर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरने भगवान् बृहस्पतिजीके समीप जाकर यथोचित रीतिसे यह तात्त्विक प्रश्न उपस्थित किया ।। ८ ।।

युधिष्ठिर उवाच

भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
मर्त्यस्य कः सहायो वै पिता माता सुतो गुरुः ॥ ९ ॥
ज्ञातिसम्बन्धिवर्गश्च मित्रवर्गस्तथैव च ।
मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः ॥ १० ॥
गच्छन्त्यमुत्र लोकं वै क एनमनुगच्छति ।
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! आप सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता और सब शास्त्रोंके विद्वान् हैं; अतः बताइये, पिता, माता, पुत्र, गुरु, सजातीय सम्बन्धी और मित्र आदिमेंसे मनुष्यका सच्चा सहायक कौन है? जब सब लोग अपने मरे हुए शरीरको काठ और ढेलेके समान त्यागकर चले जाते हैं, तब इस जीवके साथ परलोकमें कौन जाता है? ।।

बृहस्पतिरुवाच

एकः प्रसूयते राजन्नेक एव विनश्यति ॥ ११ ॥
एकस्तरति दुर्गाणि गच्छत्येकस्तु दुर्गतिम् ।
बृहस्पतिजीने कहा— राजन्! प्राणी अकेला ही जन्म लेता, अकेला ही मरता, अकेला ही दुःखसे पार होता तथा अकेला ही दुर्गति भोगता है ।। ११ ½ ।।

असहायः पिता माता तथा भ्राता सुतो गुरुः ॥ १२ ॥
ज्ञातिसम्बन्धिवर्गश्च मित्रवर्गस्तथैव च ।
पिता, माता, भाई, पुत्र, गुरु, जाति, सम्बन्धी तथा मित्रवर्ग—ये कोई भी उसके सहायक नहीं होते ।।

मृतं शरीरमुत्सृज्य काष्ठलोष्टसमं जनाः ॥ १३ ॥
मुहूर्तमिव रोदित्वा ततो यान्ति पराङ्मुखाः ।

लोग उसके मरे हुए शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेकी तरह फेंककर दो घड़ी रोते हैं और फिर उसकी ओरसे मुँह फेरकर चल देते हैं ।। १३ १/२ ।। तैस्तच्छरीरमुत्सृष्टं धर्म एकोऽनुगच्छति ।। १४ ।। तस्माद् धर्मः सहायश्च सेवितव्यः सदा नृभिः । वे कुटुम्बीजन तो उसके शरीरका परित्याग करके चले जाते हैं, किंतु एकमात्र धर्म ही उस जीवात्माका अनुसरण करता है; इसलिये धर्म ही सच्चा सहायक है। अतः मनुष्योंको सदा धर्मका ही सेवन करना चाहिये ।। प्राणी धर्मसमायुक्तो गच्छेत् स्वर्गगतिं पराम् ।। १५ ।। तथैवाधर्मसंयुक्तो नरकं चोपपद्यते । धर्मयुक्त प्राणी ही उत्तम स्वर्गमें जाता है और अधर्मपरायण जीव नरकमें पड़ता है ।। १५ १/२ ।। तस्मान्न्यायागतैरर्थैर्धर्मं सेवेत पण्डितः ।। १६ ।। धर्म एको मनुष्याणां सहायः पारलौकिकः । इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि न्यायसे प्राप्त हुए धनके द्वारा धर्मका अनुष्ठान करे। एकमात्र धर्म ही परलोकमें मनुष्योंका सहायक है ।। १६ १/२ ।। लोभान्मोहादनुक्रोशाद् भयाद् वाप्यबहुश्रुतः ।। १७ ।। नरः करोत्यकार्याणि परार्थे लोभमोहितः । जो बहुश्रुत नहीं है, वही मनुष्य लोभ और मोहके वशीभूत हो दूसरेके लिये लोभ, मोह, दया अथवा भयसे न करने योग्य पापकर्म कर बैठता है ।। १७ १/२ ।। धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रितयं जीविते फलम् ।। १८ ।। एतत् त्रयमवाप्तव्यमधर्मपरिवर्जितम् । धर्म, अर्थ और काम—ये तीन जीवनके फल हैं, अतः मनुष्यको अधर्मके त्यागपूर्वक इन तीनोंको उपलब्ध करना चाहिये ।। १८ १/२ ।।

युधिष्ठिर उवाच

श्रुतं भगवतो वाक्यं धर्मयुक्तं परं हितम् ।। १९ ।। शरीरनिचयं ज्ञातुं बुद्धिस्तु मम जायते । **युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! आपके मुँहसे मैंने धर्मयुक्त परम हितकर बात सुनी। अब शरीरकी स्थिति जाननेके लिये मेरा विचार हो रहा है ।। १९ १/२ ।। मृतं शरीरं हि नृणां सूक्ष्ममव्यक्ततां गतम् ।। २० ।। अचक्षुर्विषयं प्राप्तं कथं धर्मोऽनुगच्छति ।

मनुष्यका स्थूल शरीर तो मरकर यहीं पड़ा रह जाता है और उसका सूक्ष्म शरीर अव्यक्तभावको प्राप्त हो जाता है—नेत्रोंकी पहुँचसे परे है। ऐसी दशामें धर्म किस प्रकार उसका अनुसरण करता है? ॥ २० १/२ ॥

बृहस्पतिरुवाच

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिर्मनोऽन्तकः ॥ २१ ॥ बुद्धिरात्मा च सहिता धर्मं पश्यन्ति नित्यदा । बृहस्पतिजीने कहा—धर्मराज! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, यम, बुद्धि और आत्मा—ये सब सदा एक साथ मनुष्यके धर्मपर दृष्टि रखते हैं ॥ २१ १/२ ॥ प्राणिनामिह सर्वेषां साक्षिभूता निशानिशम् ॥ २२ ॥ एतैश्च सह धर्मोऽपि तं जीवमनुगच्छति । दिन और रात भी इस जगत्‌के सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मोंके साक्षी हैं। इन सबके साथ धर्म भी जीवका अनुसरण करता है ॥ २२ १/२ ॥ त्वगस्थिमांसं शुक्रं च शोणितं च महामते ॥ २३ ॥ शरीरं वर्जयन्त्येते जीवितेन विवर्जितम् । महामते! त्वचा, अस्थि, मांस, शुक्र और शोणित—ये सब धातु निष्प्राण शरीरका परित्याग कर देते हैं अर्थात् ये उस शरीरधारी जीवात्माका साथ छोड़ देते हैं, एक धर्म ही उसके साथ जाता है ॥ २३ १/२ ॥ ततो धर्मसमायुक्तः प्राप्नुते जीव एव हि ॥ २४ ॥ ततोऽस्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम् । देवताः पञ्चभूतस्थाः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २५ ॥ इसलिये धर्मयुक्त जीव ही परमगति प्राप्त करता है। फिर परलोकमें अपने कर्मोंका भोग समाप्त करके प्राणी जब दूसरा शरीर धारण करता है, उस समय उसके शरीरके पाँचों भूतोंमें स्थित अधिष्ठाता देवता उस जीवके शुभ और अशुभ कर्मोंको देखते हैं। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २४-२५ ॥ ततो धर्मसमायुक्तः स जीवः सुखमेधते । इहलोके परे चैव किं भूयः कथयामि ते ॥ २६ ॥ तदनन्तर धर्मयुक्त वह जीव इहलोक और परलोकमें सुखका अनुभव करता है। अब तुम्हें और क्या बताऊँ? ॥ २६ ॥

युधिष्ठिर उवाच

तद् दर्शितं भगवता यथा धर्मोऽनुगच्छति । एतत् तु ज्ञातुमिच्छामि कथं रेतः प्रवर्तते ॥ २७ ॥