महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 962, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिंहव्याघ्रप्रयुक्तैस्तु मेघनिःस्वननादितैः ॥ १०६ ॥ स रथैर्नन्दिघोषैश्च पृष्ठतो ह्यनुगम्यते । देवकन्यासमारूढैः काञ्चनैर्विमलैः शुभैः ॥ १०७ ॥ उसके पीछे सिंहों और व्याघ्रोंसे जुते हुए तथा मेघोंकी गम्भीर गर्जनासे निनादित बहुसंख्यक रथ सानन्द विजयघोष करते हुए चलते हैं। उन सुवर्णमय, निर्मल एवं मंगलकारी रथोंपर देवकन्याएँ आरूढ़ होती हैं ॥ १०६-१०७ ॥ विमानमुत्तमं दिव्यमास्थाय सुमनोहरम् । तत्र कल्पसहस्रं वै वसते स्त्रीशतावृते ॥ १०८ ॥ सुधारसं चोपजीवन्नमृतोपममुत्तमम् । वह दिव्य, उत्तम एवं मनोहर विमानपर विराजमान हो सैकड़ों सुन्दरियोंसे भरे हुए महलमें सहस्र कल्पोंतक निवास करता है। वहाँ देवताओंके भोज्य अमृतके समान उत्तम सुधारसको पीकर वह जीवन बिताता है ॥ १०८ १/२ ॥ षड्विंशे दिवसे यस्तु प्रकुर्यादेकभोजनम् ॥ १०९ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु नियतो नियताशनः । जितेन्द्रियो वीतरागो जुह्वानो जातवेदसम् ॥ ११० ॥ स प्राप्नोति महाभागः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः । सप्तानां मरुतां लोकान् वसूनां चापि सोऽश्नुते ॥ १११ ॥ जो लगातार बारह महीनोंतक मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर मिताहारी हो छब्बीसवें दिन एक बार भोजन करता है तथा वीतराग और जितेन्द्रिय हो प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह महाभाग मनुष्य अप्सराओंसे पूजित हो सात मरुद्गणों और आठ वसुओंके लोकोंमें जाता है ॥ १०९—१११ ॥ विमानैः स्फाटिकैर्दिव्यैः सर्वरत्नैरलंकृतैः । गन्धर्वैरप्सरोभिश्च पूज्यमानः प्रमोदते ॥ ११२ ॥ द्वे युगानां सहस्रे तु दिव्ये दिव्येन तेजसा । सम्पूर्ण रत्नोंसे अलंकृत स्फटिक मणिमय दिव्य विमानोंसे सम्पन्न हो गन्धर्वों और अप्सराओंद्वारा पूजित होता हुआ दिव्य तेजसे युक्त हो देवताओंके दो हजार दिव्य युगोंतक वह उन लोकोंमें आनन्द भोगता है ॥ ११२ १/२ ॥ सप्तविंशेऽथ दिवसे यः कुर्यादेकभोजनम् ॥ ११३ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु जुह्वानो जातवेदसम् । फलं प्राप्नोति विपुलं देवलोके च पूज्यते ॥ ११४ ॥ जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर सत्ताईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह प्रचुर फलका भागी होता और देवलोकमें सम्मान पाता है ॥ ११३-११४ ॥