भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 963, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 963

अमृताशी वसंस्तत्र स वितृष्णः प्रमोदिते । देवर्षिचरितं राजन् राजर्षिभिरनुष्ठितम् ॥ ११५ ॥ अध्यावसति दिव्यात्मा विमानवरमास्थितः । स्त्रीभिर्मनोभिरामाभी रममाणो मदोत्कटः ॥ ११६ ॥ युगकल्पसहस्राणि त्रीण्यावसति वै सुखम् । वहाँ उसे अमृतका आहार प्राप्त होता है तथा वह तृणारहित हो वहाँ रहकर आनन्द भोगता है। राजन्! वह दिव्यरूपधारी पुरुष राजर्षियोंद्वारा वर्णित देवर्षियोंके चरित्रका श्रवण-मनन करता है और श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो मनोरम सुन्दरियोंके साथ मदोन्मत्तभावसे रमण करता हुआ तीन हजार युगों एवं कल्पोंतक वहाँ सुखपूर्वक निवास करता है ॥ ११५-११६ ½ ॥

योऽष्टाविंशे तु दिवसे प्राश्नीयादेकभोजनम् ॥ ११७ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु जितात्मा विजितेन्द्रियः । फलं देवर्षिचरितं विपुलं समुपामुते ॥ ११८ ॥ जो बारह महीनोंतक सदा अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर अट्ठाईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह देवर्षियोंको प्राप्त होनेवाले महान् फलका उपभोग करता है ॥ ११७-११८ ॥

भोगवांस्तेजसा भाति सहस्रांशुरिवामलः । सुकुमार्यश्च नार्यस्तं रममाणाः सुवर्चसः ॥ ११९ ॥ पीनस्तनोरुजघना दिव्याभरणभूषिताः । रमयन्ति मनःकान्ते विमाने सूर्यसंनिभे ॥ १२० ॥ सर्वकामगमे दिव्ये कल्पायुतशतं समाः । वह भोगसे सम्पन्न हो अपने तेजसे निर्मल सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है और सुन्दर कान्तिवाली, पीन उरोज, जाँघ और जघन प्रदेशवाली, दिव्य वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुकुमारी रमणियाँ सूर्यके समान प्रकाशित और सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाले मनोरम दिव्य विमानपर बैठकर उस पुण्यात्मा पुरुषका दस लाख कल्पोंके वर्षोंतक मनोरंजन करती हैं ॥ ११९-१२० ½ ॥

एकोनत्रिंशे दिवसे यः प्राशेदकभोजनम् ॥ १२१ ॥ सदा द्वादशमासान् वै सत्यव्रतपरायणः । तस्य लोकाः शुभा दिव्या देवराजर्षिपूजिताः ॥ १२२ ॥ जो बारह महीनोंतक सदा सत्यव्रतके पालनमें तत्पर हो उन्तीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे देवर्षियों तथा राजर्षियोंद्वारा पूजित दिव्य मंगलमय लोक प्राप्त होते हैं ॥ १२१-१२२ ॥ विमानं सूर्यचन्द्राभं दिव्यं समधिगच्छति ।