महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 964, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजातरूपमयं युक्तं सर्वरत्नसमन्वितम् ॥ १२३ ॥ वह सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित, सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित तथा आवश्यक सामग्रियोंसे युक्त सुवर्णमय दिव्य विमान प्राप्त करता है ॥ १२३ ॥ अप्सरोगणसम्पूर्णं गन्धर्वैरभिनादितम् । तत्र चैनं शुभा नार्यो दिव्याभरणभूषिताः ॥ १२४ ॥ मनोऽभिरामा मधुरा रमयन्ति मदोत्कटाः । उस विमानमें अप्सराएँ भरी रहती हैं, गन्धर्वोंके गीतोंकी मधुर ध्वनिसे वह विमान गूँजता रहता है। उस विमानमें दिव्य आभूषणोंसे विभूषित, शुभ लक्षणसम्पन्न, मनोभिराम, मदमत्त एवं मधुरभाषिणी रमणियाँ उस पुरुषका मनोरंजन करती हैं ॥ १२४ ½ ॥ भोगवांस्तेजसा युक्तो वैश्वानरसमप्रभः ॥ १२५ ॥ दिव्यो दिव्येन वपुषा भ्राजमान इवामरः । वसूनां मरुतां चैव साध्यानामश्विनोस्तथा ॥ १२६ ॥ रुद्राणां च तथा लोकं ब्रह्मलोकं च गच्छति । वह पुरुष भोगसम्पन्न, तेजस्वी, अग्निके समान दीप्तिमान्, अपने दिव्य शरीरसे देवताकी भाँति प्रकाशमान तथा दिव्यभावसे युक्त हो वसुओं, मरुद्गणों, साध्यगणों, अश्विनीकुमारों, रुद्रों तथा ब्रह्माजीके लोकमें भी जाता है ॥ १२५-१२६ ½ ॥ यस्तु मासे गते भुङ्क्ते एकभक्तं शमात्मकः ॥ १२७ ॥ सदा द्वादशमासान् वै ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् । जो बारह महीनोंतक प्रत्येक मास व्यतीत होनेपर तीसवें दिन एक बार भोजन करता और सदा शान्तभावसे रहता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है ॥ १२७ ½ ॥ सुधारसकृताहारः श्रीमान् सर्वमनोहरः ॥ १२८ ॥ तेजसा वपुषा लक्ष्म्या भ्राजते रश्मिवानिव । वह वहाँ सुधारसका भोजन करता और सबके मनको हर लेनेवाला कान्तिमान् रूप धारण करता है। वह अपने तेज, सुन्दर शरीर तथा अंगकान्तिसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है ॥ १२८ ½ ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धानुलेपनः ॥ १२९ ॥ सुखेष्वभिरतो भोगी दुःखानामविजानकः । दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यगन्ध और दिव्य अनुलेपन धारण करके वह भोगकी शक्ति और साधनसे सम्पन्न हो सुख-भोगमें ही रत रहता है। दुःखोंका उसे कभी अनुभव नहीं होता है ॥ १२९ ½ ॥ स्वयंप्रभाभिर्नारीभिर्विमानस्थो महीयते ॥ १३० ॥ रुद्रदेवर्षिकन्याभिः सततं चाभिपूज्यते ।