महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 965, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनानारमणरूपाभिर्नानारागाभिरेव च ।। १३१ ।। नानामधुरभाषाभिर्नानारतिभिरेव च । वह विमानपर आरूढ़ हो अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होनेवाली दिव्य नारियोंद्वारा सम्मानित होता है। रुद्रों तथा देवर्षियोंकी कन्याएँ सदा उसकी पूजा करती हैं। वे कन्याएँ नाना प्रकारके रमणीय रूप, विभिन्न प्रकारके राग, भाँति-भाँतिकी मधुर भाषणकला तथा अनेक तरहकी रति-क्रीड़ाओंसे सुशोभित होती हैं ।। १३०-१३१ १/२ ।। विमाने गगनाकारे सूर्यवैदूर्यसंनिभे ।। १३२ ।। पृष्ठतः सोमसंकाशे उदर्कै चाभ्रसन्निभे । दक्षिणायां तु रक्ताभे अधस्तान्नीलमण्डले ।। १३३ ।। ऊर्ध्वं विचित्रसंकाशे नैको वसति पूजितः । जिस विमानपर वह विराजमान होता है, वह आकाशके समान विशाल दिखायी देता है। सूर्य और वैदूर्यमणिके समान तेजस्वी जान पड़ता है। उसका पिछला भाग चन्द्रमाके समान, वामभाग मेघके सदृश, दाहिना भाग लाल प्रभासे युक्त, निचला भाग नीलमण्डलके समान तथा ऊपरका भाग अनेक रंगोंके सम्मिश्रणसे विचित्र-सा प्रतीत होता है। उसमें वह अनेक नर-नारियोंके साथ सम्मानित होकर रहता है ।। १३२-१३३ १/२ ।। यावद् वर्षसहस्रं वै जम्बूद्वीपे प्रवर्षति ।। १३४ ।। तावत् संवत्सराः प्रोक्ता ब्रह्मलोकेऽस्य धीमतः । मेघ जम्बूद्वीपमें जितने जलबिन्दुओंकी वर्षा करता है, उतने हजार वर्षोंतक उस बुद्धिमान् पुरुषका ब्रह्मलोकमें निवास बताया गया है ।। १३४ १/२ ।। विप्रुषश्चैव यावन्त्यो निपतन्ति नभस्तलात् ।। १३५ ।। वर्षासु वर्षतस्तावन्निवसत्यमरप्रभः । वर्षा-ऋतुमें आकाशसे धरतीपर जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने वर्षोंतक वह देवोपम तेजस्वी पुरुष ब्रह्मलोकमें निवास करता है ।। १३५ १/२ ।। मासोपवासी वर्षैस्तु दशभिः स्वर्गमुत्तमम् ।। १३६ ।। महर्षित्वमथासाद्य सशरीरगतिर्भवेत् । दस वर्षोंतक एक-एक मास उपवास करके इकतीसवें दिन भोजन करनेवाला पुरुष उत्तम स्वर्ग लोकको जाता है। वह महर्षि पदको प्राप्त होकर सशरीर दिव्यलोककी यात्रा करता है ।। १३६ १/२ ।। मुनिर्दान्तो जितक्रोधो जितशिश्वोदरः सदा ।। १३७ ।। जुह्वन्नग्नींश्च नियतः संध्योपासनसेविता । बहुभिर्नियमैरेवं शुचिरश्राति यो नरः ।। १३८ ।। अभ्रावकाशशीलश्च तस्य भानोरिव त्विषः ।