भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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पृष्ठ 966

जो मनुष्य सदा मुनि, जितेन्द्रिय, क्रोधको जीतनेवाला, शिश्न और उदरके वेगको सदा काबूमें रखनेवाला, नियमपूर्वक तीनों अग्नियोंमें आहुति देनेवाला और संध्योपासनामें तत्पर रहनेवाला है तथा जो पवित्र होकर इन पहले बताये हुए अनेक प्रकारके नियमोंके पालनपूर्वक भोजन करता है, वह आकाशके समान निर्मल होता है और उसकी कान्ति सूर्यकी प्रभाके समान प्रकाशित होती है॥

दिवं गत्वा शरीरेण स्वेन राजन् यथामरः ॥ १३९ ॥ स्वर्गं पुण्यं यथाकाममुपभुङ्क्ते तथाविधः । राजन्! ऐसे गुणोंसे युक्त पुरुष देवताके समान अपने शरीरके साथ ही देवलोकमें जाकर वहाँ इच्छाके अनुसार स्वर्गके पुण्यफलका उपभोग करता है॥ १३९ १/२॥

एष ते भरतश्रेष्ठ यज्ञानां विधिरुत्तमः ॥ १४० ॥ व्याख्यातो ह्यानुपूर्व्येण उपवासफलात्मकः । दरिद्रैर्मनुजैः पार्थ प्राप्तं यज्ञफलं यथा ॥ १४१ ॥ भरतश्रेष्ठ! यह तुम्हें यज्ञोंका उत्तम विधान क्रमशः विस्तारपूर्वक बताया गया है। इसमें उपवासके फलपर प्रकाश डाला गया है। कुन्तीनन्दन! दरिद्र मनुष्योंने इन उपवासात्मक व्रतोंका अनुष्ठान करके यज्ञोंका फल प्राप्त किया है॥ १४०-१४१ ॥

उपवासानिमान् कृत्वा गच्छेच्च परमां गतिम् । देवद्विजातिपूजायां रतो भरतसत्तम ॥ १४२ ॥ भरतश्रेष्ठ! देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजामें तत्पर रहकर जो इन उपवासोंका पालन करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है॥ १४२ ॥

उपवासविधिस्त्वेष विस्तरेण प्रकीर्तितः । नियतेष्वप्रमत्तेषु शौचवत्सु महात्मसु ॥ १४३ ॥ दम्भद्रोहनिवृत्तेषु कृतबुद्धिषु भारत । अचलेष्वप्रकम्पेषु मा ते भूदत्र संशयः ॥ १४४ ॥ भारत! नियमशील, सावधान, शौचाचारसे सम्पन्न, महामनस्वी, दम्भ और द्रोहसे रहित, विशुद्ध बुद्धि, अचल और स्थिर स्वभाववाले मनुष्योंके लिये मैंने यह उपवासकी विधि विस्तारपूर्वक बतायी है। इस विषयमें तुम्हें संदेह नहीं करना चाहिये॥ १४३-१४४॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उपवासविधिर्नाम सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उपवासकी विधिनामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १०७॥