महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 961, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंरमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषितः । जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बाईसवाँ दिन प्राप्त होनेपर एक बार भोजन करता है तथा अहिंसामें तत्पर, बुद्धिमान्, सत्यवादी और दोषदृष्टिसे रहित होता है, वह सूर्यके समान तेजस्वी रूप धारण करके श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो वसुओंके लोकमें जाता है। वहाँ इच्छानुसार विचरता, अमृत पीकर रहता और दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो देवकन्याओंके साथ रमण करता है ॥ ९६—९८ १/२ ॥ त्रयोविंशे तु दिवसे प्राशेद यस्त्वेकभोजनम् ॥ ९९ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु मिताहारो जितेन्द्रियः । वायोरुशनसश्चैव रुद्रलोकं च गच्छति ॥ १०० ॥ जो लगातार बारह महीनोंतक मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर तेईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह वायु, शुक्राचार्य तथा रुद्रके लोकमें जाता है ॥ कामचारी कामगमः पूज्यमानोऽप्सरोगणैः । अनेकगुणपर्यन्तं विमानवरमास्थितः ॥ १०१ ॥ रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषितः । वहाँ अनेक गुणोंसे युक्त श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो इच्छानुसार विचरता, जहाँ इच्छा होती वहाँ जाता और अप्सराओंद्वारा पूजित होता है। उन लोकोंमें वह दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो देवकन्याओंके साथ रमण करता है ॥ १०१ १/२ ॥ चतुर्विंशे तु दिवसे यः प्राप्ते प्राश्ते हविः ॥ १०२ ॥ सदा द्वादशमासांश्च जुह्वानो जातवेदसम् । आदित्यानामधीवासे मोदमानो वसेच्चिरम् ॥ १०३ ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धानुलेपनः । जो लगातार बारह महीनोंतक अग्निहोत्र करता हुआ चौबीसवें दिन एक बार हविष्यान्न भोजन करता है, वह दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यगन्ध तथा दिव्य अनुलेपन धारण करके सुदीर्घकालतक आदित्यलोकमें सानन्द निवास करता है ॥ १०२-१०३ १/२ ॥ विमाने काञ्चने दिव्ये हंसयुक्ते मनोरमे ॥ १०४ ॥ रमते देवकन्यानां सहस्रैरयुतैस्तथा । वहाँ हंसयुक्त मनोरम एवं दिव्य सुवर्णमय विमानपर वह सहस्रों तथा अयुतों देवकन्याओंके साथ रमण करता है ॥ १०४ १/२ ॥ पञ्चविंशे तु दिवसे यः प्राशेदकभोजनम् ॥ १०५ ॥ सदा द्वादशमासांस्तु पुष्कलं यानमारुहेत् । जो लगातार बारह महीनोंतक पचीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसको सवारीके लिये बहुत-से विमान या वाहन प्राप्त होते हैं ॥ १०५ १/२ ॥