भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 979, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 979

मनुष्यका स्थूल शरीर तो मरकर यहीं पड़ा रह जाता है और उसका सूक्ष्म शरीर अव्यक्तभावको प्राप्त हो जाता है—नेत्रोंकी पहुँचसे परे है। ऐसी दशामें धर्म किस प्रकार उसका अनुसरण करता है? ॥ २० १/२ ॥

बृहस्पतिरुवाच

पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिर्मनोऽन्तकः ॥ २१ ॥ बुद्धिरात्मा च सहिता धर्मं पश्यन्ति नित्यदा । बृहस्पतिजीने कहा—धर्मराज! पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, यम, बुद्धि और आत्मा—ये सब सदा एक साथ मनुष्यके धर्मपर दृष्टि रखते हैं ॥ २१ १/२ ॥ प्राणिनामिह सर्वेषां साक्षिभूता निशानिशम् ॥ २२ ॥ एतैश्च सह धर्मोऽपि तं जीवमनुगच्छति । दिन और रात भी इस जगत्‌के सम्पूर्ण प्राणियोंके कर्मोंके साक्षी हैं। इन सबके साथ धर्म भी जीवका अनुसरण करता है ॥ २२ १/२ ॥ त्वगस्थिमांसं शुक्रं च शोणितं च महामते ॥ २३ ॥ शरीरं वर्जयन्त्येते जीवितेन विवर्जितम् । महामते! त्वचा, अस्थि, मांस, शुक्र और शोणित—ये सब धातु निष्प्राण शरीरका परित्याग कर देते हैं अर्थात् ये उस शरीरधारी जीवात्माका साथ छोड़ देते हैं, एक धर्म ही उसके साथ जाता है ॥ २३ १/२ ॥ ततो धर्मसमायुक्तः प्राप्नुते जीव एव हि ॥ २४ ॥ ततोऽस्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम् । देवताः पञ्चभूतस्थाः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २५ ॥ इसलिये धर्मयुक्त जीव ही परमगति प्राप्त करता है। फिर परलोकमें अपने कर्मोंका भोग समाप्त करके प्राणी जब दूसरा शरीर धारण करता है, उस समय उसके शरीरके पाँचों भूतोंमें स्थित अधिष्ठाता देवता उस जीवके शुभ और अशुभ कर्मोंको देखते हैं। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो? ॥ २४-२५ ॥ ततो धर्मसमायुक्तः स जीवः सुखमेधते । इहलोके परे चैव किं भूयः कथयामि ते ॥ २६ ॥ तदनन्तर धर्मयुक्त वह जीव इहलोक और परलोकमें सुखका अनुभव करता है। अब तुम्हें और क्या बताऊँ? ॥ २६ ॥

युधिष्ठिर उवाच

तद् दर्शितं भगवता यथा धर्मोऽनुगच्छति । एतत् तु ज्ञातुमिच्छामि कथं रेतः प्रवर्तते ॥ २७ ॥