भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 980, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 980

**युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! धर्म जिस प्रकार जीवका अनुसरण करता है, वह तो आपने समझा दिया। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि इस शरीरमें वीर्यकी उत्पत्ति कैसे होती है? ।। २७ ।।

बृहस्पतिरुवाच

अन्नमश्नन्ति यद् देवाः शरीरस्था नरेश्वर ।
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिर्मनस्तथा ।। २८ ।।
ततस्तृप्तेषु राजेन्द्र तेषु भूतेषु पञ्चसु ।
मनःषष्ठेषु शुद्धात्मन् रेतः सम्पद्यते महत् ।। २९ ।।
**बृहस्पतिजीने कहा—**शुद्धात्मन्! नरेश्वर! राजेन्द्र! इस शरीरमें स्थित पृथिवी, जल, अन्न, वायु, आकाश और मनके अधिष्ठाता देवता जो अन्न भक्षण करते हैं और उस अन्नसे मनसहित वे पाँचों भूत जब पूर्ण तृप्त होते हैं, तब महान् रेतस् (वीर्य) की उत्पत्ति होती है ।। २८-२९ ।।

ततो गर्भः सम्भवति श्लेषात् स्त्रीपुंसयोर्नृप ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं भूयः किं श्रोतुमिच्छसि ।। ३० ।।
राजन्! फिर स्त्री-पुरुषका संयोग होनेपर वही वीर्य गर्भका रूप धारण करता है। ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दीं। अब और क्या सुनना चाहते हो? ।। ३० ।।

युधिष्ठिर उवाच

आख्यातं मे भगवता गर्भः संजायते यथा ।
यथा जातस्तु पुरुषः प्रपद्यति तदुच्यताम् ।। ३१ ।।
**युधिष्ठिरने कहा—**भगवन्! गर्भ जिस प्रकार उत्पन्न होता है, वह आपने बताया। अब यह बताइये कि उत्पन्न हुआ पुरुष पुनः किस प्रकार बन्धनमें पड़ता है ।। ३१ ।।

बृहस्पतिरुवाच

आसन्नमात्रः पुरुषस्तैर्भूतैरभिभूयते ।
विप्रयुक्तश्च तैर्भूतैः पुनर्यात्यपरां गतिम् ।। ३२ ।।
**बृहस्पतिजीने कहा—**राजन्! जीव उस वीर्यमें प्रविष्ट होकर जब गर्भमें संनिहित होता है, तब वे पाँचों भूत शरीररूपमें परिणत हो उसे बाँध लेते हैं, फिर उन्हीं भूतोंसे विलग होनेपर वह दूसरी गतिको प्राप्त होता है ।।
सर्वभूतसमायुक्तः प्राप्नुते जीव एव हि ।
ततोऽस्य कर्म पश्यन्ति शुभं वा यदि वाशुभम् ।
देवताः पञ्चभूतस्थाः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।। ३३ ।।