महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 981, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंशरीरमें सम्पूर्ण भूतोंसे युक्त हुआ वह जीव ही सुख या दुःख पाता है। उस समय पाँचों भूतोंमें स्थित उनके अधिष्ठाता देवता जीवके शुभ या अशुभ कर्मको देखते हैं। अब और क्या सुनना चाहते हो? ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
त्वगस्थिमांसमुत्सृज्य तैश्च भूतैर्विवर्जितः ।
जीवः स भगवन् क्वस्थः सुखदुःखे समश्नुते ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! जीव त्वचा, अस्थि और मांसमय शरीरका त्याग करके जब पाँचों भूतोंके सम्बन्धसे पृथक् हो जाता है, तब कहाँ रहकर वह सुख-दुःखका उपभोग करता है? ॥ ३४ ॥
बृहस्पतिरुवाच
जीवः कर्मसमायुक्तः शीघ्रं रेतस्त्वमागतः ।
स्त्रीणां पुष्पं समासाद्य सूते कालेन भारत ॥ ३५ ॥
बृहस्पतिजीने कहा—भारत! जीव अपने कर्मोंसे प्रेरित होकर शीघ्र ही वीर्यभावको प्राप्त होता है और स्त्रीके रजमें प्रविष्ट होकर समयानुसार जन्म धारण करता है ॥ ३५ ॥
यमस्य पुरुषैः क्लेशं यमस्य पुरुषैर्वधम् ।
दुःखं संसारचक्रं च नरः क्लेशं स विन्दति ॥ ३६ ॥
(गर्भमें आनेके पहले सूक्ष्मशरीरमें स्थित होकर अपने दुष्कर्मोंके कारण) वह यमदूतोंद्वारा नाना प्रकारके क्लेश पाता, उनके प्रहार सहता और दुःखमय संसारचक्रमें भाँति-भाँतिके कष्ट भोगता है ॥ ३६ ॥
इहलोके च स प्राणी जन्मप्रभृति पार्थिव ।
सुकृतं कर्म वै भुङ्क्ते धर्मस्य फलमाश्रितः ॥ ३७ ॥
यदि धर्मं यथाशक्ति जन्मप्रभृति सेवते ।
ततः स पुरुषो भूत्वा सेवते नित्यदा सुखम् ॥ ३८ ॥
पृथ्वीनाथ! यदि प्राणी इस लोकमें जन्मसे ही पुण्यकर्ममें लगा रहता है तो वह धर्मके फलका आश्रय लेकर उसके अनुसार सुख भोगता है। यदि अपनी शक्तिके अनुसार बाल्यकालसे ही धर्मका सेवन करता है तो वह मनुष्य होकर सदा सुखका अनुभव करता है ।।
अथान्तरा तु धर्मस्याप्यधर्ममुपसेवते ।
सुखस्यानन्तरं दुःखं स जीवोऽप्यधिगच्छति ॥ ३९ ॥
किंतु धर्मके बीचमें यदि कभी-कभी वह अधर्मका भी आचरण कर बैठता है तो उसे सुखके बाद दुःख भी भोगना पड़ता है ॥ ३९ ॥
अधर्मेण समायुक्तो यमस्य विषयं गतः ।