महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 982, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहद् दुःखं समासाद्य तिर्यग्योनौ प्रजायते ॥ ४० ॥ अधर्मपरायण मनुष्य यमलोकमें जाता है और वहाँ महान् दुःख भोगकर यहाँ पशु-पक्षियोंकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ४० ॥
कर्मणा येन येनेह यस्यां योनौ प्रजायते । जीवो मोहसमायुक्तस्तन्मे निगदतः शृणु ॥ ४१ ॥ जीव मोहके वशीभूत होकर जिस-जिस कर्मका अनुष्ठान करनेसे जैसी-जैसी योनिमें जन्म धारण करता है, उसे बता रहा हूँ, सुनो ॥ ४१ ॥
यदेतदुच्यते शास्त्रे सेतिहासे च छन्दसि । यमस्य विषयं घोरं मर्त्यो लोकः प्रपद्यते ॥ ४२ ॥ शास्त्र, इतिहास और वेदमें जो यह बात बतायी गयी है कि मनुष्य इस लोकमें पाप करनेपर मृत्युके पश्चात् यमराजके भयंकर लोकमें जाता है, यह सत्य ही है ॥
इह स्थानानि पुण्यानि देवतुल्यानि भूपते । तिर्यग्योन्यतिरिक्तानि गतिमन्ति च सर्वशः ॥ ४३ ॥ भूपाल! इस यमलोकमें देवलोकके समान पुण्यमय स्थान भी हैं, जिनमें तिर्यक् (तथा कीट-पतंग आदि) योनिके प्राणियोंको छोड़कर समस्त पुण्यात्मा जंगम जीव जाते हैं ॥ ४३ ॥
यमस्य भवने दिव्ये ब्रह्मलोकसमे गुणैः । कर्मभिर्नियतैर्बद्धो जन्तुर्दुःखान्युपाश्नुते ॥ ४४ ॥ यमराजका भवन सौन्दर्य आदि गुणोंके कारण ब्रह्मलोकके समान दिव्य भी है। परंतु अपने नियत पापकर्मोंसे बँधा हुआ जीव वहाँ भी नरकमें पड़कर दुःख भोगता है ॥ ४४ ॥
येन येन तु भावेन कर्मणा पुरुषो गतिम् । प्रयाति परुषां घोरां तत्ते वक्ष्याम्यतः परम् ॥ ४५ ॥ मनुष्य जिस-जिस भाव और जिस-जिस कर्मसे निष्ठुरतापूर्ण भयंकर गतिको प्राप्त होता है, अब उसीको बता रहा हूँ ॥ ४५ ॥
अधीत्य चतुरो वेदान् द्विजो मोहसमन्वितः । पतितात् प्रतिगृह्याथ खरयोनौ प्रजायते ॥ ४६ ॥ जो द्विज चारों वेदोंका अध्ययन करनेके बाद भी मोहवश पतित मनुष्योंसे दान लेता है, उसका गदहेकी योनिमें जन्म होता है ॥ ४६ ॥
खरो जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत । खरो मृतो बलीवर्दः सप्त वर्षाणि जीवति ॥ ४७ ॥ भारत! गदहेकी योनिमें वह पंद्रह वर्षोंतक जीवित रहता है। उसके बाद मरकर बैल होता है। उस योनिमें वह सात वर्षोंतक जीवित रहता है ॥ ४७ ॥
बलीवर्दो मृतश्चापि जायते ब्रह्मराक्षसः ।