भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 983, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 983

ब्रह्मराक्षसश्च मासांस्त्रींस्ततो जायति ब्राह्मणः ।। ४८ ।। जब बैलका शरीर छूट जाता है, तब वह ब्रह्मराक्षस होता है। तीन मासतक ब्रह्मराक्षस रहनेके बाद फिर वह ब्राह्मणका जन्म पाता है ॥ ४८ ॥ पतितं याजयित्वा तु कृमियोनौ प्रजायते । तत्र जीवति वर्षाणि दश पञ्च च भारत ।। ४९ ।। भारत! जो ब्राह्मण पतित पुरुषका यज्ञ कराता है, वह मरनेके बाद कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है और उस योनिमें पंद्रह वर्षोतक जीवित रहता है ॥ ४९ ॥ कृमिभावाद् विमुक्तस्तु ततो जायति गर्दभः । गर्दभः पञ्च वर्षाणि पञ्च वर्षाणि सूकरः ।। ५० ।। कुक्कुटः पञ्च वर्षाणि पञ्च वर्षाणि जम्बुकः । श्वा वर्षमेकं भवति ततो जायति मानवः ।। ५१ ।। कीड़ेकी योनिसे छूटनेपर वह गदहेका जन्म पाता है। पाँच वर्षतक गदहा रहकर पाँच वर्ष सूअर, पाँच वर्ष मुर्गा, पाँच वर्ष सियार और एक वर्ष कुत्ता होता है। उसके बाद वह मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होता है ।। उपाध्यायस्य यः पापं शिष्यः कुर्यादबुद्धिमान् । स जीव इह संसारांस्त्रीनाप्नोति न संशयः ।। ५२ ।। प्राक् श्वा भवति राजेन्द्र ततः क्रव्यात्ततः खरः । ततः प्रेतः परिक्लिष्टः पश्चाज्जायति ब्राह्मणः ।। ५३ ।। जो मूर्ख शिष्य अपने अध्यापकका अपराध करता है, वह यहाँ निम्नांकित तीन योनियोंमें जन्म ग्रहण करता है, इसमें संशय नहीं है। राजेन्द्र! पहले तो वह कुत्ता होता है, फिर राक्षस और गदहा होता है। उसके बाद मरकर प्रेतावस्थामें अनेक कष्ट भोगनेके पश्चात् ब्राह्मणका जन्म पाता है ॥ ५२-५३ ॥ मनसापि गुरोर्भार्या यः शिष्यो याति पापकृत् । स उग्रान् प्रेति संसारानधर्मेणेह चेतसा ।। ५४ ।। जो पापाचारी शिष्य गुरुपत्नीके साथ समागमका विचार भी मनमें लाता है, वह अपने मानसिक पापके कारण भयंकर योनियोंमें जन्म लेता है ॥ ५४ ॥ श्वयोनौ तु स सम्भूतस्त्रीणि वर्षाणि जीवति । तत्रापि निधनं प्राप्तः कृमियोनौ प्रजायते ।। ५५ ।। कृमिभावमनुप्राप्तो वर्षमेकं तु जीवति । ततस्तु निधनं प्राप्तो ब्रह्मयोनौ प्रजायते ।। ५६ ।। पहले कुत्तेकी योनिमें जन्म लेकर वह तीन वर्षतक जीवन धारण करता है। उस योनिमें मृत्युको प्राप्त होकर वह कीड़ेकी योनिमें उत्पन्न होता है। कीटयोनिमें जन्म लेकर वह एक