भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 978, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 978

लोग उसके मरे हुए शरीरको काठ और मिट्टीके ढेलेकी तरह फेंककर दो घड़ी रोते हैं और फिर उसकी ओरसे मुँह फेरकर चल देते हैं ।। १३ १/२ ।। तैस्तच्छरीरमुत्सृष्टं धर्म एकोऽनुगच्छति ।। १४ ।। तस्माद् धर्मः सहायश्च सेवितव्यः सदा नृभिः । वे कुटुम्बीजन तो उसके शरीरका परित्याग करके चले जाते हैं, किंतु एकमात्र धर्म ही उस जीवात्माका अनुसरण करता है; इसलिये धर्म ही सच्चा सहायक है। अतः मनुष्योंको सदा धर्मका ही सेवन करना चाहिये ।। प्राणी धर्मसमायुक्तो गच्छेत् स्वर्गगतिं पराम् ।। १५ ।। तथैवाधर्मसंयुक्तो नरकं चोपपद्यते । धर्मयुक्त प्राणी ही उत्तम स्वर्गमें जाता है और अधर्मपरायण जीव नरकमें पड़ता है ।। १५ १/२ ।। तस्मान्न्यायागतैरर्थैर्धर्मं सेवेत पण्डितः ।। १६ ।। धर्म एको मनुष्याणां सहायः पारलौकिकः । इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि न्यायसे प्राप्त हुए धनके द्वारा धर्मका अनुष्ठान करे। एकमात्र धर्म ही परलोकमें मनुष्योंका सहायक है ।। १६ १/२ ।। लोभान्मोहादनुक्रोशाद् भयाद् वाप्यबहुश्रुतः ।। १७ ।। नरः करोत्यकार्याणि परार्थे लोभमोहितः । जो बहुश्रुत नहीं है, वही मनुष्य लोभ और मोहके वशीभूत हो दूसरेके लिये लोभ, मोह, दया अथवा भयसे न करने योग्य पापकर्म कर बैठता है ।। १७ १/२ ।। धर्मश्चार्थश्च कामश्च त्रितयं जीविते फलम् ।। १८ ।। एतत् त्रयमवाप्तव्यमधर्मपरिवर्जितम् । धर्म, अर्थ और काम—ये तीन जीवनके फल हैं, अतः मनुष्यको अधर्मके त्यागपूर्वक इन तीनोंको उपलब्ध करना चाहिये ।। १८ १/२ ।।

युधिष्ठिर उवाच

श्रुतं भगवतो वाक्यं धर्मयुक्तं परं हितम् ।। १९ ।। शरीरनिचयं ज्ञातुं बुद्धिस्तु मम जायते । **युधिष्ठिरने पूछा—**भगवन्! आपके मुँहसे मैंने धर्मयुक्त परम हितकर बात सुनी। अब शरीरकी स्थिति जाननेके लिये मेरा विचार हो रहा है ।। १९ १/२ ।। मृतं शरीरं हि नृणां सूक्ष्ममव्यक्ततां गतम् ।। २० ।। अचक्षुर्विषयं प्राप्तं कथं धर्मोऽनुगच्छति ।

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