भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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श्रीगणेशाय नमः हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र पहला उल्लास : जीव-निस्तारोपाय-सम्बन्धी प्रश्न विविध प्रकार के रत्नों से शोभायमान, विभिन्न वृक्षों-लताओं से व्याप्त, नाना प्रकार के पक्षियों की ध्वनि से युक्त, सभी ऋतुओं में उत्पन्न होनेवाले फूलों की गन्ध से सुगन्धित, अति मनोरम, ठण्डी-सुगन्धित-हलकी हवा से कम्पायमान, अप्सराओं के सङ्गीत से उत्पन्न मधुर ध्वनि से गुंजित, स्थिर छायावाले वृक्षों की छाया से ढँके हुए, सुन्दर मस्त कोयलों के झुण्ड द्वारा समुचित शब्दायमान वन-प्रदेश-वाले, सभी समय भौरों आदि के सहित ऋतुराज वसन्त द्वारा सेवित, सिद्ध-चारण-गन्धर्व-गाणपत्य सभी से परिपूर्ण—इस प्रकार के रमणीय गिरीन्द्र अर्थात् कैलास-पर्वत के शिखर पर चराचर जगत् के गुरु, मौन रहनेवाले, दयामृत के सागर, कपूर और कुन्द- पुष्प के समान गौर वर्ण, विशुद्ध सत्व-गुण-मय, व्यापक पुरुष, दिक्-रूप वस्त्र धारण करनेवाले, सभी दीनों के नाथ, स्वयं श्रेष्ठ योगी, योगियों के प्रिय, गङ्गा-जल से भीगे हुए जटा-समूह से शोभित, भस्म से अलंकृत, शान्त अर्थात् संयमित अन्तःकरण वाले, सर्प-माला पहने हुए, नर-कपाल लिए हुए, तीनों लोकों के ईश्वर, त्रिशूल-धारी, आशु-तोष अर्थात् शीघ्र प्रसन्न होनेवाले, ज्ञान-मय, निर्वाण-मोक्ष-रूपी फल देनेवाले, निर्विकल्प, आशङ्का- रहित, निर्विशेष, निरञ्जन, निरामय, सबके कल्याणकारी, देवों के देव, प्रसन्न-मुख, सदानन्द सदाशिव के दर्शन कर विनय से झुकी हुई पार्वती देवी ने लोक-हित के लिए उनसे कहा— (१-१०) हे देव-देव ! जगन्नाथ, मेरे नाथ, करुणा-निधे ! मैं तुम्हारे अधीन हूँ। हे देवेश ! मैं सदा तुम्हारी आज्ञा माननेवाली हूँ। तुम्हारे आदेश को छोड़कर कुछ कहने में समर्थ नहीं हूँ। यदि मेरे ऊपर थोड़ी भी कृपा हो और यदि मुझ पर स्नेह हो, तो मेरे मन में जो कुछ विचार हैं, उन्हें कहती हूँ। हे महेश्वर ! तीनों लोकों में तुम्हारे सिवा और कौन है, जो इस संशय को दूर करने के योग्य है ? तुम्हीं सर्वज्ञ हो और सब शास्त्रों के जाननेवाले हो। (११-१३) सदाशिव ने कहा—हे महा-प्राज्ञे, हे प्राण-वल्लभे ! तुम क्या कहना चाहती हो, उसे कहो। अति गोपनीय होने पर भी, प्रिय पुत्र गणेश और सेना-पति कार्तिकेय से भी जो कहने योग्य नहीं होगा, उसे भी तुम्हें बताऊँगा। तीनों लोक में तुम्हारे लिए क्या गोपनीय है ? हे देवि ! तुम मेरा ही रूप हो, तुममें और मुझमें कोई भेद नहीं है। तुम सर्वज्ञा हो। क्या नहीं जानती हो, जो अनजान के समान पूछती हो ? महादेव के इस प्रकार के वाक्य सुनकर प्रसन्न-मन होकर साध्वी पार्वती ने विनय से झुककर शङ्कर से जिज्ञासा की। (१४-१७) आद्या ने कहा—हे भगवन्, सर्व-भूतेश ! हे सर्व-धर्म-विदां वर ! तुम षडैश्वर्यशाली, कृपालु और [ १ ] फा०—१

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