भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र सबके अन्तर्यामी हो । तुम्हारे द्वारा पूर्व-काल में चारों वेद प्रकाशित हुए हैं (१८) । इन वेदों से सभी धर्मों को वृद्धि हुई और वर्णाश्रमादि के नियम प्रतिष्ठित हुए (१६) । उन्हीं वेदों में कथित योग, यज्ञादि- रूप समस्त कर्मों द्वारा पृथ्वो पर पुण्य-शील सभी मनुष्यों ने 'कृत' अर्थात् 'सत्य-युग' में सभी देवताओं और पितरों को प्रसन्न किया (२०) । उस सत्य-युग में मनुष्य लोग पुण्य-शील होते थे और स्वाध्याय, ध्यान, तपस्या, दया, दानादि द्वारा जितेन्द्रिय होते थे। वे बड़े बली, वीर्य्य-वान् और अत्यन्त सत्य-पराक्रमी थे (२१) । वे मनुष्य मरण-धर्म-शील होने पर भी स्वर्गादि जाने में समर्थ, देव-तुल्य और नियम पालन करने में दृढ़ थे। सभी सज्जन, सत्य-धर्म के माननेवाले और सत्यवादी थे (२२) । उस युग में राज-वर्ग सत्य-निष्ठ और प्रजा-पालन में तत्पर था । पर-स्त्री को वे मातृ-वत् और पर-पुत्र को अपने पुत्र के समान स्नेह करते थे (२३) । तत्कालीन मनुष्य लोग पराए धन को लोष्ठ के समान देखते थे। वे स्वधर्म का पालन करते थे और सन्मार्ग पर चलते थे (२४) । उस सत्ययुग में कोई भी व्यक्ति भूठा नहीं था। किसी भी समय कोई प्रमाद, चोरी, पर-द्रोह नहीं करता था। कोई बुरे आशयवाला नहीं था (२५) । कोई भी व्यक्ति ईर्ष्यालु, अति-क्रोधी, कामुक नहीं था। सभी अच्छे अन्तः- करण, सदा आनन्दित हृदयवाले थे (२६) । उस काल में सारी पृथ्वी सभी फसलों से भरी-पूरी, सारे बादल यथा-समय वर्षा करनेवाले, सभी गाएँ खूब दूध देनेवाली, सारे वृक्ष बहुत फल देनेवाले होते थे (२७) । उस युग में कोई जीव अकाल मृत्यु के मुख में नहीं जाता था। दुर्भिक्ष या रोग होते नहीं थे। सारी प्रजा हृष्ट-पुष्ट, सदैव स्वस्थ, तेजस्वी और गुणों से सम्पन्न रहती थी। स्त्रियाँ व्यभिचारिणी नहीं थीं और पतिव्रता होती थीं (२८) । उस सत्ययुग में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र लोग अपने-अपने आचार को मानते हुए अपने-अपने वर्ण के लिए निर्दिष्ट धर्म का पालन करते हुए मोक्ष-पद को प्राप्त करते थे (२६) । सत्ययुग के बीतने पर, इस सभी धर्म में व्यतिक्रम दिखाई देने लगा। उस समय मनुष्य लोग समस्त वेदोक्त कर्मों द्वारा अपने-अपने अभीष्ट को पाने में समर्थ नहीं थे (३०) । अत्यधिक साधनवाले वैदिक कर्म उस समय बड़े कष्ट-साध्य हो गए थे। बहुत सी चिन्ताओं से व्याकुल होकर लोग उनका पालन करने में समर्थ नहीं थे (३१) । तथापि वैदिक कर्म का त्याग करने से विविध दोष होने की बात सुनने से वे लोग उस कर्म को छोड़ने में भी समर्थ नहीं थे। फलतः अपनी इस असमर्थता से वे सदैव व्याकुल-चित्त रहते थे (३२) । उसी समय आपने भू-तल पर 'स्मृति'-रूप वेदार्थ-युक्त शास्त्रों का प्रकाश किया। दुःख-शोक-रोग-दायक पाप के होने पर तपस्या-स्वाध्याय करने में दुर्बल सभी लोग उसके द्वारा अपना उद्धार करने लगे (३३) । इस भयानक संसार-सागर में आपके सिवा सभी जीवों का पालन-रक्षा-उद्धार करनेवाला-पिता के समान प्रिय करनेवाला प्रभु और कौन है ? (३४) । इसके बाद द्वापर-युग के आने पर मनुष्य के स्मृत्युक्त सुकर्म का त्याग हुआ; धर्माङ्गों का लोप हो गया; मनुष्य मानसिक व्यथा और व्याधि से व्याकुल हो उठा। उस समय तुम्हारे द्वारा व्यासादि रूप में 'संहिता'- शास्त्रादि के उपदेश से उन सब मनुष्यों का उद्धार हुआ (३५-३६) । उसके बाद पाप-रूपी, सभी धर्मों को लुप्त करनेवाला, दुराचार-दुष्कर्म को फैलानेवाला, दुष्ट कर्मों का प्रवर्त्तक कलियुग आया (३७) । इस समय वेद शक्तिमान न रहा, सभी स्मृतियों का किसे स्मरण था ? विविध इतिहास-युक्त, नाना मार्ग दिखानेवाले सभी पुराण नष्ट हो गए (३८) । हे विभो ! पुराणादि शास्त्रों का विनाश होने पर उस समय सभी लोग धर्म-कर्म से विमुख होंगे (३६) और परम्परा-रहित होकर मदोन्मत्त, पाप कर्म में तत्पर, कामुक, अति लोभी, निर्दय, दम्भख, शठ (४०), अल्पायु, मन्द-बुद्धि, रोग-शोक से अति व्याकुल, श्री-रहित, बल-हीन, नीचाचार-परायण (४१), सदा नीच-सङ्ग करनेवाले, पराए धन को हरण