भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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पहला उल्लास : जीव-निस्तारोपाय-सम्बन्धी प्रश्न | ३ करनेवाले, पर-निन्दा में तत्पर, पर-द्रोही, पर-योनि-परायण होंगे (४२) । पर-स्त्री का हरण करने में पाप की शङ्का और भय से शून्य होंगे। इस प्रकार सभी निर्धन, मलिन, दीन, दरिद्र, चिर-रोगी होंगे (४३) । सभी सन्ध्या-वन्दनादि से रहित होकर शूद्र के समान आचारवाले होंगे और अयाज्य अपकृष्ट जाति के पुरोहित, लोभी, दुर्वृत्त, पापी, (४४) मिथ्या-वादी, मूर्ख, दम्भी, दुष्ट कथा का विस्तार करनेवाले, कन्या बेचनेवाले, संस्कार-हीन और तपस्या-व्रत से पराङ्मुख होंगे (४५) । वे लोगों को ठगने के लिए जप-पूजा-परायण, पाखण्ड व्यवहार करनेवाले, अपने को पण्डित कहकर घमण्ड करनेवाले और श्रद्धा-भक्ति से रहित होंगे (४६) । कलि के ब्राह्मण सभी निन्द्य आहार करनेवाले, निन्द्य व्यवहार में तत्पर और 'धूतक' अर्थात् अपना पेट भरने के लिए जीवित रहनेवाले, शूद्र-सेवक, शूद्र का अन्न खानेवाले, क्रूर और शूद्र-पत्नी से रति-सम्भोग को इच्छा रखनेवाले होंगे (४७) । ये लोग धन के लोभ से अपनी स्त्री को नीच जाति में दान देंगे, इन लोगों का ब्राह्मण- सम्बन्धी चिह्न केवल सूत्र-धारण मात्र रहेगा (४८) । इन ब्राह्मणों का पानादि नियम और भक्ष्याभक्ष्य का विचार न रहेगा । ये सदा धर्म-शास्त्र को निन्दा और सभी साधुओं से द्रोह करेंगे (४६) । उनके मन में कभी सत्कथा की बात तक न उठेगी। जीव के उद्धार के लिए तुम्हारे द्वारा समस्त 'तन्त्र' की रचना हुई है और भोग-मोक्ष-दायक निगम- आगम शास्त्र-समूह की भी रचना हुई है (५०) । इस तन्त्रादि शास्त्र में देव-देवी-गण के मन्त्र-यन्त्रादि का साधन (५१), सृष्टि-स्थिति-संहार रूपी बहुत से न्यास और बद्ध-पद्मासन आदि बहुत प्रकार के आसन बताए गए हैं तथा सभी देवताओं के मन्त्रों को सिद्धि देनेवाले पशु-भाव, वीर-भाव और दिव्य-भाव भी कहे गए हैं (५२) । इसमें शवासन, चितारोहण, मुण्ड-साधन, लता-साधनादि सभी असंख्य कर्म तुम्हारे द्वारा बताए गए हैं (५३) । परन्तु इस तन्त्र-शास्त्र में स्वयं तुम्हारे द्वारा पशु-भाव और दिव्य-भाव का निषेध किया गया है (५४) । कलि में पशु-भाव ही नहीं है, फिर दिव्य-भाव किस प्रकार हो सकता है ? कारण पशु-भावावलम्बियों का कर्तव्य है कि वे पत्र-पुष्प-फल-जल को स्वयं ही लावें, शूद्र को देखें नहीं और मन में भी स्त्री का स्मरण न करें (५५) । दिव्यभावापन्न व्यक्ति को देव-तुल्य होना है; सदा शुद्ध अन्तः-करणवाला, द्वन्द्व-सहनशील, वासना-रहित, सब प्राणियों में सम भाव रखनेवाला और क्षमावान् होना है (५६) । किन्तु इस क्षण में लोग कलि के पाप से युक्त, सदा अस्थिर-चित्त, निद्रा और आलस्यवाले होंगे । इन लोगों की भाव-शुद्धि किस प्रकार होगी ? (५७) । हे शङ्कर ! आपने 'पञ्च-तत्त्व' बताए हैं, उनसे 'वीर-साधन' कहा गया है (५८) । मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन—ये ही 'पञ्च-तत्त्व' आपने कहे हैं (५६) । कलि-काल में उत्पन्न सभी मनुष्य लोभी और शिश्नोदर-परायण होते हैं; वे लोग लोभ-वश उन 'पञ्च-तत्त्वों' से पतित होंगे, साधन नहीं करेंगे (६०) । वे लोग इन्द्रिय-सुख के लिए अधिकतर मधु-पान करके मदोन्मत्त और हिताहित के ज्ञान से शून्य हो जायेंगे (६१) । उनमें से कोई-कोई व्यक्ति पर-स्त्री-धर्षक अर्थात् परायी स्त्रियों का पतन करनेवाले होंगे; बहुत से लोग चोरी का सहारा लेंगे; वे सब महा-पापी लोग योनि का विचार न करेंगे (६२) । असीमित पानादि दोष से पृथ्वी पर मद-विह्वल बहुत से लोग शक्ति-हीन, रुग्ण, बुद्धि-हीन और विकलेन्द्रिय होकर जलाशय, गर्त, जङ्गल, महल से, पर्वत से गिरेंगे और मृत्यु को प्राप्त करेंगे (६३-६४) । इन सब मत्त लोगों में से कुछ तो गुरु-जनों और स्व-जनों से विवाद करेंगे; कुछ स्तब्ध (चुप) रहेंगे; अथवा कुछ अति पान से मृत-प्राय या कुछ बकवादी होंगे । ये सब अनुचित कार्य, क्रूर कर्म करनेवाले और धर्म-पथ को विलुप्त करनेवाले होंगे (६५-६६) । हे प्रभो, महा-देव ! हित-साधन के लिए जो सारे कर्म आपने बताए हैं, वे सब मनुष्य लोगों के लिए उल्टे हो