भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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४ | हिन्दी महा-निर्वाण मन्त्र जायँगे । कौन व्यक्ति योग का आश्रय लेगा ? या कौन व्यक्ति न्यासों का करने में समर्थ होगा ? (६७)। अथवा कौन स्तोत्र का पाठ करेगा ? या कौन व्यक्ति यन्त्राधार में पूजा करेगा या यन्त्र धारण करेगा ? अथवा कौन व्यक्ति पुरश्चरण करेगा ? (६८) । हे जगत्पते ! युग-धर्म के प्रभाव से मनुष्य लोग स्वभावतः बड़े दुराचारी ओर सदा पाप करनेवाले होंगे । हे दीनेश प्रभो ! कृपा करके कलि में उत्पन्न मनुष्य लोगों के निस्तार का उपाय बताइये (६६), जिससे उनकी आयु, आरोग्य, तेज, बल, वीर्य की वृद्धि हो; उन्हें विद्या, बुद्धि प्राप्त हो; प्रयत्न बिना परम मङ्गल का लाभ हो (७०), जिससे सभी लोग महा-बली, पराक्रमी हों, शुद्ध-हृदय होकर परोपकार में तत्पर हों; माता- पिता का प्रिय करनेवाले हों (७१); जिससे सभी पुरुष स्वपत्नी-निष्ठ और पर-स्त्री-विमुख होकर देवता-गुरु- भक्त तथा पुत्र, स्वजनादि के पोषक हों (७२)। जिस उपाय से ये सब लोग ब्रह्मज्ञ, ब्रह्म-विद्या के ज्ञाता और ब्रह्म की चिन्ता में तत्पर हों; मनुष्यों के लोक-यात्रा के निर्वाह हेतु और पारलौकिक हित के लिए आप कृपा करके वही (उपाय) वर्णन करें (७३)। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्रादि वर्ण एवं आश्रम-भेद से जो कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य हैं, उन्हें कृपा करके प्रकट करें। त्रिभुवन में आपको छोड़कर समस्त लोगों का उद्धार करनेवाला कौन है ? ❇ ❖ ❇

दूसरा उल्लास : जीव-निस्तारोपाय का कथन

महा-करुणा-समुद्र, सभी लोगों के कल्याणकारी, शङ्कर ने आद्या देवी के इस प्रकार के वचन सुनकर प्रकृत कथा का प्रारम्भ किया (१) । सदाशिव ने कहा—हे महा-भागे ! तुम जगत् की हित-कारिणी हो, तुमने उत्तम प्रश्न किया है। इस प्रकार की मङ्गल-कथा को पहले किसी ने जानना नहीं चाहा (२) । हे भद्रे ! तुम धन्य हो, सुकृतज्ञा अर्थात् जीव की सुकृति को जाननेवाली हो । कलि-काल में उत्पन्न सभी (प्राणियों) की तुम्ही वास्तविक हित-कारिणी हो; तुमने जो-जो कहा है, वह सब अति ही सत्य है, इसमें सन्देह नहीं (३)। हे परमेश्वरि ! तुम धर्म को जाननेवाली हो, त्रिकाल की ज्ञाता हो, अतः सर्वज्ञा हो। हे प्रिये, भूत-भविष्यत्-वर्तमान धर्म-युक्त जो कहा है, वह यथार्थ, यथा-योग्य और न्यायसम्मत है, इसमें सन्देह नहीं (४)। हे सुरेश्वरि ! कलियुग में पाप से दुर्गति को प्राप्त, पवित्रापवित्र के विचार से शून्य ब्राह्मणादि लोगों की शुद्धि श्रौत अर्थात् वेदोक्त कर्म से नहीं होगी; पुराण, संहिता और सभी स्मृतियों से भी मनुष्यों को इष्ट-सिद्धि न होगी (५-६)। हे प्रिये ! मै सत्य-सत्य पुनः सत्य कहता हूँ, कलि-काल में आगमोक्त पथ के सिवा अन्य गति नहीं है (७) । हे शिवे ! पूर्व काल में श्रुति, स्मृति, पुराणादि मैने ही कहे हैं, कलि-काल में घोर व्यक्ति आगमोक्त विधि से ही देवगण की पूजा करे (८)। हे शङ्करि ! कलि-युग में आगम-शास्त्र का लङ्घन कर जो व्यक्ति अन्य पथ से चलेगा, उसका उद्धार नहीं होगा, यह मैं सत्य कहता हूँ, इसमें सन्देह नहीं (६)। वेद, पुराण, स्मृति और संहितादि शास्त्र द्वारा मैं ही प्रतिपाद्य हूँ, अन्य किसी का प्रतिपादन नहीं है। इस प्रकार जगत् में मेरे सिवा सर्वेश्वर प्रभु कोई नहीं है (१०)। वेदादि सभी शास्त्र मेरे पद को 'लोक-पावन' मानते हैं, मेरे पथ से विमुख सभी लोग ब्रह्म-घाती और पाखण्डी