महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा उल्लास : जीव-निस्तारोपाय का कथन | ५ हैं (११)। इसीलिए मेरे मत को छोड़कर जो व्यक्ति जो कर्म करता है, हे देवि ! वह कर्म निष्फल होता है और उस कर्म का करनेवाला नरक में जाता है (१२) । जो मूर्ख मेरे मत का त्याग कर अन्य मत को ग्रहण करता है वह ब्रह्म-हत्यारे, पितृ-हत्यारे, स्त्री-घातक के समान पापी होता है, इसमें सन्देह नहीं (१३) । कलि में तन्त्रोक्त सभी मन्त्र सिद्ध और शीघ्र फल-दायक हैं, जप-यज्ञ-क्रियादि में और सभी कर्मों में वे प्रशस्त हैं (१४)। कलि-काल में वेदोक्त सभी मन्त्र विष-हीन सर्प के समान शक्ति-रहित होते हैं। सत्यादि युग में वे सब मन्त्र फल देने में समर्थ थे, किन्तु कलि-काल में वे मृत के समान निष्फल हैं (१५) । जिस प्रकार दीवार में बनी हुई पुतली आँख, कान, नाक आदि सभी इन्द्रियों से युक्त होने पर भी कार्य करने में अर्थात् देखने, सुनने, जाने आदि में अशक्त है, उसी प्रकार तन्त्र में कथित मन्त्रों के सिवा अन्य मन्त्र उन-उन कार्यों के करने में असफल रहते हैं (१६)। तन्त्र में कथित मन्त्रों से भिन्न अन्य मन्त्र द्वारा कर्म करने पर फल नहीं मिलता, जिस प्रकार वन्ध्या स्त्री के सम्पर्क से सन्तान-रूप फल सिद्ध नहीं होता, यह भी उसी प्रकार निष्फल होता है, केवल श्रम भर होता है (१७)। जो मनुष्य इस कलि-युग में अन्य शास्त्र में कथित पथ से सिद्धि पाने की इच्छा करता है, वह दुर्बुद्धि मानों प्यासा होकर गङ्गा किनारे कुआँ खोदता है। मेरे मुख से कथित धर्म का त्याग कर जो मूर्ख अन्य धर्म को चाहता है, वह मानों अपने घर के अमृत को छोड़कर मदार के वृक्ष से उत्पन्न दूध की कामना करता है (१८)। तन्त्रोक्त पथ जिस प्रकार सुख मोक्ष का हेतु, मुक्ति का कारण और इस लोक एवं पर-लोक में सुख-प्राप्ति का निमित्त है, उस प्रकार अन्य कोई पथ नहीं है (१६-२०)। हे प्रिये ! विविध आख्यानों से युक्त बहु प्रकार का 'तन्त्र' मेरे द्वारा कहा गया है; सभी सिद्ध एवं सभी साधन-विधान का विस्तार से वर्णन किया गया है। पशुओं की अधिकता होने से अधि- कारी-भेद से कुलाचारोक्त धर्म को कहीं-कहीं गुप्त रखने के लिए भी कहा है; जीवों को प्रवृत्ति करनेवाले कोई- कोई तन्त्र-कर्म भी कहे हैं; विविध प्रकार के देव और बहुत प्रकार के देवों के विषय बताए हैं। भैरव गण, वेताल-गण, बटुक-गण, समस्त नायिकाएँ और शाक्त, शैव, वैष्णव, सौर, गाणपत्य-सब ही कहे गए हैं। नाना प्रकार के मन्त्र, यन्त्र और अनेक प्रकार के सिद्धोपाय भी बताए हैं। हे प्रिये ! जिस-जिस समय जिन-जिन व्यक्तियों ने जो-जो प्रश्न किए हैं, मैंने उस-उस समय उन लोगों के हितार्थ तदनुरूप कहा है (२१-२६) । हे पार्वति ! सब लोगों के हितार्थ, सब प्राणियों के कल्याण के लिए, युग- धर्मानुसार यथोचित रूप से, तुमने जिस प्रकार का प्रश्न किया है, इस प्रकार का प्रश्न पहले किसी व्यक्ति ने नहीं किया है। तुम्हारे स्नेहवश मैं इस सार-पूर्ण परात्पर विषय को कहता हूँ (२७-२८) । हे देवेशि ! वेद, आगम- विशेष कर सभी तन्त्रों का सार निकाल कर तुम्हें बताता हूँ (२६) । जिस प्रकार मनुष्यों में तन्त्र-ज्ञानी श्रेष्ठ है, देवताओं में मैं श्रेष्ठ हूँ, उसी प्रकार आगम-शास्त्रों में यह 'महा-निर्वाण तन्त्र' ही श्रेष्ठ है (३०)। हे शिवे ! सभी वेदों या सभी पुराणों या बहुत से शास्त्रों द्वारा क्या फल मिलता है ? एकमात्र इसी महा-तन्त्र के विशेष रूप से ज्ञात होने पर जीव सभी सिद्धियों का स्वामी होता है (३१) । जिस प्रकार जगत् के मङ्गल के लिए तुम्हारे द्वारा मैं नियुक्त हुआ हूँ, अतः जैसे यह विश्व का हितकारी हो, वह मैं कहता हूँ (३२) । हे देवि, हे परमेश्वरि ! विश्व का हित करने से विश्व का ईश्वर प्रसन्न होता है, क्योंकि वही विश्व का आत्मा है, विश्व उसी का आश्रय लेकर स्थित है। वह एक, अद्वितीय, सत्य, सद्-रूप, परात्पर, स्व-प्रकाश, सदा पूर्ण और सच्चिदानन्द-स्वरूप है। वह निर्विकार, निराधार, निर्विशेष, निराकुल अर्थात् आकुलता से शून्य है; वह गुणातीत, सब प्रकार के शुभा- शुभ कर्मों का साक्षात् द्रष्टा, सभी की आत्मा, सबको देखनेवाला, विभु है (३३-३५) । वह सर्व-व्यापी, सब भूतों में गूढ़ भाव से अवस्थित है अर्थात् आदि-अन्त से शून्य वह स्वयं तो सब इन्द्रियों से रहित है किन्तु सभी इन्द्रियों और इन्द्रियों के विषय उसी से दीप्ति पाते हैं (३६) । वह लोकातीत, त्रिभुवन का हेतु या बीज-स्वरूप और