महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र वाक्य, मन से अगोचर है; वह सर्वज्ञ, विश्वं को सम्पूर्णतः जाननेवाला है, उसे कोई व्यक्ति नहीं जानता (३७) । यह सारा जगत् उसके अधीन है। स्थावर, जङ्गम सहित यह त्रैलोक्य उसो के सहारे है। यह वितर्क-विषय से रहित जगत् परमात्मा के सत्यत्व का आश्रय लेकर, इस पृथ्वी, इस जल, इस वायु इत्यादि रूपों में अलग-अलग सत्य के समान प्रकाशित होता है। हे महेश्वरि ! वह 'ब्रह्म' हेतु-भूत होकर भी मुझसे ही उत्पन्न हुआ है (३८- ३६) । वही परमेश्वर सब प्राणियों का एकमात्र कारण है; ब्रह्मा (उसी परमेश्वर द्वारा नियुक्त होकर) सारे लोक में सृष्टि करने के कारण 'स्रष्टा' नाम से कहा जाता है (४०) । उनकी इच्छा से प्रयुक्त विष्णु इस जगत् का पालन करने से 'पालयिता' कहे जाते हैं। उनकी इच्छा से संहार करने में नियुक्त मैं जगत् में 'संहर्ता' नाम से कहा जाता हूँ। इन्द्रादि लोक-पाल लोग और सभी उसकी वश्यता में हैं, अपने-अपने अधिकार में नियुक्त होकर, उसी की आज्ञानुसार जगत् का शासन करते हैं। तुम उसकी 'परा-प्रकृति' हो, इसीलिए त्रिभुवन में पूज्या हो (४१- ४२)। वही परमात्मा अन्तर्यामी-रूप में उन सबको उन-उन विषयों में नियुक्त कर उनसे अपने-अपने कर्म करवाता है। जीव-गण किसी काल में स्वतन्त्र नहीं हैं (४३) । हे देवि ! जिसके भय से वायु चलता है; जिसके भय से डरकर सूर्य गर्मी देता है; सारे मेघ यथा-समय वर्षा करते हैं; जिसके शासन में जङ्गल में सभी वृक्ष विशेष पुष्पों से सम्पन्न होते हैं (४४) ; जो प्रलय-काल में साक्षात् काल का नाश करते हैं; जो साक्षात् मृत्यु के मृत्यु-स्वरूप हैं, वे ही वेदान्त द्वारा जानने योग्य भगवान् हैं। वे 'यत्-तत्' (यह-वह) शब्दों से जाने जाते हैं (४५)। हे सुर- वन्दिते ! सभी देव और देवी-गण इसी में तन्मय हैं अर्थात् परमात्मा-स्वरूप हैं; 'आब्रह्म-स्तम्ब पर्यन्त' - अर्थात् ब्रह्मा से लेकर तृणादि गुच्छ तक साा जगत् 'तन्मय' है अर्थात् पर-ब्रह्म-स्वरूप है (४६) । इस परमात्मा के परितुष्ट होने पर जगत् परितुष्ट होता है; उसे प्रसन्न करने पर सारा जगत् प्रसन्न हो जाता है; उसकी आराधना करने से सभी की प्रीति उत्पन्न हो जाती है (४७) । हे देवि ! जिस प्रकार वृक्ष को जड़ को सींचने से उसको डालियाँ, पत्ते सभी तृप्त होते हैं, उसी प्रकार परमेश्वर की आराधना करने से अमरादि (देवादि) सभी सन्तुष्ट होते हैं (४८) । हे सुव्रते, प्रिये ! जिस प्रकार तुम्हारी अर्चना, ध्यान, पूजा और जप करने से सभी देवियाँ प्रसन्न होती हैं, उसी प्रकार परमात्मा के अर्चनादि से सभी देवता प्रसन्न होते हैं, यह जान लो (४६) । जिस प्रकार नदियाँ लाचार होकर नदी-पति समुद्र में जाती हैं, उसी प्रकार सभी देवों के पूजादि कर्म, हे देवि ! उसी पर- मात्मा के ही लिए सम्पन्न होते हैं (५०)। जो-जो व्यक्ति जिस-जिस फल के पाने के लिए जिस-जिस देवता की पूजा श्रद्धा के साथ करता है, हे शिवे, वही अध्यक्ष पुरुष उन-उन देवताओं के द्वारा वही-वही फल उस-उस व्यक्ति को प्रदान करता है (५१)। हे प्रिये ! इस विषय में बहुत और क्या कहूँ, तुम्हारे आगे इतना भर कहता हूँ कि उस परमात्मा को छोड़कर मुक्ति के लिए ध्येय, पूज्य और सुखाराध्य अन्य कोई नहीं है (५२) । उस पर- ब्रह्म की उपासना में श्रम नहीं है, उपवास नहीं है, शरीर-सम्बन्धी कोई कष्ट नहीं है, आचारादि नियम नहीं हैं, बहुत से उपचारों आदि की आवश्यकता नहीं है; दिशा एवं काल आदि का विचार नहीं है; मुद्रा या न्यास की आवश्यकता नहीं है। हे कुलेशानि ! जिसके साधन में पूर्वोक्त श्रम आदि नहीं है, उससे भिन्न अन्य किसी का आश्रय कोई क्यों लेगा (५३-५४) ?