भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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तीसरा उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि देवी ने कहा—हे देव-देव ! आप देवताओं के गुरु के गुरु हैं; हे महा-देव ! आप सभी शास्त्रों, सभी मन्त्रों और सभी साधनों के वक्ता हैं (१)। हे भगवन् ! परात्पर परमेश्वर परब्रह्म, जिनका आपने कथन किया है और जिनको उपासना से मरण-शील मनुष्य भोग तथा मोक्ष पाएँगे, वे परमात्मा किस उपाय द्वारा प्रसन्न होंगे ? अथवा उनकी साधना क्या है ? या उनका मन्त्र किस रूप का है ? ध्यान और विधान किस प्रकार है ? मैं इसका प्रकृत तत्त्व सुनना चाहती हूँ । आप कृपा कर बतलायें (२-४) । सदाशिव ने कहा—हे मेरी प्राण-वल्लभे ! यह परम तत्त्व अति गुह्य है। हे कल्याणि ! मैंने किसी भी स्थान पर इस रहस्य को प्रकाशित नहीं किया है। तुम्हारे स्नेह-वश मैं बताता हूँ। यह तत्त्व मुझे प्राणों से भी अधिक प्रियतम है (५) । हे परमेश्वरि ! सत्, चित्, जगत्-स्वरूप वही परब्रह्म स्वरूप-लक्षण और तटस्थ-लक्षण द्वारा यथावत् ज्ञेय होता है (६) । जो सत्ता-मात्र है अर्थात् केवल परमार्थ-स्वरूप है; जो निर्विशेष है अर्थात् स्वगत भेद-शून्य है और जो वाक्य-मन के अगोचर है (७); जिसके सत्त्व से मिथ्याभूत त्रिलोकी का सत्यत्व प्रतीत होता है—यहाँ परब्रह्म का स्वरूप-लक्षण है। जो शत्रु-मित्र आदि में सर्वत्र सम-दर्शी है, जो शीतोष्ण सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से अतीत है, जो नाना-प्रकार की भेद-कल्पनाओं से शून्य है, शरीर-निष्ठ आत्मत्व-बुद्धि-रहित इस प्रकार के सभी योगियों के समाधि-योग द्वारा उस ब्रह्म का स्वरूप जाना जाता है (८) । जिससे यह विश्व उत्पन्न होता है, उत्पन्न हुआ विश्व जिसमें स्थित रहता है और प्रलय-काल में यह चराचर जगत् जिसमें लय हो जाता है, वही ब्रह्म है। इसी तटस्थ-लक्षण द्वारा वह जाना जाता है। हे शिवे ! स्वरूप-लक्षण द्वारा जो ब्रह्म जाना जाता है, वही तटस्थ लक्षण द्वारा वेद्य या ज्ञेय होता है। स्वरूप-लक्षण द्वारा जानने में साधन की अपेक्षा नहीं है किन्तु तटस्थ लक्षण द्वारा ब्रह्म-प्राप्ति की इच्छा करने पर साधन विहित है (६-१०) । हे प्रिये ! वही साधन अर्थात् तटस्थ लक्षण द्वारा वेद्य ब्रह्म का साधन बताता हूँ, सावधान होकर सुनो । उस साधन में पहले महेश्वर का मन्त्रोद्धार बताता हूँ (११) । पहले प्रणव (ॐ) का उच्चारण कर 'सच्चित्' पद कहे । फिर 'एकं' पद, तब 'ब्रह्म' पद कहने से मन्त्र का उद्धार होता है। सन्धि-क्रम से मिल- जाने पर यह मन्त्र सात अक्षर (सप्ताक्षर) का होता है—'ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म ।' यही मन्त्र प्रणव-रहित होने पर षडक्षर (छः अक्षर का) होता है—'सच्चिदेकं ब्रह्म ।' (१२-१३) यह मन्त्र सब मन्त्रों में श्रेष्ठ है। यह साक्षात् धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का देनेवाला है। इस मन्त्र में सिद्धादि चक्र के विचार की अपेक्षा नहीं है और अरि-मित्रादि दोषों से यह दूषित नहीं होता (१४) । इस मन्त्र के ग्रहण करने में तिथि, नक्षत्र, राशि, कुलाकुल आदि चक्रों की गणना करने का नियम नहीं है और दश-संस्कार की भी अपेक्षा नहीं है। यह मन्त्र सर्वथा सिद्ध है, अतः इसके सम्बन्ध में किसी रूप के विचार की अपेक्षा न करे (१५) । अनेक जन्मों के अर्जित पुण्यों के फल से यदि सद्गुरु पा जाय, तो उसी गुरु के मुख से निकले हुए इस मन्त्र को प्राप्त करने से उसी क्षण से जन्म सफल हो जाता है। वह ब्रह्मोपासक जीव धर्मार्थ-काम-मोक्ष इस चतुर्वर्ग को हस्तगत कर इस लोक में और पर-लोक में आनन्द का भोग करता है (१६-१७) । ब्रह्म-मन्त्र-रूप महा-मणि [ ७ ]