महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 17, कुल 139 में से
संदर्भ में पढ़ें८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र जिसके कान में पहुँचता है, वे ही धन्य हैं, कृतार्थ हैं, कृती हैं, धार्मिक हैं, सब तीर्थों में नहाये हुए हैं, सब यज्ञों में दीक्षित हैं, सब शास्त्रों में निपुण हैं और वे ही सब लोकों में प्रतिष्ठित हैं—ऐसा कहा जाता है (१८-१९)। हे शिवे ! जिन्हें ब्रह्म-मन्त्र प्राप्त हुआ है, उनके माता-पिता धन्य हैं, उनका कुल पवित्र है, उनके पितृ-गण सन्तुष्ट होकर देव-गण के सहित आनन्द का अनुभव करते हैं और वे पुलकित-शरीर से यह गाथा गाते रहते हैं कि “हमारे कुल में उत्पन्न पुत्र ने ब्रह्म-मन्त्र में दीक्षित होकर कुल को पवित्र कर दिया है, हम लोगों के लिए गया में पिण्ड-दान की और क्या आवश्यकता ? अथवा तीर्थ, तीर्थ-श्राद्ध और तीर्थ-तर्पण ही की क्या आवश्यकता ? अथवा हमारे लिए दान, जप, होम और अन्यान्य बहु-विध साधनों की ही क्या आवश्यकता ? हमारे इस सत्पुत्र ने सद्गुरु से ब्रह्म-मन्त्र की दीक्षा-ग्रहण का जो साधन किया है, उसी से हम अक्षय तृप्ति पा रहे हैं।” (२०-२२) हे जगद्-वन्द्ये ! मैं सत्य-सत्य कहता हूँ, सुनो । ब्रह्म-मन्त्र के सभी उपासकों के लिए किसी अन्य साधना की आवश्य- कता नहीं है । इस ब्रह्म-मन्त्र के ग्रहण करने मात्र से देही ब्रह्म-मय हो जाता है । हे देवेशि ! जो ब्रह्म-भूत है, उसके लिए तीनों जगत् में क्या दुष्प्राप्य है ? सभी वस्तुएँ उसे सुलभ हो जाती हैं। ग्रह, वेताल, चेटक, पिशाच, गुह्यक, भूत, डाकिनी और मातृका आदि के समूह रुष्ट होकर उसका क्या कर सकते हैं ? वे ब्रह्मोपासक के दर्शन मात्र से पराङ्मुख होकर भाग खड़े होते हैं ( २३-२५) । वह ब्रह्म-मन्त्र से रक्षित रहता है, वह ब्रह्म-तेज से अच्छी तरह आवृत्त रहता है, वह द्वितीय सूर्य के समान होता है । अतः ग्रहादि से उसे क्या भय होगा ? वह कभी भयभीत नहीं होता (२६) । हाथियों का समूह जिस प्रकार सिंह को देख डर कर भाग जाता है, उसी प्रकार उस साधक को देखकर पूर्वोक्त ग्रहादि भाग जाते हैं और जिस प्रकार पतङ्ग-गण अग्नि में नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार ग्रहादि उसके तेज से नष्ट हो जाते हैं (२७) । वह ब्रह्म-निष्ठ साधक सत्य-पूत, शुद्ध अन्तः- करणवाला और सब प्राणियों का हितकारी होता है ; पाप उसे कभी छू भी नहीं पाता । आत्म-घाती को छोड़ कर और कौन व्यक्ति ऐसे महात्मा का अनिष्ट करने की इच्छा करेगा (२८) ? दुष्ट-स्वभाव वाले जो पापात्मा व्यक्ति परब्रह्मोपासक का अनिष्ट करने को उद्यत होते हैं, वे अपना ही अनिष्ट करते हैं । परब्रह्मोपासक सत्- स्वरूप ब्रह्म से भिन्न नहीं है (२९) । हे देवि ! वह ब्रह्मोपासक सबका हित-कारी है, साधु है और सबका प्रिय करनेवाला है । ऐसे महात्मा का अनिष्ट कर कौन व्यक्ति शान्ति से रह सकता है (३०) ? जो साधक 'मन्त्रार्थ' और 'मन्त्रार्थ-चैतन्य' को नहीं जानता, उसे सौ लाख जप करने पर भी मन्त्र की सिद्धि नहीं होती (३१) । हे प्रिये ! इसीलिए मैं इस मन्त्र का 'अर्थ' और 'चैतन्य' बताता हूँ, सुनो । 'अ उ म'—ये तीन वर्ण मिलकर 'ॐ' मन्त्र बनता है। अकार का अर्थ है जगत् की रक्षा करनेवाला, उकार का अर्थ है संहार करनेवाला, मकार का अर्थ है जगत् की सृष्टि करनेवाला । प्रणव का यही अर्थ कहा गया है (३२) । 'सत्'—शब्द का अर्थ है सदा विद्यमान, 'चित्'-शब्द का अर्थ है चैतन्य, 'एक'-शब्द का अर्थ है अद्वैत । हे ईशानि ! बृहत् होने से 'ब्रह्म' कहा जाता है । हे देवि ! सभी साधकों को अभीष्ट सिद्धि देनेवाला यह 'मन्त्रार्थ' कहा गया है (३३-३४) । हे परमेशानि ! मन्त्र का अधिष्ठातृ-देवता ही 'मन्त्र का चैतन्य' है । मन्त्र के अधिष्ठातृ-देवता सम्बन्धी ज्ञान भक्तों को सिद्धि दिलाता है (३५) । हे देवेशि ! जो इस मन्त्र का अधिष्ठातृ-देवता है, वह समस्त पदार्थों में व्याप्त रहनेवाला है; वह सनातन, अतर्क्य, निराकार, वाणी से परे और निरञ्जन है (३६) । हे देवि ! इस पूर्वोक्त मन्त्र को प्रणव से रहित कर 'ऐं'—वाग्बीज-विद्या, 'ह्रीं'—माया, 'श्रीं'—लक्ष्मी को आदि में जोड़ने से क्रमशः विविध विद्याएँ, विविध मायाएँ और विविध प्रकार की सर्वतोमुखी लक्ष्मी-प्रदा- यक मन्त्र बनते हैं (३७) । मन्त्र देने की विधि यह है कि 'ऐं सच्चिदेकं ब्रह्म' इस मन्त्र द्वारा विद्या प्रदान करे,