महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि | ६ 'ह्रीँ सच्चिदेकं ब्रह्म' इस मन्त्र द्वारा माया और 'श्रीं सच्चिदेकं ब्रह्म' इस मन्त्र द्वारा लक्ष्मी प्रदान करे । पूर्वोक्त मन्त्र के प्रत्येक पद में अथवा समस्त पद में प्रणव जोड़कर या प्रणव से रहित कर अथवा उक्त मन्त्र के दो-दो पदों में प्रणव जोड़कर या छोड़कर उच्चारण करने से अनेक प्रकार के मन्त्र बनते हैं। यथा— १. प्रत्येक पद में प्रणव जोड़कर—'ॐ सत्, 'ॐ चित्, ॐ एकं, ॐ ब्रह्म'; प्रणव से रहित कर—सत्, चित्, एकं, ब्रह्म' । २. समस्त पद में प्रणव जोड़कर—'ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म', प्रणव से रहित कर—'सच्चिदेकं ब्रह्म।' ३. दो-दो पदों में प्रणव जोड़कर—'ॐ सद् ब्रह्म, ॐ चिद् ब्रह्म, ॐ एकं ब्रह्म, ॐ सच्चित्, ॐ चिदेकम्, प्रणव छोड़कर—'सद् ब्रह्म, चिद् ब्रह्म, एकं ब्रह्म, सच्चिद्, चिदेकम् ।' (३८) इस मन्त्र के ऋषि सदाशिव, छन्द अनुष्टुप्, देवता निर्गुण सर्वान्तर्यामी परम ब्रह्म और चतुर्वर्ग-फल-प्राप्ति के निमित्त विनियोग कहे गए हैं (३६) । ऋष्यादि-न्यास — शिरसि सदाशिवाय ऋषये नमः । मुखे अनुष्टुप्-छन्दसे नमः । हृदि सर्वान्तर्यामि-निर्गुण-परम-ब्रह्मणे देवतायै नमः । धर्मार्थ-काम-मोक्षावाप्तये विनियोगः । हे प्रिये ! अङ्ग-न्यास, कर-न्यास कहता हूँ, सुनो (४०) । हे महेश्वरि ! (पहले कर-न्यास में) ॐ सच्चिद् ब्रह्म एकम्, ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म' इसी क्रम से पदोच्चारण करते हुए अंगुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा —इन पाँच अंगुलियों में एवं दोनों कर-तलों, कर-पृष्ठों में क्रमशः 'नमः, स्वाहा, वषट्, हुं', वौषट्, फट्' को क्रमशः अन्त में उच्चारण कर एकाग्र मन से न्यासोक्त विधि से कर-न्यास करे। इसी प्रकार हृदय से कर-पर्यन्त (अङ्ग-न्यास) यथा-विधि करे (४१-४३) । हे पार्वति ! तदनन्तर मूल-मन्त्र या प्रणव से प्राणायाम करे । दाएं हाथ को मध्यमा-अनामिका अंगुलियों से बाएँ नासा-पुट को बन्द कर दाएँ नासा-पुट से वायु खींचते हुए आठ बार मूल-मन्त्र या प्रणव का जप करे (४४- ४५) । फिर अंगूठे से दाएँ नासा को बन्द कर कुम्भक (श्वास रोक) कर बत्तीस बार जप करे । तब दाईं नासा से धीरे-धीरे निःश्वास छोड़ते हुए सोलह बार मन्त्र-जप करे। बाद में इसी प्रकार बाएँ नासा-पुट से पूरक, कुम्भक, रेचक करे अर्थात् आठ बार मन्त्र-जप करते-करते बाएँ नासा-पुट से धीरे-धीरे वायु खींचे; फिर वायु रोककर बत्तीस बार जप करे (४६) । तब बाएँ नासा-पुट को छोड़कर उससे धीरे-धीरे वायु निकालते हुए सोलह बार मन्त्र जप करे । बाएँ नासा-पुट से भी इसी प्रकार पूरक, कुम्भक, रेचक करे (४७) । हे सुर-वन्दिते ! पहले के समान पुनः दाईं नासा से पूरक, कुम्भक, रेचक करे । ब्रह्म-मन्त्र के साधन में प्राणायाम की विधि तुमसे कही गई (४८) । इसके बाद साधक के अभीष्ट को सिद्ध करनेवाला ध्यान करे (४६) । यथा— हृदय-कमल-मध्ये निर्विशेषं निरीहम्, हरि-हर-विधि-वेद्यं योगिभिर्ध्यान-गम्यम् । जनन-मरण-भीति-भ्रंशि सच्चित्-स्वरूपम् । सकल-भुवन-बीजं ब्रह्म-चैतन्यमीड़े ॥ अर्थ : जो निर्विशेष है अर्थात् नाना प्रकार के भेदों से रहित है; जो निरीह अर्थात् चेष्टा-रहित है; जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर द्वारा ज्ञेय है; जो योगियों द्वारा ध्यान-गम्य है; जिसके द्वारा जन्म और मृत्यु का भय दूर होता है; जो नित्य और ज्ञान-स्वरूप है; जो समस्त भुवनों का बीज है—ऐसे चैतन्य-स्वरूप ब्रह्म को मैं हृदय-कमल के मध्य में ध्यान करता हूँ (५०) । फा०—२