महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र ब्रह्म-सायुज्य को प्राप्त करने के लिए परा भक्ति के साथ परम ब्रह्म का इसी प्रकार ध्यान कर मानस उपचारों से उनकी पूजा करे (५१)। मानस-पूजा में ईश्वर को भूत-तत्त्व अर्पित करे—पृथ्वी-तत्त्व को गन्ध, आकाश-तत्त्व को पुष्प, वायु-तत्त्व को धूप, तेजस्तत्त्व को दीप और जल-तत्त्व को नैवेद्य मानकर उस परमात्मा को प्रदान करे (५२) । फिर श्रेष्ठ साधक मन में पूर्वोक्त महा-मन्त्र (ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म) का जप कर ब्रह्म को जप समर्पित कर बाह्य-पूजा आरम्भ करे (५३) । गन्ध-पुष्पादि, वस्त्रालङ्कारादि एवं भक्ष्य-पेयादि जो सारी वस्तुएँ विद्यमान हों, उन सबको निम्न मन्त्र से संशोधित कर, दोनों आँखें बन्द कर बुद्धिमान् व्यक्ति सनातन ब्रह्म का ध्यान करता हुआ उन्हें परमात्मा को समर्पित करे (५४-५५)— ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म-कर्म-समाधिना ।। अर्थ : 'अर्पण' अर्थात् यज्ञ-पात्र ब्रह्म । 'हवि' अर्थात् हवनीय द्रव्य जो अर्पित करना है, वह भी ब्रह्म । जो आहुति देनेवाला अर्थात् अर्पण करनेवाला है, वह भी ब्रह्म। इस प्रकार जो ब्रह्म में चित्त को एकाग्र रूप से स्थापित करता है, वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है (५६) । इसके बाद यथा-शक्ति मूलमन्त्र का जप कर दोनों आँखें बन्द कर उक्त 'ब्रह्मार्पण०' मन्त्र का उच्चारण कर ब्रह्म को जप समर्पित कर स्तव और कवच का पाठ करे (५७) । हे महेशानि ! हे देवि ! परमात्मा ब्रह्म के स्तव को सुनो, जिसके सुनने से साधक ब्रह्म-सायुज्य को प्राप्त करता है (५८)— ॐ नमस्ते सते सर्व-लोकाश्रयाय, नमस्ते चिते विश्व-रूपात्मकाय । नमोऽद्वैत-तत्त्वाय मुक्ति-प्रदाय, नमो ब्रह्मणे व्यापिने निर्गुणाय ।। १ ।। त्वमेकं शरण्यं त्वमेकं वरेण्यम्, त्वमेकं जगत्-कारणं विश्व-रूपम् । त्वमेकं जगत्-कर्तृ-पातृ-प्रहर्तृ, त्वमेकं परं निश्चलं निर्विकल्पम् ।। २ ।। भयानां भयं भीषणं भीषणानाम्, गतिः प्राणिनां पावनं पावनानाम् । महोच्चैः पदानां नियन्तृ त्वमेकम्, परेषां परं रक्षकं रक्षकानाम् ।। ३ ।। परेश प्रभो सर्व-रूपाविनाशिन्, अनिर्देश्य सर्वेन्द्रियागम्य सत्य ! अचिन्त्याक्षर व्यापकाव्यक्त-तत्त्व, जगद्-भासकाधीश पायादपायात् ।। ४ ।। तदेकं स्मरामस्तदेकं जपामः, तदेकं जगत्-साक्षि-रूपं नमामः । सदेकं निधानं निरालम्बमीशम्, भवाम्बोधि-पोतं शरण्यं व्रजामः ।। ५ ।। पञ्च-रत्नमिदं स्तोत्रं ब्रह्मणः परमात्मनः । यः पठेत् प्रयतो भूत्वा ब्रह्म-सायुज्यमाप्नुयात् ।। ६ ।। प्रदोषेऽदः पठेन्नित्यं सोमवारे विशेषतः । श्रावयेद् बोधयेत् प्राज्ञो ब्रह्म-निष्ठान् स्व-बान्धवान् ।।७।। इति ते कथितं देवि ! पञ्च-रत्नं महेशितुः । अर्थात् तुम नित्य हो, तुम सब लोकों के आश्रय हो, तुम्हें नमस्कार करता हूँ। तुम ज्ञान-स्वरूप हो, विश्व की आत्मा-स्वरूप हो, अद्वैत तत्त्व, मुक्ति-दायक तुम्हें नमस्कार है। तुम सर्व-व्यापी निर्गुण ब्रह्म हो, तुम्हें