महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
तीसरा उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि देवी ने कहा—हे देव-देव ! आप देवताओं के गुरु के गुरु हैं; हे महा-देव ! आप सभी शास्त्रों, सभी मन्त्रों और सभी साधनों के वक्ता हैं (१)। हे भगवन् ! परात्पर परमेश्वर परब्रह्म, जिनका आपने कथन किया है और जिनको उपासना से मरण-शील मनुष्य भोग तथा मोक्ष पाएँगे, वे परमात्मा किस उपाय द्वारा प्रसन्न होंगे ? अथवा उनकी साधना क्या है ? या उनका मन्त्र किस रूप का है ? ध्यान और विधान किस प्रकार है ? मैं इसका प्रकृत तत्त्व सुनना चाहती हूँ । आप कृपा कर बतलायें (२-४) । सदाशिव ने कहा—हे मेरी प्राण-वल्लभे ! यह परम तत्त्व अति गुह्य है। हे कल्याणि ! मैंने किसी भी स्थान पर इस रहस्य को प्रकाशित नहीं किया है। तुम्हारे स्नेह-वश मैं बताता हूँ। यह तत्त्व मुझे प्राणों से भी अधिक प्रियतम है (५) । हे परमेश्वरि ! सत्, चित्, जगत्-स्वरूप वही परब्रह्म स्वरूप-लक्षण और तटस्थ-लक्षण द्वारा यथावत् ज्ञेय होता है (६) । जो सत्ता-मात्र है अर्थात् केवल परमार्थ-स्वरूप है; जो निर्विशेष है अर्थात् स्वगत भेद-शून्य है और जो वाक्य-मन के अगोचर है (७); जिसके सत्त्व से मिथ्याभूत त्रिलोकी का सत्यत्व प्रतीत होता है—यहाँ परब्रह्म का स्वरूप-लक्षण है। जो शत्रु-मित्र आदि में सर्वत्र सम-दर्शी है, जो शीतोष्ण सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से अतीत है, जो नाना-प्रकार की भेद-कल्पनाओं से शून्य है, शरीर-निष्ठ आत्मत्व-बुद्धि-रहित इस प्रकार के सभी योगियों के समाधि-योग द्वारा उस ब्रह्म का स्वरूप जाना जाता है (८) । जिससे यह विश्व उत्पन्न होता है, उत्पन्न हुआ विश्व जिसमें स्थित रहता है और प्रलय-काल में यह चराचर जगत् जिसमें लय हो जाता है, वही ब्रह्म है। इसी तटस्थ-लक्षण द्वारा वह जाना जाता है। हे शिवे ! स्वरूप-लक्षण द्वारा जो ब्रह्म जाना जाता है, वही तटस्थ लक्षण द्वारा वेद्य या ज्ञेय होता है। स्वरूप-लक्षण द्वारा जानने में साधन की अपेक्षा नहीं है किन्तु तटस्थ लक्षण द्वारा ब्रह्म-प्राप्ति की इच्छा करने पर साधन विहित है (६-१०) । हे प्रिये ! वही साधन अर्थात् तटस्थ लक्षण द्वारा वेद्य ब्रह्म का साधन बताता हूँ, सावधान होकर सुनो । उस साधन में पहले महेश्वर का मन्त्रोद्धार बताता हूँ (११) । पहले प्रणव (ॐ) का उच्चारण कर 'सच्चित्' पद कहे । फिर 'एकं' पद, तब 'ब्रह्म' पद कहने से मन्त्र का उद्धार होता है। सन्धि-क्रम से मिल- जाने पर यह मन्त्र सात अक्षर (सप्ताक्षर) का होता है—'ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म ।' यही मन्त्र प्रणव-रहित होने पर षडक्षर (छः अक्षर का) होता है—'सच्चिदेकं ब्रह्म ।' (१२-१३) यह मन्त्र सब मन्त्रों में श्रेष्ठ है। यह साक्षात् धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का देनेवाला है। इस मन्त्र में सिद्धादि चक्र के विचार की अपेक्षा नहीं है और अरि-मित्रादि दोषों से यह दूषित नहीं होता (१४) । इस मन्त्र के ग्रहण करने में तिथि, नक्षत्र, राशि, कुलाकुल आदि चक्रों की गणना करने का नियम नहीं है और दश-संस्कार की भी अपेक्षा नहीं है। यह मन्त्र सर्वथा सिद्ध है, अतः इसके सम्बन्ध में किसी रूप के विचार की अपेक्षा न करे (१५) । अनेक जन्मों के अर्जित पुण्यों के फल से यदि सद्गुरु पा जाय, तो उसी गुरु के मुख से निकले हुए इस मन्त्र को प्राप्त करने से उसी क्षण से जन्म सफल हो जाता है। वह ब्रह्मोपासक जीव धर्मार्थ-काम-मोक्ष इस चतुर्वर्ग को हस्तगत कर इस लोक में और पर-लोक में आनन्द का भोग करता है (१६-१७) । ब्रह्म-मन्त्र-रूप महा-मणि [ ७ ]
८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र जिसके कान में पहुँचता है, वे ही धन्य हैं, कृतार्थ हैं, कृती हैं, धार्मिक हैं, सब तीर्थों में नहाये हुए हैं, सब यज्ञों में दीक्षित हैं, सब शास्त्रों में निपुण हैं और वे ही सब लोकों में प्रतिष्ठित हैं—ऐसा कहा जाता है (१८-१९)। हे शिवे ! जिन्हें ब्रह्म-मन्त्र प्राप्त हुआ है, उनके माता-पिता धन्य हैं, उनका कुल पवित्र है, उनके पितृ-गण सन्तुष्ट होकर देव-गण के सहित आनन्द का अनुभव करते हैं और वे पुलकित-शरीर से यह गाथा गाते रहते हैं कि “हमारे कुल में उत्पन्न पुत्र ने ब्रह्म-मन्त्र में दीक्षित होकर कुल को पवित्र कर दिया है, हम लोगों के लिए गया में पिण्ड-दान की और क्या आवश्यकता ? अथवा तीर्थ, तीर्थ-श्राद्ध और तीर्थ-तर्पण ही की क्या आवश्यकता ? अथवा हमारे लिए दान, जप, होम और अन्यान्य बहु-विध साधनों की ही क्या आवश्यकता ? हमारे इस सत्पुत्र ने सद्गुरु से ब्रह्म-मन्त्र की दीक्षा-ग्रहण का जो साधन किया है, उसी से हम अक्षय तृप्ति पा रहे हैं।” (२०-२२) हे जगद्-वन्द्ये ! मैं सत्य-सत्य कहता हूँ, सुनो । ब्रह्म-मन्त्र के सभी उपासकों के लिए किसी अन्य साधना की आवश्य- कता नहीं है । इस ब्रह्म-मन्त्र के ग्रहण करने मात्र से देही ब्रह्म-मय हो जाता है । हे देवेशि ! जो ब्रह्म-भूत है, उसके लिए तीनों जगत् में क्या दुष्प्राप्य है ? सभी वस्तुएँ उसे सुलभ हो जाती हैं। ग्रह, वेताल, चेटक, पिशाच, गुह्यक, भूत, डाकिनी और मातृका आदि के समूह रुष्ट होकर उसका क्या कर सकते हैं ? वे ब्रह्मोपासक के दर्शन मात्र से पराङ्मुख होकर भाग खड़े होते हैं ( २३-२५) । वह ब्रह्म-मन्त्र से रक्षित रहता है, वह ब्रह्म-तेज से अच्छी तरह आवृत्त रहता है, वह द्वितीय सूर्य के समान होता है । अतः ग्रहादि से उसे क्या भय होगा ? वह कभी भयभीत नहीं होता (२६) । हाथियों का समूह जिस प्रकार सिंह को देख डर कर भाग जाता है, उसी प्रकार उस साधक को देखकर पूर्वोक्त ग्रहादि भाग जाते हैं और जिस प्रकार पतङ्ग-गण अग्नि में नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार ग्रहादि उसके तेज से नष्ट हो जाते हैं (२७) । वह ब्रह्म-निष्ठ साधक सत्य-पूत, शुद्ध अन्तः- करणवाला और सब प्राणियों का हितकारी होता है ; पाप उसे कभी छू भी नहीं पाता । आत्म-घाती को छोड़ कर और कौन व्यक्ति ऐसे महात्मा का अनिष्ट करने की इच्छा करेगा (२८) ? दुष्ट-स्वभाव वाले जो पापात्मा व्यक्ति परब्रह्मोपासक का अनिष्ट करने को उद्यत होते हैं, वे अपना ही अनिष्ट करते हैं । परब्रह्मोपासक सत्- स्वरूप ब्रह्म से भिन्न नहीं है (२९) । हे देवि ! वह ब्रह्मोपासक सबका हित-कारी है, साधु है और सबका प्रिय करनेवाला है । ऐसे महात्मा का अनिष्ट कर कौन व्यक्ति शान्ति से रह सकता है (३०) ? जो साधक 'मन्त्रार्थ' और 'मन्त्रार्थ-चैतन्य' को नहीं जानता, उसे सौ लाख जप करने पर भी मन्त्र की सिद्धि नहीं होती (३१) । हे प्रिये ! इसीलिए मैं इस मन्त्र का 'अर्थ' और 'चैतन्य' बताता हूँ, सुनो । 'अ उ म'—ये तीन वर्ण मिलकर 'ॐ' मन्त्र बनता है। अकार का अर्थ है जगत् की रक्षा करनेवाला, उकार का अर्थ है संहार करनेवाला, मकार का अर्थ है जगत् की सृष्टि करनेवाला । प्रणव का यही अर्थ कहा गया है (३२) । 'सत्'—शब्द का अर्थ है सदा विद्यमान, 'चित्'-शब्द का अर्थ है चैतन्य, 'एक'-शब्द का अर्थ है अद्वैत । हे ईशानि ! बृहत् होने से 'ब्रह्म' कहा जाता है । हे देवि ! सभी साधकों को अभीष्ट सिद्धि देनेवाला यह 'मन्त्रार्थ' कहा गया है (३३-३४) । हे परमेशानि ! मन्त्र का अधिष्ठातृ-देवता ही 'मन्त्र का चैतन्य' है । मन्त्र के अधिष्ठातृ-देवता सम्बन्धी ज्ञान भक्तों को सिद्धि दिलाता है (३५) । हे देवेशि ! जो इस मन्त्र का अधिष्ठातृ-देवता है, वह समस्त पदार्थों में व्याप्त रहनेवाला है; वह सनातन, अतर्क्य, निराकार, वाणी से परे और निरञ्जन है (३६) । हे देवि ! इस पूर्वोक्त मन्त्र को प्रणव से रहित कर 'ऐं'—वाग्बीज-विद्या, 'ह्रीं'—माया, 'श्रीं'—लक्ष्मी को आदि में जोड़ने से क्रमशः विविध विद्याएँ, विविध मायाएँ और विविध प्रकार की सर्वतोमुखी लक्ष्मी-प्रदा- यक मन्त्र बनते हैं (३७) । मन्त्र देने की विधि यह है कि 'ऐं सच्चिदेकं ब्रह्म' इस मन्त्र द्वारा विद्या प्रदान करे,
तीसरा उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि | ६ 'ह्रीँ सच्चिदेकं ब्रह्म' इस मन्त्र द्वारा माया और 'श्रीं सच्चिदेकं ब्रह्म' इस मन्त्र द्वारा लक्ष्मी प्रदान करे । पूर्वोक्त मन्त्र के प्रत्येक पद में अथवा समस्त पद में प्रणव जोड़कर या प्रणव से रहित कर अथवा उक्त मन्त्र के दो-दो पदों में प्रणव जोड़कर या छोड़कर उच्चारण करने से अनेक प्रकार के मन्त्र बनते हैं। यथा— १. प्रत्येक पद में प्रणव जोड़कर—'ॐ सत्, 'ॐ चित्, ॐ एकं, ॐ ब्रह्म'; प्रणव से रहित कर—सत्, चित्, एकं, ब्रह्म' । २. समस्त पद में प्रणव जोड़कर—'ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म', प्रणव से रहित कर—'सच्चिदेकं ब्रह्म।' ३. दो-दो पदों में प्रणव जोड़कर—'ॐ सद् ब्रह्म, ॐ चिद् ब्रह्म, ॐ एकं ब्रह्म, ॐ सच्चित्, ॐ चिदेकम्, प्रणव छोड़कर—'सद् ब्रह्म, चिद् ब्रह्म, एकं ब्रह्म, सच्चिद्, चिदेकम् ।' (३८) इस मन्त्र के ऋषि सदाशिव, छन्द अनुष्टुप्, देवता निर्गुण सर्वान्तर्यामी परम ब्रह्म और चतुर्वर्ग-फल-प्राप्ति के निमित्त विनियोग कहे गए हैं (३६) । ऋष्यादि-न्यास — शिरसि सदाशिवाय ऋषये नमः । मुखे अनुष्टुप्-छन्दसे नमः । हृदि सर्वान्तर्यामि-निर्गुण-परम-ब्रह्मणे देवतायै नमः । धर्मार्थ-काम-मोक्षावाप्तये विनियोगः । हे प्रिये ! अङ्ग-न्यास, कर-न्यास कहता हूँ, सुनो (४०) । हे महेश्वरि ! (पहले कर-न्यास में) ॐ सच्चिद् ब्रह्म एकम्, ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म' इसी क्रम से पदोच्चारण करते हुए अंगुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा —इन पाँच अंगुलियों में एवं दोनों कर-तलों, कर-पृष्ठों में क्रमशः 'नमः, स्वाहा, वषट्, हुं', वौषट्, फट्' को क्रमशः अन्त में उच्चारण कर एकाग्र मन से न्यासोक्त विधि से कर-न्यास करे। इसी प्रकार हृदय से कर-पर्यन्त (अङ्ग-न्यास) यथा-विधि करे (४१-४३) । हे पार्वति ! तदनन्तर मूल-मन्त्र या प्रणव से प्राणायाम करे । दाएं हाथ को मध्यमा-अनामिका अंगुलियों से बाएँ नासा-पुट को बन्द कर दाएँ नासा-पुट से वायु खींचते हुए आठ बार मूल-मन्त्र या प्रणव का जप करे (४४- ४५) । फिर अंगूठे से दाएँ नासा को बन्द कर कुम्भक (श्वास रोक) कर बत्तीस बार जप करे । तब दाईं नासा से धीरे-धीरे निःश्वास छोड़ते हुए सोलह बार मन्त्र-जप करे। बाद में इसी प्रकार बाएँ नासा-पुट से पूरक, कुम्भक, रेचक करे अर्थात् आठ बार मन्त्र-जप करते-करते बाएँ नासा-पुट से धीरे-धीरे वायु खींचे; फिर वायु रोककर बत्तीस बार जप करे (४६) । तब बाएँ नासा-पुट को छोड़कर उससे धीरे-धीरे वायु निकालते हुए सोलह बार मन्त्र जप करे । बाएँ नासा-पुट से भी इसी प्रकार पूरक, कुम्भक, रेचक करे (४७) । हे सुर-वन्दिते ! पहले के समान पुनः दाईं नासा से पूरक, कुम्भक, रेचक करे । ब्रह्म-मन्त्र के साधन में प्राणायाम की विधि तुमसे कही गई (४८) । इसके बाद साधक के अभीष्ट को सिद्ध करनेवाला ध्यान करे (४६) । यथा— हृदय-कमल-मध्ये निर्विशेषं निरीहम्, हरि-हर-विधि-वेद्यं योगिभिर्ध्यान-गम्यम् । जनन-मरण-भीति-भ्रंशि सच्चित्-स्वरूपम् । सकल-भुवन-बीजं ब्रह्म-चैतन्यमीड़े ॥ अर्थ : जो निर्विशेष है अर्थात् नाना प्रकार के भेदों से रहित है; जो निरीह अर्थात् चेष्टा-रहित है; जो ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर द्वारा ज्ञेय है; जो योगियों द्वारा ध्यान-गम्य है; जिसके द्वारा जन्म और मृत्यु का भय दूर होता है; जो नित्य और ज्ञान-स्वरूप है; जो समस्त भुवनों का बीज है—ऐसे चैतन्य-स्वरूप ब्रह्म को मैं हृदय-कमल के मध्य में ध्यान करता हूँ (५०) । फा०—२
१० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र ब्रह्म-सायुज्य को प्राप्त करने के लिए परा भक्ति के साथ परम ब्रह्म का इसी प्रकार ध्यान कर मानस उपचारों से उनकी पूजा करे (५१)। मानस-पूजा में ईश्वर को भूत-तत्त्व अर्पित करे—पृथ्वी-तत्त्व को गन्ध, आकाश-तत्त्व को पुष्प, वायु-तत्त्व को धूप, तेजस्तत्त्व को दीप और जल-तत्त्व को नैवेद्य मानकर उस परमात्मा को प्रदान करे (५२) । फिर श्रेष्ठ साधक मन में पूर्वोक्त महा-मन्त्र (ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म) का जप कर ब्रह्म को जप समर्पित कर बाह्य-पूजा आरम्भ करे (५३) । गन्ध-पुष्पादि, वस्त्रालङ्कारादि एवं भक्ष्य-पेयादि जो सारी वस्तुएँ विद्यमान हों, उन सबको निम्न मन्त्र से संशोधित कर, दोनों आँखें बन्द कर बुद्धिमान् व्यक्ति सनातन ब्रह्म का ध्यान करता हुआ उन्हें परमात्मा को समर्पित करे (५४-५५)— ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म-कर्म-समाधिना ।। अर्थ : 'अर्पण' अर्थात् यज्ञ-पात्र ब्रह्म । 'हवि' अर्थात् हवनीय द्रव्य जो अर्पित करना है, वह भी ब्रह्म । जो आहुति देनेवाला अर्थात् अर्पण करनेवाला है, वह भी ब्रह्म। इस प्रकार जो ब्रह्म में चित्त को एकाग्र रूप से स्थापित करता है, वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है (५६) । इसके बाद यथा-शक्ति मूलमन्त्र का जप कर दोनों आँखें बन्द कर उक्त 'ब्रह्मार्पण०' मन्त्र का उच्चारण कर ब्रह्म को जप समर्पित कर स्तव और कवच का पाठ करे (५७) । हे महेशानि ! हे देवि ! परमात्मा ब्रह्म के स्तव को सुनो, जिसके सुनने से साधक ब्रह्म-सायुज्य को प्राप्त करता है (५८)— ॐ नमस्ते सते सर्व-लोकाश्रयाय, नमस्ते चिते विश्व-रूपात्मकाय । नमोऽद्वैत-तत्त्वाय मुक्ति-प्रदाय, नमो ब्रह्मणे व्यापिने निर्गुणाय ।। १ ।। त्वमेकं शरण्यं त्वमेकं वरेण्यम्, त्वमेकं जगत्-कारणं विश्व-रूपम् । त्वमेकं जगत्-कर्तृ-पातृ-प्रहर्तृ, त्वमेकं परं निश्चलं निर्विकल्पम् ।। २ ।। भयानां भयं भीषणं भीषणानाम्, गतिः प्राणिनां पावनं पावनानाम् । महोच्चैः पदानां नियन्तृ त्वमेकम्, परेषां परं रक्षकं रक्षकानाम् ।। ३ ।। परेश प्रभो सर्व-रूपाविनाशिन्, अनिर्देश्य सर्वेन्द्रियागम्य सत्य ! अचिन्त्याक्षर व्यापकाव्यक्त-तत्त्व, जगद्-भासकाधीश पायादपायात् ।। ४ ।। तदेकं स्मरामस्तदेकं जपामः, तदेकं जगत्-साक्षि-रूपं नमामः । सदेकं निधानं निरालम्बमीशम्, भवाम्बोधि-पोतं शरण्यं व्रजामः ।। ५ ।। पञ्च-रत्नमिदं स्तोत्रं ब्रह्मणः परमात्मनः । यः पठेत् प्रयतो भूत्वा ब्रह्म-सायुज्यमाप्नुयात् ।। ६ ।। प्रदोषेऽदः पठेन्नित्यं सोमवारे विशेषतः । श्रावयेद् बोधयेत् प्राज्ञो ब्रह्म-निष्ठान् स्व-बान्धवान् ।।७।। इति ते कथितं देवि ! पञ्च-रत्नं महेशितुः । अर्थात् तुम नित्य हो, तुम सब लोकों के आश्रय हो, तुम्हें नमस्कार करता हूँ। तुम ज्ञान-स्वरूप हो, विश्व की आत्मा-स्वरूप हो, अद्वैत तत्त्व, मुक्ति-दायक तुम्हें नमस्कार है। तुम सर्व-व्यापी निर्गुण ब्रह्म हो, तुम्हें
तीसरा उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि | ११ नमस्कार (१) । तुम एकमात्र शरण्य अर्थात् आश्रय हो, तुम अद्वितीय वरणीय हो, तुम जगत् के एकमात्र कारण हो, तुम विश्व-रूप हो, एक-मात्र तुम्हीं जगत् के सृष्टि-कर्त्ता, पालन-कर्त्ता और अन्त में संहार-कर्त्ता हो, तुम्हीं एक-मात्र परम पुरुष हो, निश्चल और विविध कल्पनाओं से रहित हो (२) । तुम भय के भय हो, तुम भयानक के भयानक हो, तुम प्राणियों के एकमात्र गति हो, पावित्र्य-जनक सबके पावित्र्य-जनक हो। तुम उच्च पद पर अधिष्ठित ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर आदि के नियामक हो, तुम सभी श्रेष्ठ पदार्थों से श्रेष्ठ हो और रक्षकों के रक्षक हो (३) । हे परेश (ब्रह्मादि देवों के स्वामी), हे प्रभो ! तुम सर्व-रूप, अविनाशी, अनिर्देश्य और सभी इन्द्रियों से अगम्य हो - किसी भी इन्द्रिय द्वारा गोचर नहीं हो । हे सत्य-स्वरूप, हे अचिन्त्य, हे अक्षर, हे व्यापक, हे अव्यक्त तत्व, हे जगद्-भासकाधीश (जगद्-भासक चन्द्र-सूर्यादि के अधीश्वर) अथवा हे जगद्-भासक, हे अधीश, तुम हम लोगों को 'अपाय' अर्थात् भक्ति-विश्लेष और ज्ञान-विश्लेष होने से बचाओ (४) । उसी एक-मात्र ब्रह्म को हम स्मरण करते हैं, उसी अद्वितीय ब्रह्म का हम जप करते हैं, उसी एक जगत्-साक्षी-स्वरूप ब्रह्म को हम प्रणाम करते हैं। वही तुम सत् हो, जगत् के एक-मात्र निधान अर्थात् आश्रय-भूत हो, स्वयं निरालम्ब अर्थात् आश्रय-रहित हो, वही तुम ईश्वर हो, भव-सागर के जहाज-स्वरूप हो, हम तुम्हारा आश्रय ग्रहण करते हैं (५) । परमात्मा ब्रह्म के 'पञ्च-रत्न' नामक इस स्तोत्र को जो संयत होकर पाठ करता है, वह ब्रह्म-सायुज्य को प्राप्त करता है (६) । प्रतिदिन प्रदोष-काल में इस 'पञ्च-रत्न' स्तोत्र का पाठ करे। विशेष कर सोमवार को ज्ञानी व्यक्ति अपने ब्रह्म-निष्ठ बान्धवों को इस स्तोत्र को सुनाये और समझा दे (७) । हे देवि ! महेश्वर के 'पञ्चरत्न स्तोत्र' नामक स्तोत्र को तुमसे मैंने कहा है (५६-६५) । हे चार्वङ्गि ! उनके 'जगन्मङ्गल' नामक कवच को सुनो। इस कवच का पाठ करने एवं धारण करने से निश्चय ही ब्रह्म-ज्ञानी होता है (६६) - कवचं शृणु चार्वङ्गि ! जगन्मङ्गल-नामकम् । पठनाद् धारणाद् यस्य ब्रह्मज्ञो जायते ध्रुवम् ॥१ परमात्मा शिरः पातु हृदयं परमेश्वरः । कण्ठं पातु जगत्-पाता वदनं सर्व-दृग्-विभुः ॥२ करौ मे पातु विश्वात्मा पादौ रक्षतु चिन्मयः । सर्वाङ्गं सर्वदा पातु परं ब्रह्म सनातनम् ॥३ श्रीजगन्मङ्गलस्यास्य कवचस्य सदाशिवः । ऋषिश्च्छन्दोऽनुष्टुविति परम-ब्रह्म देवता । चतुर्वर्ग-फलावाप्त्यै विनियोगः प्रकीर्त्तितः ॥४॥ यः पठेद् ब्रह्म-कवचं ऋर्षि-न्यास पुरःसरम् । स ब्रह्म-ज्ञानमासाद्य साक्षाद् ब्रह्म-मयो भवेत् ॥५ भूर्जे बिलिख्य गुटिकां स्वर्णस्थां धारयेद् यदि । कण्ठे दक्षिणे बाहौ सर्व-सिद्धीश्वरो भवेत् ॥६ इत्येतत् परम-ब्रह्म-कवचं ते प्रकाशितम् । दद्यात् प्रियाय शिष्याय गुरु-भक्ताय धीमते ॥७ अर्थात् परमात्मा हमारे शिरोदेश की रक्षा करें, परमेश्वर हृदय की रक्षा करें, जगत्-पाता कण्ठ की रक्षा करें, सर्व-दर्शी विभु वदन को रक्षा करें (१) । विश्वात्मा हमारे दोनों हाथों की रक्षा करें, चिन्मय हमारे दोनों पैरों की रक्षा करें, सनातन परब्रह्म सदैव हमारे सर्वाङ्ग की रक्षा करें (२) । इस जगन्मङ्गल कवच के ऋषि सदा- शिव, छन्द अनुष्टुप्, देवता परमब्रह्म, फल चतुर्वर्ग-प्राप्ति के निमित्त विनियोग है (३) । जो ऋषि-न्यास कर इस ब्रह्म-कवच का पाठ करता है, वह ब्रह्म-ज्ञान पाकर साक्षात् ब्रह्म-मय होता है (४) । जो इस कवच को भोज-पत्र पर लिखकर स्वर्ण-गुटिका में रखकर कण्ठ या दाईं भुजा में धारण करता है, वह सब प्रकार की सिद्धियों का स्वामी होता है (६) । तुमसे मैंने इस परम ब्रह्म का कवच प्रकट किया। इसे गुरु-भक्त, बुद्धिमान्, प्रिय शिष्य को
१२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र प्रदान करे (७) । साधक-श्रेष्ठ व्यक्ति स्तोत्र-कवच का पाठ कर (बाद में उक्त मन्त्र के जप-पूर्वक) प्रणाम करे। यथा- ॐ नमस्ते परमं ब्रह्म नमस्ते परमात्मने । निर्गुणाय नमस्तुभ्यं सद्-रूपाय नमो नमः ।। अर्थात् तुम परम ब्रह्म हो, तुम्हें नमस्कार। तुम परमात्मा हो, तुम्हें नमस्कार। तुम गुणातीत हो, तुम्हें नमस्कार । तुम सत्-स्वरूप हो, तुम्हें बारम्बार नमस्कार (६७-७४) । परब्रह्म की आराधना में कायिक, वाचिक या मानसिक-जैसी इच्छा हो, तीनों नमस्कार किए जा सकते हैं। परन्तु जिससे अन्तःकरण शुद्ध हो, वही विधि करनी चाहिए (७५) । ज्ञानी व्यक्ति इसी प्रकार ब्रह्म की पूजा कर आत्मीय स्वजनों के साथ महा-प्रसाद ग्रहण करे (७६) । परब्रह्म को पूजा के समय न आवाहन होता है, न विसर्जन । सभी समय, सभी स्थानों में ब्रह्म की साधना हो सकती है। स्नान किए हो या बिना नहाए, भोजन किए हो या भूखा हो, जिस किसी अवस्था में या जो भी समय हो, विशुद्ध-चित्त होकर परमात्मा की पूजा करे (७७-७८) । इस ब्रह्म-मन्त्र द्वारा जो कोई भक्ष्य, पेयादि वस्तु परब्रह्म को समर्पित की जाती है, वह अति पवित्र- कारी होती है (७६) । गङ्गा-जल या शालग्राम शिला आदि में अर्पित वस्तु को स्पर्श-दोष लग सकता है किन्तु परब्रह्म को अर्पित वस्तु को स्पर्श-दोष नहीं लगता (८०) । जो कोई भी द्रव्य, पका हो या कच्चा, उक्त मन्त्र द्वारा उसे ब्रह्मसात् कर साधक व्यक्ति स्वजनों के साथ भोजन कर सकता है (८१) । ब्रह्म को निवेदित वस्तु के खाने में ब्राह्मणादि वर्ण का विचार नहीं होता। उच्छिष्टादि का भी विचार नहीं होता। इसमें समय-असमय, पवित्र-अपवित्र की व्यवस्था नहीं है (८२) । जिस समय, जिस स्थान में, जिसके द्वारा ब्रह्म को अर्पित नैवेद्य प्राप्त हो, उसका विचार न कर भोजन करे (८३) । ब्रह्मसात् किया हुआ अन्न यदि चाण्डाल लाये, या कुत्ते के मुख से लाया गया हो, तो भी वह पवित्र है; यह अन्न देवताओं को भी दुर्लभ है (८४) । हे सुर-वन्दिते ! मनुष्यों के लिए इसकी दुर्लभता को क्या बात कही जाय (८५) । यदि कोई व्यक्ति महा-पाप से युक्त हो, या किसी अन्य पातक से युक्त हो, वह यदि एक बार मात्र प्रसाद ग्रहण कर ले, तो वह सभी पापों से मुक्त हो जायगा, इसमें कोई सन्देह नहीं (८६) । साढे तीन कोटि तीर्थों में स्नान और दान करने से जो फल होता है, वही फल ब्रह्म को अर्पित वस्तु का सेवन करने से मनुष्यों को मिलता है (८७) । मनुष्य लोग अश्वमेधादि यज्ञ कर जो फल भोगते हैं, उससे कोटि गुणा अधिक फल ब्रह्म को निवेदित वस्तु के भक्षण से मिलता है (८८) । यदि सहस्र कोटि जिह्वा हों, सौ कोटि मुख हों, तो भी महा-प्रसाद के माहात्म्य का वर्णन करने में समर्थ नहीं हो सकता (८६) । जिस किसी भी स्थान में स्थित हो, ब्रह्म को अर्पित महा-प्रसाद के मिलने पर, उसे ग्रहण करने से चाण्डाल-जाति के लोग भी ब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करते हैं (६०) । यदि नीच जाति के लोगों का अन्न है, किन्तु यदि वह ब्रह्म को समर्पित हुआ है, तो वेदान्त-पारदर्शी ब्राह्मण भी उसे ग्रहण कर सकता है (६१) । परम ब्रह्म का प्रसाद ग्रहण करते समय जाति-भेद का विचार न करे। जो इस महा-प्रसाद को (नीच जाति के स्पर्श से) अशुद्ध समझता है, वह महा-पापी होता है (६२) । हे प्रिये ! भले ही सौ पाप करे, भले ब्रह्म-हत्या करे किन्तु ब्रह्म को अर्पित अन्न की अवहेलना न करे (६३) । हे भद्रे ! जो मूर्ख लोग इस महा-मन्त्र द्वारा संस्कृत अन्न-जल आदि का त्याग करते हैं, उनके पितृ-गण का अधःपतन होता है (६४) । और स्वयं वे प्रलय-काल तक अन्ध-तामिस्र नामक नरक में गिर कर रहते हैं। जिन्हें ब्रह्म को निवेदन अन्न से द्वेष होता है, उनका कुछ भी निस्तार नहीं होता (६५) । जो महा-मन्त्र का साधन करते हैं, उनके सभी अपुण्य कर्म पुण्य कर्मों में बदल जाते हैं; सुषुप्ति भी सुकर्म- स्वरूप होती है और स्वेच्छाचार भी विहित कर्म माना जाता है (६६) । जो व्यक्ति ब्रह्म-निष्ठ ज्ञानी है, उसे वैदिकाचार से क्या प्रयोजन अथवा तान्त्रिक अनुष्ठान से क्या प्रयोजन, उसका स्वेच्छाचार ही विधि-स्वरूप
तीसरा उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि | १३ कहा जाता है (९७) । ब्रह्म-निष्ठ व्यक्ति जो समस्त वैध कर्मानुष्ठान करते हैं, उनसे उन्हें कोई फल नहीं लगता और वे जिन वैध कर्मों का अनुष्ठान नहीं करते, उससे भी उन्हें कोई पाप नहीं लगता । ब्रह्म-मन्त्र के साधन के कारण उन्हें कोई विघ्न या दोष नहीं होता (९८) । हे महेश्वरि ! इस धर्म का अनुष्ठान करते समय सत्यवादी, जितेन्द्रिय, परोपकार-परायण, निर्विकार-चित्त और सदाशय रहना होता है (९९) । ब्रह्म-निष्ठ व्यक्ति मात्सर्य-विहीन, दम्भ-रहित, दयालु, विशुद्ध-हृदय, माता- पिता का प्रिय करनेवाला और माता-पिता की सेवा में तत्पर रहता है (१००) । वह सदा ब्रह्म-प्रतिपादक बातों को सुनता है, ब्रह्म का चिन्तन करता है और सदा ब्रह्म का अनुसन्धान या तत्त्व की जिज्ञासा करता है । वह सदा संयत-चित्त और दृढ़-बुद्धि रहता है, वह सदा 'ब्रह्म-साक्षात्' की भावना करता है (१०१) । वह कभी मिथ्या बात नहीं करता, दूसरों का अनिष्ट नहीं करता । ब्रह्म-मन्त्रोपासक व्यक्ति पर-स्त्री-गमन नहीं करता (१०२) । ब्रह्म-निष्ठ व्यक्ति सभी कर्मों के आरम्भ में 'तत्-सत्' इन शब्दों का उच्चारण करता है । हे देवि ! ब्रह्म-निष्ठ व्यक्ति खाने-पीने आदि सभी कार्यों में 'ब्रह्मार्पणमस्तु' इस वाक्य को कहे । जिस उपाय से सभी मनुष्यों की लोक- यात्रा का निर्वाह उत्तम रूप से हो, वही उपाय ब्रह्मज्ञ व्यक्ति करे । यही सनातन धर्म है (१०३-४) । हे शाम्भवि ! अब ब्रह्म-मन्त्र की सन्ध्योपासना-विधि बताता हूँ। इस सन्ध्या-वन्दना को करके ब्रह्म-निष्ठ मनुष्य लोग पृथिवी पर ब्रह्म-रूप सम्पत्ति पा सकते हैं (१०५) । हे देवि ! साधक-श्रेष्ठ सुधी व्यक्ति प्रातःकाल, मध्याह्न-काल और सन्ध्या-काल में उपयुक्त स्थान पर यथोचित आसन पर पूर्ववत् बैठकर परम ब्रह्म का ध्यान कर १०८ बार गायत्री का जप करे । फिर यथा-विधि ('ब्रह्मार्पणमस्तु' यह कहकर) जप समर्पित कर पूर्ववत् प्रणाम करे (१०६-७) । यह मैंने तुमसे ब्रह्म-मन्त्र-विषयक सन्ध्या-विधि कही। इस सन्ध्या का अनुष्ठान करने से साधक व्यक्ति का अन्तःकरण शुद्ध होता है (१०८) । हे चार्वङ्गि ! अब सर्व-पाप-नाशिनी 'गायत्री' को बताता हूँ, सुनो— परमेश्वराय विद्महे पर-तत्त्वाय धीमहि तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात् । इस ब्रह्म-गायत्री से धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतुर्वर्ग का फल पाया जा सकता है । पूजा, याग, स्नान, पान, भोजन आदि जो-जो कर्म करने हों, उन सबको इसी ब्रह्म-मन्त्र द्वारा सिद्ध करे । (१०९-११२) ब्राह्म मुहूर्त्त में उठकर ब्रह्म-मन्त्र देनेवाले गुरु को प्रणाम करने के बाद परम ब्रह्म का ध्यान कर यथाशक्ति मन्त्र का स्मरण करे । फिर पूर्ववत् ब्रह्म को नमस्कार करे । ब्रह्मोपासकों के लिए यही प्रातःकृत्य कहा गया है (११३) । ३२ हजार जप से इस मन्त्र का पुरश्चरण होता है । जप का दशांश होम, होम का दशांश तर्पण करे (११४) । तर्पण का दशांश अभिषेक करे । हे सुन्दरि ! मन्त्र-साधक व्यक्ति पुरश्चरण-कर्म में अभिषेक के दशमांश ब्राह्मणों को भोजन कराए (११५) । ब्रह्म-मन्त्र का पुरश्चरण करते समय भक्ष्याभक्ष्य विचार नहीं है, त्याज्यात्याज्य का विचार नहीं है, काल-शुद्धि का भी नियम नहीं है, स्थान का भी निरूपण नहीं है (११६) । बिना खाए हो या खाए हुए हो । स्नान किए हो या बिना स्नान के हो, यथेच्छानुसार ही इस परम मन्त्र की साधना करे (११७) । इस ब्रह्म-साधन के सम्बन्ध में क्लेश नहीं है, परिश्रम नहीं है, स्तव या कवच का पाठ नहीं करना होता, न्यास या मुद्रा-प्रदर्शन नहीं करना होता । हे वरानने ! अन्य मन्त्र में जिस प्रकार हृदय में सेतु- चिन्ता करनी होती है, उस प्रकार सेतु-चिन्ता इसमें आवश्यक नहीं है (११८) । इस ब्रह्म-मन्त्र के साधन के सम्बन्ध में चौर-गणेशादि के मन्त्र का जप नहीं करना होता, कुल्लुका का भी विन्यास नहीं करना होता । इन समस्त अनुष्ठानों को न करने पर भी अल्पकाल में निश्चय ही परम ब्रह्म का साक्षात्कार-लाभ होता है (११९) ।
१४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र इस महा-मन्त्र के साधन के सम्बन्ध में 'मानसिक सङ्कल्प' कहा जाता है। इसमें भाव-शुद्धि बड़ी आवश्यक है (१२०)। हे देवि ! ब्रह्म-साधक सभी को ब्रह्म-मय की भावना करे। इस ब्रह्म-साधना में त्रुटि होने से अङ्ग-वैगुण्य नहीं होता और प्रत्यवाय भी नहीं होते। इस महा-मन्त्र के साधन में कोई स्थल अंग-हीन होने पर भी वह निश्चय ही सांग हो जाता है (१२१)। इस अति दुस्तर, तपस्या-हीन, घोर पाप-मय कलि-युग में ब्रह्म- मन्त्र का साधन ही एकमात्र निस्तार का उपाय है (१२२)। हे महेश्वरि ! विविध तन्त्रों और विविध आगमादि शास्त्र में विभिन्न प्रकार के साधन के विषय कहे गए हैं। परन्तु कलि-युग में दुर्बल जीव के लिए वह सब असाध्य है (१२३)। हे प्रिये ! कलि-युग के मनुष्य लोग अल्पायु होते हैं, वे बड़े अनुष्ठान नहीं कर पाते। अन्न में ही उनके प्राण रहते हैं। वे लोभी, धन कमाने में व्याकुल और सदा चंचल चित्त वाले होते हैं (१२४)। समाधि में उनकी बुद्धि स्थिर रहतो नहीं। वे योग-जन्य कष्ट सहन करने में असमर्थ होते हैं, अतः उनके हित एवं मोक्ष के लिए मैंने इस ब्रह्मोपासना का पथ प्रकट किया है (१२५)। हे देवि ! मैं सत्य-सत्य कहता हूँ, कलि-युग में ब्रह्म-दीक्षा के सिवा सुख और मुक्ति के लिए दूसरा कोई उपाय नहीं है (१२६)। सब तन्त्रों में यही विधि है कि प्रातःकाल प्रातःकृत्य सम्पन्न कर त्रि-काल सन्ध्या करे और मध्याह्न में पूजा करे। हे शिव ! परम ब्रह्म की उपासना में साधक की इच्छा ही विधि-स्वरूप मानी जाती है (१२७)। ब्रह्म-साधन में शास्त्रीय सभी विधियाँ दासी-स्वरूप हो जाती हैं, सारे निषेध भी कुछ प्रभाव नहीं डाल पाते। स्वेच्छानुरूप आचरण द्वारा ही इष्ट-सिद्धि होती है। इस प्रकार के ब्रह्म-साधक को छोड़कर अन्य किसका सहारा लिया जा सकता है (१२८) ? स्थिर-चित्त, प्रशान्त, ब्रह्म-ज्ञानी गुरु को पाते ही उनके चरण-कमलों को पकड़कर भक्ति-भाव के साथ प्रार्थना करे कि— करुणामय ! दीनेश ! तवाहं शरणं गतः । त्वत्-पदाम्भोरुहच्छायां देहि मूर्ध्नि यशोधन ॥ अर्थात् हे करुणामय ! हे दीन लोगों के ईश्वर ! मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ। हे यशोधन ! मेरे मस्तक पर अपने चरण-कमलों की छाया प्रदान करें (१२६-३०)। यह प्रार्थना कर शिष्य गुरु को यथा-शक्ति पूजा करे। फिर गुरु के सामने हाथ जोड़कर चुप होकर बैठे (१३१)। तब गुरु यथा-विधि शिष्य के लक्षणों की परीक्षा कर सत् शिष्य को बुलाकर कृपा-पूर्ण हृदय से महा-मन्त्र प्रदान करें (१३२)। फिर वे ज्ञानी गुरु पूर्व या उत्तर-मुख होकर आसन पर बैठकर शिष्य को अपनी बाईं ओर बैठाकर करुणा-पूर्ण हृदय से उसे देखें (१३३)। तदनन्तर साधक को इष्ट-सिद्धि के लिए ऋषि-न्यास कर शिष्य के मस्तक पर एक सौ आठ बार मन्त्र का जप करें (१३४)। फिर करुणानिधि सद्गुरु ब्राह्मण के दाएँ कान में, अन्य जातियों के बाएँ कान में सात बार मन्त्र सुनायें (१३५)। हे कालिके ! यह तुमसे ब्रह्म-मन्त्र के उपदेश की विधि मैंने कही। इसमें पूजादि की अपेक्षा नहीं है। इसमें केवल मानसिक सङ्कल्प करना होता है (१३६) तब शिष्य गुरु के चरण-कमलों में दण्डवत् गिरे और गुरु उसे स्नेहपूर्वक निम्न मन्त्र पढ़ते हुए उठायें— उत्तिष्ठ वत्स ! मुक्तोऽसि ब्रह्म-ज्ञान-परो भव । जितेन्द्रियः सत्य-वादी बलारोग्यं सदास्तु ते ॥ अर्थात् हे पुत्र, उठो। तुम मुक्त हो, तुम ब्रह्म-ज्ञान-परायण बनो। तुम सत्य-वादी और जितेन्द्रिय रहो। बल और आरोग्य सदा तुम्हारे रहें (१३७)। इस पर साधक-श्रेष्ठ उठकर गुरु को यथाशक्ति दक्षिणा-स्वरूप धन या फल प्रदान करे। फिर गुरु का आज्ञाकारी होकर देवता के समान भू-मण्डल पर विचरण करे (१३८-३६)। जो ब्रह्म-मन्त्र ग्रहण करता है, उसकी
चौथा उल्लास : प्रकृति-साधना का उपक्रम | १५ आत्मा मन्त्र ग्रहण करने मात्र से ब्रह्म-मय हो जाती है। हे देवि ! जो ब्रह्म-स्वरूप हो जाता है, उसे अन्य बहुत से साधनों की क्या आवश्यकता ? हे प्रिये ! यह मैंने तुमसे संक्षेप में ब्रह्म-दीक्षा कही (१४०) । जिस समय गुरु की दया हो, उसी समय ब्रह्म-मन्त्र की दीक्षा ग्रहण करे (१४१) । शाक्त हो या शैव हो, वैष्णव हो या सौर हो अथवा गाणपत्य हो, चाहे जिस मन्त्र का उपासक हो, ब्राह्मण हो या अन्य किसी जाति का हो, सभी ब्रह्म-मन्त्र के अधिकारी हैं (१४२ । हे देवि ! मैं इसी मन्त्र के प्रसाद से मृत्युञ्जय, देवदेव, जगद्- गुरु, स्वेच्छाचारो और निर्विकल्प होकर रहता हूँ (१४३) । पूर्वकाल में ब्रह्मा और भृगु आदि ब्रह्मर्षि-गण, इन्द्र आदि देव-गण और नारद आदि देवर्षि-गण ने मुझसे इसी ब्रह्म-मन्त्र को प्राप्त कर उपासना की है (१४४) । हे प्रिये ! नारद के मुख से व्यासादि मुनि-गण और उनसे जनकादि राजर्षि-गण ने इस महा-मन्त्र को प्राप्त कर परमात्मा की प्रसन्नता से ब्रह्म-स्वरूप का लाभ किया है (१४५) । हे महेश्वरि ! ब्रह्म-मन्त्र में किसी विषय का विचार नहीं है। गुरु बिना विचार किए शिष्य को अपना मन्त्र दे सकता है (१४६) । पिता पुत्र को, भाई भाई को, पति स्त्री को, मामा भांजे को और नाना नाती को दीक्षित कर सकता है (१४७) । अपना मन्त्र देने में जो दोष कहा गया है और पिता आदि की दीक्षा में जो दोष उल्लिखित है, वह सब दोष इस महा-सिद्ध ब्रह्म-मन्त्र में घटित नहीं होते (१४८) । ब्रह्म-ज्ञानी गुरु के मुख से जिस किसी विधान से ब्रह्म-मन्त्र को सुनकर मनुष्य ब्रह्म- भूत और पवित्र हो जाता है, जिससे वह पुण्य-पाप में लिप्त नहीं होता (१४६) । ब्राह्मण या अन्य जाति के जो लोग ब्रह्म-मन्त्र की उपासना करते हैं, वे सब अपने-अपने वर्ण के लोगों में श्रेष्ठ, पूज्य और विशेष रूप से मान्य होते हैं (१५०) । ब्रह्मोपासक ब्राह्मण-गण साक्षात् यति-स्वरूप होते हैं और अन्य जाति के लोग ब्राह्मण के समान होते हैं। इस प्रकार ब्रह्म-मन्त्र में दीक्षित ब्रह्मज्ञ व्यक्ति की पूजा सभी को करना कर्तव्य है (१५१) । जो ब्रह्मज्ञ व्यक्ति को अवमानना करते हैं, वे ब्रह्म-घातक होते हैं और जब तक सूर्य और तारे हैं तब तक वे घोर नरक में रहते हैं (१५२) । स्त्री-हत्या करने से जो पाप होता है, भ्रूण-हत्या से जो पातक लगता है, उससे कोटि गुना अधिक पाप ब्रह्मोपासक की निन्दा करने से होता है (१५३) । ब्रह्म-मन्त्र में उपदिष्ट होकर लोग जिस प्रकार सब पापों से मुक्त हो ब्रह्म-सायुज्य को पाते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे साधन द्वारा भी होता है (१५४) । चौथा उल्लास : प्रकृति-साधना का उपक्रम इसके बाद भगवती ने परब्रह्म की उपासना का विवरण सुनकर परमानन्द से युक्त होकर शङ्कर से जिज्ञासा की (१) । हे नाथ ! आपने ब्रह्मोपासना का जो विषय कहा है, वह सब लोगों को प्रिय है और साक्षात् ब्रह्म-पद का देनेवाला है (२) । इस ब्रह्म-साधन से तेज, बुद्धि, बल और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है और सभी सुखों का साधन है। हे जगदीश्वर ! मैं तुम्हारे वचनामृत से बहुत सन्तुष्ट हुई हूँ (३) । हे दया-सागर ! आपने कहा है कि ब्रह्म-साधन द्वारा जिस प्रकार ब्रह्म का सायुज्य मिलता है, उस प्रकार मेरी साधना द्वारा भी ब्रह्म का सायुज्य पाया जा सकता है (४) । हे प्रभो ! जो आपने बताया है, जिसके द्वारा ब्रह्म का सायुज्य मिलता है, उसी प्रकार की मेरी साधना मैं जानना चाहती हूँ (५) । मेरी साधना की विधि किस प्रकार की है और किस
१६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र प्रकार के पथ का अवलम्बन करना होगा या साधन करना होगा, उसका मन्त्र क्या है, अथवा ध्यान-पूजा आदि क्या है (६) ? हे देव-देव ! आप यह सब विशेष रूप से और सम्पूर्ण रूप में आद्योपान्त बताइए । इससे मेरो प्रसन्नता होगी और लोगों का हित होगा । हे शम्भो ! आपको छोड़कर कौन व्यक्ति संसार-रूपी व्याधि का निवा- रण करने में समर्थ होगा ? आप ही सद्-वैद्य और उपदेष्टा हैं (७) । पार्वती-पति देव-देव महा-देव ने पार्वती के ये वचन सुनकर प्रीति-पूर्वक कहा (८) । श्री सदाशिव ने कहा कि—हे महा-भागे ! हे देवि ! मनुष्य लोग तुम्हारी साधना द्वारा ब्रह्म-सायुज्य पा सकें, इसके लिए मैं तुम्हारी आराधना का विषय कहता हूँ, सुनो (६) । तुम साक्षात् परम ब्रह्म की परमा प्रकृति अर्थात् शक्ति हो। यह सारा जगत् तुम्हीं से उत्पन्न हुआ है। हे शिवे ! तुम सारे जगत् की जननी हो (१०) । हे भद्रे ! महत् तत्त्व से परमाणु तक और स्थूल सूक्ष्म सारा स्थावर- जङ्गम-स्वरूप जगत् तुम्हारे ही द्वारा उत्पन्न हुआ है । यह सारा जगत् तुम्हारे ही अधीन है (११) । तुम सबकी आद्या अर्थात् आदि-भूता हो । सारी विद्याएँ और हम सब तुम्हीं से उत्पन्न हुए हैं। सारे जगत् के सभी विषयों को तुम जानती हो । तुम्हें कोई नहीं जान सकता (१२) । तुम काली हो, तुम तारिणी हो, तुम दुर्गा हो, तुम षोडशी हो, तुम भुवनेश्वरी हो, तुम धूमावती हो, तुम बगला हो, तुम भैरवी हो, तुम छिन्न-मस्ता हो (१३) । तुम अन्नपूर्णा हो, तुम वाग्-देवी हो, तुम कमलालया लक्ष्मी हो, तुम सर्व-शक्ति-स्वरूपा हो, तुम सर्व-देव-मयी हो (१४) । तुम सूक्ष्मा हो, तुम स्थूला हो, तुम व्यक्त-स्वरूपा हो, तुम अव्यक्त-स्वरूपा हो, तुम निराकारा होकर भी साकारा हो । तुम्हें कोई भी नहीं जान सकता (१५) । तुम उपासकों के कार्य के लिए, जगत् के कल्याण के लिए और दानवादि के संहार के लिए समय-समय पर विविध प्रकार की देह धारण करती हो (१६) । तुम विश्व-रक्षा के लिए कभी चतुर्भुजा, कभी द्विभुजा, कभी षड्-भुजा, कभी अष्ट-भुजा होकर विविध प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करती हो (१७) । सभी तन्त्रों में उन्हीं विविध रूप-भेदों के विविध प्रकार के मन्त्र और विविध प्रकार के यन्त्रादि और विविध साधन बताए गए हैं। पशु, दिव्य और वीर—ये तीन प्रकार के भाव कहे गए हैं (१८) । कलियुग में पशु-भाव नहीं है, दिव्य भाव भी दुर्लभ है । कलियुग में वीर-साधन ही प्रत्यक्ष फल-दायक है (१६) । हे देवि ! कलियुग में कुलाचार के बिना सिद्धि नहीं हो सकती । अतएव सब प्रयत्न करके कुल-साधन करे (२०) । हे देवि ! कुलाचार द्वारा ब्रह्म- ज्ञान का जन्म होता है । जिस मनुष्य को ब्रह्म-ज्ञान होता है, वही जीवन्मुक्त है, इसमें सन्देह नहीं (२१) । शास्त्रों के ज्ञान द्वारा सभी वस्तुएँ पवित्र ज्ञात होती हैं और उसी ज्ञान द्वारा सभी वस्तुएँ अपवित्र प्रतीत होती हैं किन्तु जब ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त होता है, तब कोई वस्तु पवित्र या अपवित्र नहीं रहती (२२) । जो यह जानता है कि परब्रह्म सर्व-व्यापी है, उसके लिए कौन वस्तु अपवित्र है ? कारण वह सारे जगत् को 'ब्रह्म' नाम से ही जानता है (२३) । हे देवेशि ! तुम सर्व-स्वरूपिणी हो और संसार-चक्र द्वारा क्रीड़ा करनेवाली हो तथा सबकी परम जननी हो । तुम्हारे परितुष्ट होने पर सभी का परितोष होता है (२४) । सृष्टि के आदि में तुम्हीं 'तमो' अर्थात् प्रकृति-रूप से विद्यमान रहती हो । तुम्हारा वही रूप वाणी और मन से अगोचर है । परब्रह्म को सिसृक्षा- सृष्टि करने की इच्छा से तुम्हारे द्वारा सारा जगत् उत्पन्न होता है (२५) । महत् तत्त्व से महा-भूत पृथिवी तक सारा जगत् तुम्हीं से सृष्ट होता है । सब कारणों का कारण हो, वह ब्रह्म निमित्त मात्र है (२६) । वह सत्-स्वरूप और सर्व-व्यापी है। सारे जगत् को वेष्टन कर अवस्थित रहता है, सभी वस्तुओं में वह सदा एक-रूप, परिणाम- रहित, चिन्मात्र और निर्लिप्त है (२७) । वह कोई कार्य नहीं करता, वह भक्षण करता नहीं, गमन करता नहीं ।
चौथा उल्लास : प्रकृति-साधना का उपक्रम | १७ किसी वस्तु-विशेष में उसका अवस्थान नहीं है। वह निष्क्रिय है। वह सत्य-स्वरूप है। वह आदि-अन्त से रहित है। वह वाणी और मन से अगोचर है (२८) । तुम परात्परा महा-योगिनी हो। तुम उस (ब्रह्म) की इच्छा मात्र का अवलम्बन कर इस चराचर जगत् की सृष्टि करती हो ओर इस जगत् का पालन करती हो तथा सर्वान्त में सारे जगत् का संहार करती हो (२६) । जगत् का संहारक महा-काल है, यह तुम्हारा ही एक रूप है। यही महा-काल महा-संहार के समय सब का ग्रास करता है (३०) । सब प्राणियों का 'कलन' अर्थात् ग्रास करता है, इसी से वह 'महा-काल' नाम से कहा जाता है। तुम महा-काल का कलन अर्थात् ग्रास करती हो, इसी से तुम्हारा नाम है आद्या परमा कालिका (३१) । तुम काल को ग्रास करती हो, इसी से तुम 'काली' हो। तुम सबकी आदि हो। तुम सबकी काल-स्वरूपा और आदि-भूता हो। इसी से तुमको संसार में 'आद्या काली' कहते हैं (३२) । सर्व-संहार-समय प्रलय-काल में तुम वाणी के अतीत, मन से अगम्य, तमोमय आकृति-रहित स्वरूप का अवलम्बन कर अकेली स्थित रहती हो (३३) । तुम साकारा होकर भी निराकारा हो। तुम माया द्वारा बहुत से रूप धारण करती हो, तुम सबको आदि हो, अनादि हो, कर्त्री, हर्त्री और पालिका हो (३४) । इसलिए हे भद्रे ! मैं तुमसे कहता हूँ कि ब्रह्म-मन्त्र में दीक्षित व्यक्ति जो फल प्राप्त करता है, वह तुम्हारे साधन द्वारा भी उसी फल को पा सकता है (३५) । हे देवि ! देश, काल और अधिकार-भेद से विविध आचारों और भावों को प्रकट करता हूँ। किसी-किसी तन्त्र में मैंने गुप्त साधन भी कहे हैं (३६) । उनमें से जिस साधन में जो मनुष्य अधिकारी है, वह उसके अनुरूप अनुष्ठान कर फल को प्राप्त करता है और पाप-रहित होकर भव-सागर को पार करता है (३७) । बहुत से जन्मों में अर्जित पुण्य के द्वारा जीव की प्रवृत्ति कुलाचार में होती है। कुलाचार द्वारा जिसकी आत्मा पवित्र होती है, वह साक्षात् शिव-मय होता है (३८) । जहाँ भोग का बाहुल्य है, वहाँ क्या योग की सम्भावना है ? जहाँ योग का अनुष्ठान है, वहाँ भोग की भी सम्भावना दिखाई नहीं देती। कुलाचार में प्रवृत्त जीव भोग और योग—इन दोनों का भोग करता है (३६) । हे सुव्रते ! जिस व्यक्ति द्वारा कुल-तत्त्व-ज्ञानी एक साधक की पूजा की जाती है, उसके द्वारा सभी देव एवं सभी देवियाँ पूजा पा जाती हैं, इसमें सन्देह नहीं (४०) । सोने से भरी हुई पृथिवी का दान करने से जो फल मिलता है, उससे कोटि गुना अधिक पुण्य कुलाचार-निरत एक व्यक्ति की पूजा करने से प्राप्त होता है (४१) । यदि चाण्डाल भी कुल-तत्त्व-ज्ञानी है, तो वह ब्राह्मण की भी अपेक्षा श्रेष्ठ है किन्तु यदि ब्राह्मण कुलाचार-हीन है, तो वह चाण्डाल से भी नीच है (४२) । मैं जानता हूँ कि कुल-धर्म की अपेक्षा कोई अन्य धर्म श्रेष्ठ नहीं है। यह जो कुल-धर्म है, इसके अनुष्ठान मात्र से मनुष्य लोग ब्रह्म-ज्ञानी हो जाते हैं (४३) । हे देवि ! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, तुम हृदय में इसे धारण कर लो। कुल-धर्म सब धर्मों की अपेक्षा उत्तम है, इससे श्रेष्ठ और कोई धर्म नहीं है (४४) । यही परम पथ है, पशु-समूह से गुप्त है। जब प्रबल कलिकाल होगा, तब शीघ्र ही यही पथ प्रकाशित हो उठेगा (४५) । मैं सत्य सत्य कहता हूँ, जब कलिकाल प्रकृष्ट रूप में वर्द्धित होगा, तब कौलाचारी मनुष्यों के सिवा पश्वाचारी लोग पृथिवी पर नहीं रहेंगे (४६) । हे वरारोहे ! जब देखना कि पृथिवी पर वैदिकी दीक्षा और पौराणिकी दीक्षा नहीं हैं, तभी समझना कि कलि प्रबल है (४७) । हे शान्ते शिवे ! जिस समय पाप-पुण्य की वेदोक्त परीक्षा नहीं रहेगी, तभी विवेचन करना कि कलि प्रबल है (४८) । हे कुलेश्वरि ! जिस समय गंगा कहीं छिन्न और कहीं भिन्न रूप में होंगी, तभी समझना कि कलि प्रबल है (४६) । हे महा-प्राज्ञे ! जिस समय म्लेच्छ जाति के लोग शासक होंगे और वे धन-लोलुप होंगे, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५०) । जिस समय स्त्रियाँ बहुत दुर्दान्त, कर्कश- भाषिणी और कलह-तत्परा होकर स्वामी की निन्दा करेंगी, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५१) । जिस समय फा० ३
१८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र पृथिवी पर मनुष्य लोग काम-किंकर और स्त्री के वशीभूत होकर गुरु, मित्र आदि की अवमानना करेंगे, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५२) । जब पृथ्वी कम फल देनेवाली होगी, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५३) । जिस समय भाई, स्वजन और मन्त्री लोग धन-लाभ की इच्छा से आपस में झगड़ा कर मार-पीट करने लगें, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५४) । जिस समय खुले स्थान में मद्य-मांस खाने में निन्दा हो, दण्ड-वर्जित हो और सभी लोग छिपकर सुरा-पान करें, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५५) । सत्य, त्रेता और द्वापर युग में जिस प्रकार प्रकट रूप से मद्यादि सेवन किया जाता था, उसी प्रकार कलियुग में भी कुल-धर्मानुसार सेवन कर सकते हैं (५६) । जो लोग सत्य द्वारा पवित्र और जितेन्द्रिय होकर कुलाचार का अनुष्ठान करेंगे, जिनका आचार सर्वत्र व्यक्त रहेगा, जो दयालु होंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (५७) । जो गुरु की सेवा में लगे रहेंगे, जो माता के चरण-कमलों में भक्ति करेंगे, जो अपनी पत्नी में ही अनुरक्त रहेंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (५८) । जो सत्य-व्रत, सत्य-निष्ठ और सत्य-धर्म-परायण होकर, कुल-साधन को जो सत्य कहकर विश्वास रखेंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (५६) । जो कुल-धर्म की पद्धति के अनुसार शोधित मत्स्य, मांस, मद्य आदि सत्यवादी योगी को प्रदान करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (६०) । जो हिंसा और मात्सर्य से रहित होंगे, जो दम्भ और द्वेष से शून्य होंगे और जो कुल-धर्म-निष्ठ होंगे, कलि उन्हें पीड़ा नहीं दे सकेगा (६१) । जो कौलों का सत्संग करेंगे, कुल-साधुओं के पास निवास करेंगे, कुल-साधुओं की सेवा करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (६२) । जो कुल-धर्मावलम्बी कुलाचार से विचलित न होकर विविध वेश धारण करते हुए कुलाचार-क्रम से तुम्हारी पूजा करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा न दे सकेगा (६३) । जो कुलाचार के अनुसार स्नान, दान, तपस्या, तीर्थ- दर्शन, व्रत और तर्पण करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा न दे सकेगा। (६४) । जो कुलाचार के अनुसार गर्भाधान आदि संस्कार में संस्कृत होकर पितृ-श्राद्ध आदि कर्म करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा न दे सकेगा (६५) । जो भक्तिपूर्वक कुल-तत्त्व और कुल-द्रव्य का अर्चना करेंगे और कुल-योगी को नमस्कार करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा न दे सकेगा (६६) । कुटिलता और मिथ्याचार-विहीन, निर्मल अन्तःकरण वाले कुल-मार्गानुसारी और परोपकार व्रत में दीक्षित—ऐसे साधुजनों का कलि दास के समान रहेगा (६७) । हे प्रिये ! कलि के दोष-समूह के बीच एक प्रधान गुण भी है कि सत्य-प्रतिज्ञ कौलिक लोगों को सङ्कल्प मात्र से श्रेय प्राप्त होता है (६८) । हे देवि ! अन्य युग में मनुष्यों के पाप-पुण्य मानसिक होते थे अर्थात् सङ्कल्प द्वारा होते थे किन्तु कलियुग में केवल मानसिक पुण्य होता है, पाप नहीं होता (६६) । जो सदा मिथ्या बोलते हैं, जो दूसरों का अनिष्ट करने में लगे रहते हैं, कुलाचार- विहीन हैं—वे सब मनुष्य कलि के किङ्कर होते हैं (७०) । जो कुल-मार्ग में भक्ति नहीं रखते, जो पराई स्त्रियों में आसक्त रहते हैं और जो कुलाचार में लगे व्यक्तियों से द्वेष करते हैं, उन्हें कलि का दास जानना चाहिए (७१) । हे पार्वति ! हे भद्रे ! युगाचार के प्रसङ्ग में तुम्हारी प्रसन्नता के लिए संक्षेप में कलि की प्रबलता के लक्षण कहे गए (७२) । हे देवि ! इस कलि के प्रबल होने पर सभी धर्म दुर्बल हो जायेंगे किन्तु एकमात्र ‘सत्य’ ही रहेगा । अतएव ‘सत्य’-मय होना ही सबका कर्तव्य है (७३) । हे सुव्रते ! ‘सत्य’-धर्म का आश्रय लेकर मनुष्य जो कर्म करेगा, वही कर्म सफल होगा, यही सत्य जाने (७४) । सत्य की अपेक्षा और कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं है, मिथ्या के समान पाप-कार्य और कुछ नहीं है। अतएव मनुष्य का यही कर्तव्य है कि सभी अवस्थाओं में एकमात्र ‘सत्य’ का अवलम्बन करे (७५) । क्षार-भूमि में जिस प्रकार बीज का बोना निष्फल होता है, उसी प्रकार ‘सत्य’- हीन पूजा व्यर्थ होती है, ‘सत्य’-हीन जप व्यर्थ होता है और सत्य’-हीन तपस्या भी व्यर्थ होती है (७६) । ‘सत्य’- रूप ही परम ब्रह्म है, ‘सत्य’ ही परम तपस्या-रूप है, सारी क्रियायें ‘सत्य’-मूलक हैं, ‘सत्य’ से श्रेष्ठ और कुछ
चौथा उल्लास : प्रकृति-साधना का उपक्रम । १६ नहीं है (७७) । अतएव मैंने कहा है कि पाप-मय कलि के प्रबल होने पर 'सत्य' का अवलम्बन कर प्रकट रूप से 'कुलाचार' का अनुष्ठान करे (७८) । गोपन करने से 'सत्य' की हानि होती है। मिथ्या बोले बिना गोपन करना सम्भव नहीं होता। अतएव कौलिक व्यक्ति प्रकट भाव से कुल-साधन करे (७६) । मैंने पहले कुल-तन्त्र में कहा है कि कुल-धर्म की रक्षा के लिए मिथ्या बोलना निन्दित नहीं है किन्तु कलि की प्रबलता होने पर यह उपदेश प्रशस्त नहीं है (८०) । सत्य-युग में चतुष्पाद अर्थात् परिपूर्ण धर्म था। त्रेता-युग में उसका एक पद कम होकर वह त्रि-पाद रह गया। द्वापर-युग में धर्म द्वि-पाद मात्र रहता है। कलि-युग में उसी धर्म का केवल एक पाद शेष रहता है (८१) । धर्म का वह एक पाद भी 'तपस्या' और 'दया'-रूप दो अंशों से भग्न हो जाता है, एकमात्र 'सत्य'-अंश ही दृढ़ रहता है। इस समय वह 'सत्य'-रूप पाद भग्न करने से धर्म का लोप हो जायगा (८२) । हे कुलेश्वरि ! इसी कारण 'सत्य' का सम्यक्-रूप से अवलम्बन करके ही सारे कार्य सम्पन्न करने चाहिए। इस कलि-काल में 'कुला- चार' को छोड़कर अन्य उपाय नहीं है। इस कलि-काल में यदि मिथ्या आचार में प्रवेश करता है, तो कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। अतएव सर्वतोभाव से 'सत्य' द्वारा पवित्रात्मा होकर, मेरे द्वारा बताए मार्ग के अनुसार मनुष्य लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रम के उपयोगी दीक्षा, पूजा, जप, होम, पुरश्चरण, तर्पण आदि सारे कर्मों का आचरण करें (८३-८५) । विशेष कर इस रूप में व्रत, उद्वाह, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जात-कर्म, नाम-करण, चूडाकरण, अन्त्येष्टि-क्रिया, पितृ-श्राद्ध आगम-सम्मत ही करे। तीर्थ-श्राद्ध, वृषोत्सर्ग, शारदोत्सव, यात्रा, गृह- प्रवेश, नूतन वस्त्रालङ्कारादि परिधान, वापी, कूप, गृहारम्भ और गृह-प्रतिष्ठा, देवता-स्थापन, दिवा-कृत्य, रात्रि- कृत्य, पर्व-कृत्य, मास-कृत्य, ऋतु-कृत्य, वर्ष-कृत्य, नित्य-नैमित्तिक कर्म, कर्त्तव्य कर्म, अकर्त्तव्य कर्म, त्याज्य कर्म, ग्राह्य कर्म—इन सबका निर्दिष्ट विधान के अनुसार ही साधन करे (८६-६१) । यदि कोई व्यक्ति मोह, दुर्बुद्धि या अश्रद्धा के वश में होकर उक्त सब कर्मों को निर्दिष्ट विधि से नहीं करता, तो वह सब कर्मों से बहिष्कृत होकर अन्त में विष्ठा में कृमि का जन्म ग्रहण करता है (६२) । हे महेश्वरि ! कलि-युग के प्रबल होने पर यदि कोई मेरे मत को छोड़कर कर्म करता है, तो वह कर्म उल्टा फल देनेवाला होगा (६३) । हे देवि ! मेरे मत से असम्मत दीक्षा साधक को प्राण-घातिनी होगी और भस्म में आहुति देने के समान उसकी पूजा भो निष्फल होगी (६४) । देवता उसके प्रति क्रुद्ध होंगे और पद-पद पर उसे विघ्न होंगे (६५) । हे अम्बिके ! कलिकाल के प्रबल होने पर जो व्यक्ति मेरे कहे शास्त्र को जानते हुए भी अन्य पथ के अनुसार कर्म करेगा, वह महा-पापी होगा (६६) । हे जो व्यक्ति अन्य पथ का अवलम्बन कर व्रत या विवाह करेगा, वह जब तक चन्द्र-सूर्य रहेंगे, तब तक नरक में रहेगा (६७) । अन्य मत से उपनयन होने से ब्रह्म-हत्या का पाप होगा। जिसका उपनयन होगा, वह व्रात्य होगा। वह व्यक्ति केवल सूत्र-वाही होगा और चाण्डाल की भी अपेक्षा अधम होगा (६८) । कुल-नायिके ! अन्य पद्धति के अनुसार जो नारी विवाहिता होगी, वह निन्दिता होगी और विवाह करनेवाला पुरुष भी उसके संसर्ग से पापी होगा, यह जानना उचित है (६६) । उस प्रकार विवाहिता स्त्री-गमन से पुरुष को दिन-दिन वेश्यागमन-जनित पाप होगा। देवता उस नारी के हाथ का अन्न-जलादि ग्रहण न करेंगे (१००) । पितृ लोग भी उसे नहीं खाएँगे-पिएँगे क्योंकि वह मल-मूत्र-समान है। उस स्त्री-पुरुष की जो सन्तान होगी, वह सर्व-धर्म-बहिष्कृत होगी (१०१) । अतः अशााम्भव शास्त्र अर्थात् तन्त्र से भिन्न शास्त्र द्वारा देव-कर्म, पितृ-कर्म और कुलाचार-कर्म में उसे अधिकार न होगा। अशााम्भव अर्थात् तन्त्र- भिन्न शास्त्र की पद्धति से देव-मूर्ति की स्थापना करने से, उस मूर्ति में देवता का सान्निध्य नहीं होगा। उससे इह-लोक या परलोक में कोई फल नहीं मिलेगा। उससे केवल शरीर-कष्ट और धन-नाश ही होगा (१०२-१०३) ।
२० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र जो व्यक्ति आगमोक्त विधि को छोड़कर श्राद्ध करेगा, उसका वह श्राद्ध निष्फल होगा और श्राद्ध-कर्त्ता पितृ-लोगों के साथ नरक को जायगा (१०४) । उसके द्वारा दिया हुआ जल रक्त-समान और पिण्ड मल-मय होगा। अतएव मनुष्यों को सर्वतोभाव से शङ्कर द्वारा प्रदर्शित मत का आश्रय करना ही कर्त्तव्य है (१०५) । हे देवि ! यह अधिक और क्या कहूँ, मैं सत्य-सत्य कहता हूँ कि शिव से असम्मत जो भी कर्म होंगे, वे सब निष्फल होंगे (१०६)। जो शम्भु-प्रोक्त आचार से हीन हैं, उनके उन कर्मों से धर्म होना तो दूर रहा, उनका पूर्व-सञ्चित धर्म भी नष्ट हो जायगा और नरक से उनका उद्धार नहीं होगा (१०७) । हे महेशानि ! मेरे द्वारा कही पद्धति के अनुसार जो नित्य, नैमित्तिक कर्म का साधन है, वही तुम्हारा साधन होगा (१०८) । उनके बीच कलि-रूप रोग का ओषधि-स्वरूप बहु-विध मन्त्र और यन्त्रादि-संयुक्त तुम्हारी विशेष आराधना मैं बताता हूँ, सुनो (१०६) । • — • पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार श्री सदाशिव ने कहा—तुम आद्या और परमा शक्ति हो । तुम सर्व-शक्ति-स्वरूपा हो । तुम्हारी शक्ति के प्रभाव से मैं सृष्टि, स्थिति और प्रलयादि नाश-कार्य में समर्थ होता हूँ (१) । तुम्हारे विविध वर्ण और विविध आकार और बहु प्रयासवाली साधनाओं के अनन्त रूप हैं। कौन व्यक्ति उन सब रूपों का वर्णन कर सकता है (२) । तुम्हारी कृपा से कुल-तन्त्र आदि एवं आगम-समूह में तुम्हारी उन्हीं सब रूपों की पूजा और साधन को मैंने यथा-मति कहा है (३) । किन्तु इस गुप्त साधन को कहीं प्रकट नहीं किया है। हे कल्याणि ! इस गुप्त साधन के प्रभाव से मेरे प्रति तुम्हारी ऐसी कृपा हुई है (४) । हे प्रिये ! इस समय तुम्हारे द्वारा पूछे जाने पर मैं गोपन करने में समर्थ नहीं हूँ। अतएव वह मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय होने पर भी उसे तुम्हारी प्रसन्नता के लिए कहता हूँ (५) । यह गुप्त साधन सब दुःखों को शान्त करनेवाला, सब विपत्तियों को नष्ट करनेवाला है, तुम्हें सन्तुष्ट करनेवाला और शीघ्र ही तुम्हें प्राप्त करानेवाला है (६) । हे प्रिये ! कलि-काल में कलि के पापों द्वारा व्याकुल और अधिक परिश्रम करने में असमर्थ मनुष्य लोगों के लिए यह गुप्त साधन परम धन है (७) । इस गुप्त साधन में न्यासों का आधिक्य नहीं है, उपवास आदि संयम नहीं है। यह साधन सुख-साध्य और संक्षिप्त है। भक्तों को यह चतुर्वर्ग के फल का देनेवाला है, अतः यही श्रेष्ठ है (८) । हे देवेशि शिवे ! मैं पहले इस विषय में मन्त्रोद्धार का क्रम कहता हूँ, सुनो। मनुष्य लोग इसके सुनने मात्र से जीवन्मुक्त हो जाएँगे (६) । हे प्रिये ! 'तजस' अर्थात् रेफ में आरूढ़ 'प्राणेश' अर्थात् हकार में 'भेरूण्डा' अर्थात् 'ई' का योग कर उनमें 'व्योम-बिन्दु' अर्थात् अनुस्वार शोभित कर 'ह्रीं' बीज का उद्धार कर दूसरे बीज का उद्धार करे (१०)। 'सन्ध्या' अर्थात् 'श' 'रक्त' अर्थात् 'र' के ऊपर आरोहण करे, उनमें 'वाम नेत्र' अर्थात् 'ई' और 'इन्दु' अर्थात् अनुस्वार योग करने से दूसरा मन्त्र 'श्रीं' होगा। हे कल्याणि ! इसके बाद तीसरा मन्त्र सुनो प्रजापति (क), दीप (रेफ) के ऊपर रहे (११) । उनमें गोविन्द (ई) और बिन्दु (अनुस्वार) का संयोग करे। यह 'क्रीं' बीज साधकों को सुख देनेवाला है। इन तीन बीजों के बाद 'परमेश्वरि !' यह सम्बोधन-पद है (१२) । इस मन्त्र के शेष भाग में 'वह्नि-कान्ता' अर्थात् 'स्वाहा' यह पद है।
पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार । २१ हे शिवे ! यह दश अक्षर वाला (ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा) मन्त्र कहा गया। सर्व-विद्या-स्वरूपा, उक्त मन्त्रात्मिका देवी परमेश्वरी विद्या है (१३) । श्रेष्ठ साधक 'सर्वाभीष्ट-सिद्धि' के लिए आद्य तीन बीजों में से एक-एक बीज का अथवा तोनों बीजों का जप करते हैं (१४) । पहले तीन बीजों (ह्रीं श्रीं क्रीं) को छोड़ने से उक्त दशाक्षर मन्त्र 'परमेश्वरि स्वाहा'- सात अक्षर वाले इस मन्त्र में बदल जाता है। सप्ताक्षर मन्त्र के पहले काम-बीज (क्लीं), वाग्-बीज (ऐं) और तार (ॐ) के जोड़ने से तीन प्रकार के अष्टाक्षर मन्त्र बनते हैं। यथा— १ क्लीं परमेश्वरि स्वाहा, २ ऐं परमेश्वरि स्वाहा और ३ ॐ परमेश्वरि स्वाहा (१५) । पूर्वोक्त दशाक्षर-मन्त्र के सम्बोधन-पद के अन्त में 'कालिके' इस पद का उच्चारण करे । उसके बाद आदि के बीज-त्रय (ह्रीं श्रीं क्रीं, का उच्चारण कर वह्नि-वधू (स्वाहा) पद कहे (१६) । इस प्रकार 'ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके ह्रीं श्रीं क्रीं स्वाहा' यह सोलह वर्णों वाला मन्त्र 'षोडशी' नाम से प्रख्यात होकर सभी तन्त्रों में गुप्त है। उक्त 'षोडशी' मन्त्र के आदि में वधू (स्त्रीं) अथवा प्रणव (ॐ) का योग करने से दो सप्त-दशाक्षर मन्त्र होते हैं। यथा—१ स्त्रीं ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके ह्रीं श्रीं क्रीं स्वाहा, २ ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके ह्रीं श्रीं क्रीं स्वाहा (१७) । हे प्रिये ! तुम्हारे कोटि-कोटि अर्बुद मन्त्र हैं अतएव असंख्य मन्त्र हैं। यहाँ संक्षेप में बारह मन्त्र कहे हैं (१८) । जिस-जिस तन्त्र में जो-जो मन्त्र कहे हैं, वे सभी तुम्हारे मन्त्र हैं क्योंकि तुम्हीं आद्या प्रकृति हो (१६) । इन सभी मन्त्रों के साधन का प्रकार एक हो है, मैं जगत् के हित और तुम्हारी प्रसन्नता के लिए उस साधन को बताता हूँ (२०) । हे देवि ! कुलाचार के बिना शक्ति-मन्त्र सिद्धि-प्रद नहीं होता। अतएव कुलाचार में तत्पर होकर शाक्त-साधन करना चाहिए (२१) । हे आद्ये ! शक्ति-पूजा के विधान में मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन—ये पञ्च-तत्त्व कहे हैं (२२) । पञ्च-तत्त्व से रहित पूजा करने से वह अभिचार का कारण अर्थात् प्राण- घातक हो उठती है। उससे साधक को इष्ट-सिद्धि होती नहीं और पग-पग पर विघ्न होता है (२३) । पत्थर के ऊपर अन्न बोने से जिस प्रकार अंकुर नहीं निकलता, उसी प्रकार पञ्च-तत्त्व-विहीन पूजा से फल नहीं मिलता (२४) । हे देवि ! प्रातः-कृत्य न करने से कर्म में अधिकार नहीं होता, अतः सबसे पहले यथोचित प्रातः- कृत्य बताता हूँ (२५) । रात्रि के अन्तिम प्रहर के शेषार्द्ध को 'अरुणोदय' काल कहते हैं। उसी समय निद्रा छोड़कर साधक उठ जाय और अपने मस्तक में श्वेत कमल में बैठे हुए दो हाथ वाले, द्वि-नेत्र गुरुदेव का ध्यान करे (२६,— ध्याये शिरसि शुक्लाब्जे द्वि-नेत्रं द्वि-भुजं गुरुं । श्वेताम्बर परीधानं श्वेत-माल्यानुलेपनम् ।। वराभय-करं शान्तं करुणामय-विग्रहं । वामेनोत्पल-धारिण्या शक्त्यालिङ्गित-विग्रहम् ।। श्वेताननं सुप्रसन्नं साधकाभीष्ट-दायकम् ।। वे श्वेत वस्त्र पहने हैं, श्वेत माला से युक्त हैं, श्वेत चन्दन लगाए हैं और एक हाथ से वर तथा एक हाथ से अभय दे रहे हैं। वे शान्त और करुणामय शरीरवाले हैं अर्थात् उनके शरीर को देखने से ही प्रतीत होता है कि वे दयालु हैं (२७) । उनके बाईं ओर उनकी शक्ति कमल लिए हैं और उनके शरीर का आलिङ्गन किए हैं (२८) । उनका मुख कुछ हँसो से युक्त है, वे अति प्रसन्न हैं और साधु जनों को अभीष्ट वर प्रदान करते
२२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र हैं। हे कुलेश्वर ! मन्त्र-साधक व्यक्ति इस प्रकार ध्यान कर, मानसिक उपचारों से उनकी पूजाकर गुरु-मन्त्र श्रेष्ठ वाग्भव-बीज (ऐं) का जप करे (२६)। सुबुद्धि व्यक्ति इस प्रकार यथा-शक्ति जप कर गुरुदेव के दाएँ हाथ में अपने जप को समर्पित कर निम्न मन्त्र का पाठ करते हुए उन्हें प्रणाम करे (३०)— भव-पाश-विनाशाय ज्ञान-दृष्टि-प्रदर्शिने। नमः सद्-गुरवे तुभ्यं भुक्ति-मुक्ति-प्रदायिने। नराकृति-परब्रह्म-रूपायाज्ञान-हारिणे। कुल-धर्म-प्रकाशाय तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ अर्थात् संसार के बन्धन को नष्ट करने के लिए आपने ज्ञान-दृष्टि को खोल दिया है और आप भोग एवं मोक्ष को प्रदान करते हैं। अतएव आप सद्-गुरु हैं। आपको नमस्कार (३१)। जो मनुष्य-रूप होकर भी परम ब्रह्म-स्वरूप हैं, जो अज्ञान को विनष्ट करनेवाले हैं और कुल-धर्म के प्रकाश करनेवाले हैं, उन श्रीगुरुदेव को नमस्कार (३२)। इस प्रकार गुरुदेव को प्रणाम कर अपने देवता का ध्यान करे। फिर पूर्ववत् अर्थात् मानस उपचारों से अपने देवता की पूजा कर मूल-मन्त्र का जप करे (३३)। यथा-शक्ति जपकर देवी के बाएँ हाथ में जप को समर्पित करे और निम्न मन्त्र से ज्ञानी व्यक्ति इष्ट-देवता को नमस्कार करे— नमः सर्व-स्वरूपिण्यै जगद्धात्र्यै नमो नमः । आद्यायै कालिकायै ते कत्र्र्यै हत्र्र्यै नमो नमः ॥ अर्थात् तुम सर्व-स्वरूपिणी हो, तुम्हें नमस्कार । तुम जगद्धात्री हो, तुम्हें बार-बार नमस्कार। तुम जगत् की सृष्टि और संहार करनेवाली हो, हे आद्या कालिके ! तुम्हें बार-बार नमस्कार (३४-३५)। इस प्रकार इष्ट-देवता को प्रणाम कर पहले बायाँ पैर रखकर बाहर निकले। फिर मल-मूत्र त्याग कर दन्त-धावन करे (३६)। फिर जलाशय के पास जाकर पहले आचमन करे। तब जल में प्रवेश करे (३७)। नाभि तक गहरे जल में खड़े होकर शरीर के मैल को दूर करने के लिए एक बार स्नान कर—डुबकी लगाकर मन्त्राचमन करे (३८)। साधक-श्रेष्ठ कुल-साधक निम्न मन्त्रों से तीन बार जल पिये— १ आत्म-तत्वाय स्वाहा, २ विद्या-तत्वाय स्वाहा, ३ शिव-तत्वाय स्वाहा। फिर ओष्ठाधर के मार्जन के लिए दो बार आचमन करे (३६)। सुधी व्यक्ति जल में त्रिकोण कुल-यन्त्र को लिखकर उसके मध्य में मूल-मन्त्र को लिखे। हे प्रिये ! उसके ऊपर बारह बार मूल-मन्त्र का जप करे (४०)। फिर साधक उस मन्त्र-पूत जल को तेजो रूप भावना कर सूर्यदेव के लिए तीन अञ्जलि जल देकर, उसी जल से तीन बार अपने मस्तक को अभिषिक्त कर मुख, दोनों नासिकाओं, दोनों कानों और दोनों आँखों इन सात छिद्रों को अपनी अँगुलियों से बन्द करे (४१)। तदनन्तर देवता की प्रसन्नता के लिए जल में तीन बार डुबकी लगाकर बाहर निकले और शरीर पोंछकर दो शुद्ध वस्त्र अर्थात् उत्तरीय और परिधेय वस्त्र पहने (४२)। इसके बाद गायत्री से शिखा-बन्धन कर मिट्टी या भस्म द्वारा अपने ललाट में विन्दु-युक्त त्रिपुण्ड्र-तिलक धारण करे (४३)। फिर साधक क्रमशः वैदिकी और तान्त्रिकी सन्ध्या करे। तान्त्रिकी सन्ध्या बताता हूँ, सुनो (४४)। हे शिवे ! जल द्वारा पूर्ववत् मन्त्रों से आचमन कर निम्न मन्त्र से तीर्थों का आवाहन करे (४५)— ॐ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ! नर्मंदे सिन्धु कावेरि ! जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥ अर्थात् हे गंगे ! हे यमुने ! हे गोदावरि ! हे सरस्वति ! हे नर्मदे ! हे सिन्धु ! हे कावेरि ! तुम इस जल में सन्निहित हो जाओ (४६)।
पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार | २३ बुद्धिमान व्यक्ति इस मन्त्र का पाठ करता हुआ अंकुश मुद्रा द्वारा जल में तोर्थों का आवाहन करे और आवाहित तीर्थ-जल के ऊपर बारह बार मूल-मन्त्र का जप करे (४७) । फिर मूल-मन्त्र का उच्चारण करते हुए उसी जल से मध्यमा-अनामा अँगुंलियों से भूमि पर तीन बार जल-विन्दु छिड़के (४८) । इसी प्रकार जल-विन्दुओं से अपना मस्तक अभिषिक्त करे । फिर कुछ जल बाईं हथेली में लेकर, दाएँ हाथ से उसे ढँक ले (४६) । बाएँ हाथ के उस जल के ऊपर ईशान-बीज (हं), वायु-बीज (यं), वरुण-बीज (वं), वह्नि-बीज (रं), इन्द्र-बीज (लं)— इन पाँच बीजों को चार बार जप कर उस जल को दाईं हथेली में ले ले (५०)। फिर साधक उस जल का दर्शन कर उसे तेजोमय भावना करता हुआ इड़ा (बाईं नासिका) द्वारा उसे आकृष्ट कर उस जल के साथ शारीरिक और मानसिक पापों को पिंगला नामक नाड़ी (दाईं नासिका) से निकाल दे (५१) । इस प्रकार साधक पापों को निकालकर ‘फट्’ मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उस जल को अपने सामने कल्पित वज्र-शिला के ऊपर तीन बार ताड़ित कर दोनों हाथ धो डाले (५२) । तब आचमन कर निम्न मन्त्र द्वारा सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे— ॐ ह्रीं घृणि सूर्य ! इदमर्घ्यं तुभ्यं स्वाहा तार (ॐ), माया (ह्रीं), इनके बाद ‘घृणि सूर्य’, फिर ‘इदमर्घ्यं तुभ्य स्वाहा’ पद का उच्चारण करते हुए अर्घ्य प्रदान करे (५३-५४) । तदनन्तर प्रातःकाल, मध्याह्न-काल एवं सन्ध्या-काल में गुण-तारतम्य के अनुसार त्रि-रूपिणी परमदेवता महा-देवी गायत्री का ध्यान करे (५५) । यथा— प्रातर्ब्राह्मीं रक्त-वर्णां द्वि-भुजां च कुमारिकाम् । कमण्डलुं तोर्थ-पूर्णमच्छ-मालां च विभ्रतीम् ॥ कृष्णाजिनाम्बर-धरां हंसारूढां शुचि-स्मिताम् ॥१ मध्याह्ने तां श्याम-वर्णां वैष्णवों च .चतुर्भुजाम् । शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-धारिणीं गरुडासनाम् ॥ पीनोत्तुङ्ग-कुच-द्वन्द्वां वन-माला-विभूषिताम् । युवतीं सततं ध्यायेन्मध्ये मार्तण्ड-मण्डले ॥२ सायाह्ने वरदां देवी गायत्रीं संस्मरेद् यतिः । शुक्लां शुक्लाम्बर-धरां वृषासन-कृताश्रयाम् ॥ त्रि-नेत्रां वरदां पाशं शूलं च नृ-करोटिकाम् । विभ्रतीं कर-पद्मैश्च वृद्धां गलित-यौवनाम् ॥३ अर्थात् प्रातःकाल रक्त-वर्णा, द्विभुजा, कुमारी, तीर्थोदक-पूर्ण कमण्डलु एवं निर्मल माल्य-धारिणी, कृष्णाजिन-परिधाना, हंसारूढ़ा एवं विशुद्ध स्मित-शोभिता ब्राह्मी—ब्रह्म-शक्ति का ध्यान करे (५६) । मध्याह्न-काल में श्याम-वर्णा, चतुर्भुजा, शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-धारिणी, गरुडासना, युवती, पीन व उच्च- स्तनी, वन-माला-विभूषिता वैष्णवी शक्ति को निरन्तर रवि-मण्डल में ध्यान करे (५७-५८) । सायं-काल में जितेन्द्रिय व्यक्ति शुक्ल-वर्णा, शुक्ल-वस्त्र-परिधाना, वृषासन पर बैठी हुई, त्रिनेत्रा, चार कर-कमलों में वर-पाश-शूल और नर-कपाल-धारिणी, वृद्धा एवं विगत-यौवना वरदा गायत्री देवी का स्मरण करे (५६-६०) । इस प्रकार ध्यान कर महा-देवी को तीन अञ्जलि जल देकर सौ बार या दस बार गायत्री-मन्त्र का जप करे (६१) । हे देवेशि ! मैं तुम्हारे लिए गायत्री मन्त्र बताता हूँ, सुनो। पहले ‘आद्यायै’ पद का उच्चारण कर फिर ‘विद्महे’ इस पद का उच्चारण करे (६२) । फिर ‘परमेश्वर्यै धीमहि तन्नः काली प्रचोदयात्’ यह कहे । अर्थात् पूरा गायत्री-मन्त्र है—आद्यायै विद्महे परमेश्वर्यै धीमहि तन्नः काली प्रचोदयात् । इस मन्त्र का अर्थ है कि हम आद्या परमेश्वरी को प्राप्त करने के लिए जिनका ध्यान करते हैं और जिनमें
२४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र पूर्ण रूप से विश्वास रखते हैं, वे ही जगत्-कारण-स्वरूपा काली हम लोगों को धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष में तत्पर करें । महा-पाप की ध्वंस-कारिणी यह गायत्री मैने तुम्हें बताई है (६३) । हे भद्रे ! जो तीनों सन्ध्याओं में इसका जप करते हैं, उन्हें नित्य त्रि-सन्ध्या करने का फल मिलता है । इसके बाद देव, ऋषि, पितृ-गण एवं इष्ट-देवता का तर्पण करे (६४) । पहले प्रणव का उच्चारण कर, द्वितीयान्त उन-उनके नाम का उच्चारण करते हुए अन्त में 'तर्पयामि नमः' इस पद का उच्चारण करे । शक्ति- विषय में अर्थात् इष्ट-देवता के तर्पण में प्रणव के स्थान पर माया-बीज (ह्रीं) और 'नमः' के स्थान पर 'द्विठ' अर्थात् 'स्वाहा' का योग करे (६५) । मूल-मन्त्र (स्त्रीं ह्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा) के बाद 'सर्व-भूत', यह पद, उसके बाद 'निवासिन्यै' यह पद कहे । फिर 'स्व-स्वरूपायै' यह पद कहकर 'सायुधायै' यह पद पढ़े (६६) । तदनन्तर 'सावरणायै परात्परायै आद्यायै कालिकायै' इस पद का उच्चारण कर 'इदमर्घ्यं स्वाहा' यह कहे । सुधी व्यक्ति इसी मन्त्र द्वारा महा- देवी को अर्घ्य दे और तब यथा-शक्ति मूल-मन्त्र का जप कर देवी के बाएँ हाथ में जप का समर्पण करे (६७) । फिर साधक देवी की प्रणाम-पूजा के लिए जल ग्रहण एवं तीर्थ को नमस्कार कर स्तव-पाठ करते-करते और इष्ट-देवता के ध्यान में तत्पर होकर याग-मण्डप में आकर हाथ-पैर का शोधन करे । तदनन्तर द्वार-देश के सामने सामान्यार्घ्य का स्थापन करे (६८-७०) । यथा— ज्ञानवान् व्यक्ति एक त्रिकोण, उसके बाहर एक गोलाकार-मण्डल, उसके बाहर एक चतुष्कोण मण्डल बना कर उसमें 'ॐ आधार-शक्तये नमः' इस मन्त्र से गन्ध-पुष्प द्वारा आधार-शक्ति की पूजा कर उस पर आधार स्थापित करे (७१) । फिर 'फट्' मन्त्र से पात्र को धोकर उक्त आधार पर रखे और 'नमः' मन्त्र से उसे जल से पूर्ण करे । तब उसमें गन्ध-पुष्प छोड़कर सब तीर्थों का उसमें आवाहन करे (७२) । आधार पर अग्नि का, पात्र में सूर्य-मण्डल का और जल में चन्द्र-मण्डल की पूजा कर दस बार माया-बीज (ह्रीं) के जप द्वारा उस जल को पवित्र करे (७३) । तब उसके ऊपर धेनु-मुद्रा और योनि-मुद्रा दिखाए । इसे ही 'सामान्यार्घ्य' कहते हैं । फिर उक्त-जल और पुष्प द्वारा द्वार-देवताओं की पूजा करे (७४) । इन द्वार-देवताओं में गणेश, क्षेत्रपाल, वटुक, योगिनी, गङ्गा, यमुना, लक्ष्मी और सरस्वती का पूजन क्रमशः निम्न मन्त्रों से करे (७५)— गं गणेशाय नमः । क्षं क्षेत्रपालाय नमः । वं वटुकाय नमः । यां योगिन्यै नमः । गां गङ्गायै नमः । यां यमुनायै नमः । श्रीं लक्ष्म्यै नमः । ऐं सरस्वत्यै नमः । इसके बाद ज्ञानी व्यक्ति द्वारस्थ चतुष्काष्ठ (चौखट) के बाईं ओर के काष्ठ को कुछ छूते हुए, बायाँ पैर आगे बढ़ाकर, भगवती के चरण-कमलों को स्मरण करते हुए पूजा-गृह में प्रवेश करे (७६) । फिर पूजा-गृह के मध्य में नैऋत्य-कोण में निम्न मन्त्रों से गन्ध-पुष्प द्वारा वास्तु-पुरुष, ईश और ब्रह्मा का अर्चन करे— ॐ वास्तु-पुरुषाय नमः । ॐ ईशाय नमः । ॐ ब्रह्मणे नमः । तदनन्तर सामान्यार्घ्य जल से याग-मन्दिर को प्रोक्षित करे (७७) । फिर साधक-श्रेष्ठ एकटक दृष्टि से ऊपर की ओर देखकर सभी दिव्य विघ्नों को दूर करने की भावना करे और 'फट्' मन्त्र से जल फेंककर आकाश- सम्बन्धी सभी विघ्न दूर करे (७८) । तब तीन बार पैर के तलवे के किनारे से पृथ्वी पर आघात कर भूमि- सम्बन्धी विघ्नों के दूर करने की भावना करे । पूजा-गृह को चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कपूर द्वारा सुगन्धित करे । अपने बैठने के लिए त्रिकोण-गर्भ चतुष्कोण-मण्डल बनाकर उसमें 'कामरूपाय नमः' मन्त्र से काम-रूप की पूजा करे (७९-८०) । उसी मण्डल के ऊपर आसन बिछाकर काम-बीज (क्लीं) का उच्चारण कर 'आधार-
पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार । २५ शक्तये कमलासनाय नमः' इस मन्त्र से आसन की पूजा करे (८१)। धर्मज्ञ साधक पूर्व या उत्तर-मुख होकर वीरासन से उस पूजित आसन पर बैठकर विजया का शोधन करे (८२)। यथा— तार (ॐ) और माया-बीज (ह्रीं) का उच्चारण कर 'अमृते अमृतोद्भवे अमृत-वर्षिणि अमृतमाकर्षया- कर्षय सिद्धिं देहि कालिकां मे वशमानय स्वाहा ।'—यही सम्बिदा के शोधन का मन्त्र है (८३-८४)। फिर उस विजया के ऊपर सात बार मूल-मन्त्र का जप कर आवाहनी, स्थापनी, सन्निधापनी, सन्निरोधिनी, सम्मुखी- करणी, धेनु और योनि-मुद्रायें दिखाये। जिस प्रकार संकेत-मुद्रा अर्थात् गुरुपदिष्ट तत्त्व-मुद्रा द्वारा सहस्रार-पद्म में विजया द्वारा तीन बार गुरु का तर्पण करे, उसी प्रकार मूल-मन्त्र का उच्चारण कर हृदय में तीन बार देवी का तर्पण करे (८५-८६)। फिर वाग्भव (ऐं) के बाद 'वद वद', उसके बाद 'वाग्वादिनि' यह पद, तब 'मम जिह्वाग्रे स्थिरीभव सर्व-सत्त्व-वशङ्करि स्वाहा'—इस मन्त्र का पाठ कर कुण्डली के मुख में विजया द्वारा आहुति दे (८७)। उक्त प्रकार विजया ग्रहण कर बाएँ कान के ऊपर श्री गुरु को, दाएँ कान के ऊपर गणेश को और मध्य स्थान में सनातनी आद्या काली को प्रणाम करे (८८)। बुद्धिमान् साधक हाथ जोड़कर देवी का ध्यान कर सारे पूजा-द्रव्य को दाईं ओर और सुवासित जल तथा जो कुल-द्रव्य हों, उन सबको बाईं ओर रखे (८६)। मूल-मन्त्र के अन्त में 'फट्' को जोड़कर उसे पढ़ते हुए सामान्यार्घ्य के कुछ जल द्वारा सारी पूजा-सामग्री को प्रोक्षित कर उसे जल-धारा देकर वेष्ठित करे। फिर वह्नि-बीज (रं) द्वारा अग्नि-प्राचीर की भावना करे (६०)। तब कर- शुद्धि करने के लिए दोनों हाथों में चन्दन-युक्त पुष्प लेकर 'फट्' मन्त्र को पढ़ते हुए सचन्दन पुष्पों को घर्षित कर फेंक दे (६१)। हे शिवे ! परस्पर मिली हुई तर्जनी और मध्यमा अंगुलियों से हथेली पर क्रमशः तीन बार ऊपर और ऊपर को ओर ताली बजाकर 'फट्' मन्त्र का पाठ करते हुए छोटिका (चुटकी-ध्वनि) द्वारा दश-दिग्बन्धन करे। तदनन्तर भूत-शुद्धि करे (६२)। यथा— साधक-श्रेष्ठ अपनी गोद में दोनों हथेलियों को उत्तान (चित्त) रखे। फिर मन को प्रथम चक्र मूलाधार में सन्निवेशित कर हुङ्कार द्वारा कुण्डली को उठाए और फिर 'हंस' मन्त्र को पढ़ते हुए पृथिवी के सहित उसे नाभि-मूल में स्थित द्वितीय चक्र स्वाधिष्ठान में लाकर पृथिवी आदि सभी कार्य-तत्त्वों को क्रमशः जलादि कारण- तत्त्व में प्रविष्ट करे (६३-६४)। घ्राणेन्द्रिय, गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द-सहित पृथिवी को जल में लय करे। रसनेन्द्रिय व रसादि गुण-चतुष्टय-सहित जल को अग्नि (तेज) में विलीन करे (६५)। रूपादि गुण-त्रय और चक्षु के सहित अग्नि (तेज) को वायु में विलीन कर स्पर्श, शब्द, त्वक् इन्द्रिय सहित वायु को आकाश में लय करे (६६)। शब्द अर्थात् शब्द और श्रोतृ के सहित आकाश को अहंकार में तथा अहंकार को बुद्धि-तत्त्व में विलीन करे। बुद्धि-तत्त्व को प्रकृति में और उस सर्व-ग्रासिनी प्रकृति को ब्रह्म में लय करे (६७)। सुबुद्धि व्यक्ति इस प्रकार सभी तत्त्वों को विलीन कर बाईं कोख में कृष्ण-वर्ण, ताम्र-लोहित, शुभ्र, आरक्त-नयन, खड्ग-चर्म-धारी, क्रोधाविष्ट, अंगुष्ठ-मात्र परिमित, सदा अधोमुख रहनेवाले, सर्व-पाप-स्वरूप पुरुष का ध्यान करे (६८-६६)। यथा— पुरुषं कृष्ण-वर्णं च रक्त-श्मश्रु-विलोचनम् । खड्ग-चर्म-धरं क्रुद्धमंगुष्ठ-परिमाणकम् । सर्व-पाप-स्वरूपं च सर्वदाधोमुख-स्थितम् ॥ इसके बाद बाईं नासिका में धूम्र-वर्ण 'यं' बीज का ध्यान कर १६ बार इसका जप करते हुए उसी बाईं नासिका से वायु खींचे। तब उत्तम साधक उस खींची हुई वायु द्वारा पाप-पुरुष की देह को सुखा डाले (१००)। फा०—४
२६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र नाभि में रक्त-वर्ण 'रं' बीज का ध्यान करते हुए कुम्भक (सांस रोक) कर ६४ बार इस बीज का जप करते हुए उससे उत्पन्न अग्नि द्वारा पाप-परायण अपनी देह को जला डाले (१०१)। ललाट में शुक्ल-वर्ण वारुण बीज 'वं' का ध्यान कर खींची हुई और फिर कुम्भित निःश्वास वायु को छोड़ते हुए इस बीज का ३२ बार जप करते हुए इससे उत्पन्न अमृत-जल द्वारा जले हुए शरीर को प्लावित कर दे (१०२)। इस प्रकार पैर से मस्तक तक पूर्ण रूप से करने के बाद देव-मय नवीन शरीर उत्पन्न हुआ है, ऐसी भावना करे (१०३)। फिर मूलाधार चक्र में पीत-वर्ण पृथिवी-बीज 'लं' का ध्यान करते हुए इस बीज के उच्चारण और एकटक दर्शन से शीघ्र उत्पन्न अपने शरीर को दृढ़ करे (१०४)। अपने वक्ष (छाती) पर हाथ रखकर 'आं ह्रीं क्रों हंसः' का उच्चारण कर 'सोहं' कहे और इस मन्त्र द्वारा उस नव-जात देव-मय देह में देवी की प्राण-प्रतिष्ठा करे (१०५)। हे अम्बिके ! इस प्रकार भूत-शुद्धि का विधान कर 'मैं देवी-स्वरूप हूँ' यह सोचते हुए एकाग्र-चित्त से मातृका-न्यास करे (१०६)। यथा — विनियोग—अस्य मातृका-न्यासस्य ब्रह्मा ऋषिः । गायत्री छन्दः । मातृका सरस्वती देवी देवता । व्यञ्जनाः। बीजाः । स्वराः शक्तयः । सर्गः कीलकं । लिपि-न्यासे विनियोगः । अर्थात् इस मातृका-न्यास के ब्रह्मा ऋषि, गायत्री छन्द, मातृका सरस्वती देवी देवता, व्यञ्जन-वर्ण बीज, स्वर-वर्ण शक्तियाँ, विसर्ग कीलक और लिपि के न्यास में विनियोग है। इसी रूप में ऋषि-न्यास कर कर-न्यास और हृदयादि अङ्ग-न्यास करे (१०७-१०८) । (१) 'अं आं' इन दो वर्णों के मध्य में कवर्ग (ककारादि पञ्च-वर्णं) अर्थात् 'अं' के बाद 'कं खं गं घं ङं' फिर 'आं' (इसी प्रकार अन्यत्र भी समझे) ; (२) 'इं ईं' इन दो वर्णों के मध्य में चकारादि पञ्च-वर्णं ; (३) 'उं ऊं' इन दो वर्णों के मध्य में टकारादि पञ्च-वर्णं ; (४) 'एं ऐं' इनके मध्य में तकारादि पञ्च-वर्ण ; (५) 'ओं औं' इन दो वर्णों के मध्य में पकारादि पञ्च-वर्ण ; (६) अनुस्वार 'अं' और विसर्ग 'अः' इनके मध्य में 'य' से 'क्ष' तक के वर्ण—ये कर-न्यास और अङ्ग- न्यास में मन्त्र-रूप बताए गए हैं (१०६-११०) । न्यास-विधि के अनुसार (अर्थात् पूर्वोक्त एक-एक श्रेणी मन्त्र का उच्चारण कर उसके बाद यथा-क्रम) '१ अंगुष्ठाभ्यां नमः, २ तर्जनीभ्यां स्वाहा, ३ मध्यमाभ्यां वषट्, ४ अनामिकाभ्यां हुं, ५ कनिष्ठाभ्यां वौषट्, ६ करतल-करपृष्ठाभ्यां अस्त्राय फट्' का उच्चारण करे—यह कर- न्यास की विधि है और इसी प्रकार उक्त मन्त्रों का क्रमशः उच्चारण करते हुए यथा-क्रम '१ हृदयाय नमः, २ शिरसे स्वाहा, ३ शिखायै वषट्, ४ कवचाय हुं, ५ नेत्र-त्रयाय वौषट्, ६ करतल-करपृष्ठाभ्यां अस्त्राय फट्' का उच्चारण करना अङ्ग-न्यास की विधि है। इस प्रकार न्यास कर मातृका-सरस्वती का ध्यान करे (१११)— पञ्चाशल्लिपिभिर्विभक्त-मुख-दोः-पन्मध्य-वक्षःस्थलाम् भास्वन्मौलि-निबद्ध-चन्द्र-शकलामापीन-तुङ्ग-स्तनोम् । मुद्रामक्ष-गुणं सुधाढ्य-कलशं विद्यां च हस्ताम्बुजै- र्बिभ्राणां विशद-प्रभां त्रिनयनां वाग्-देवतामाश्रये ॥