भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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२२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र हैं। हे कुलेश्वर ! मन्त्र-साधक व्यक्ति इस प्रकार ध्यान कर, मानसिक उपचारों से उनकी पूजाकर गुरु-मन्त्र श्रेष्ठ वाग्भव-बीज (ऐं) का जप करे (२६)। सुबुद्धि व्यक्ति इस प्रकार यथा-शक्ति जप कर गुरुदेव के दाएँ हाथ में अपने जप को समर्पित कर निम्न मन्त्र का पाठ करते हुए उन्हें प्रणाम करे (३०)— भव-पाश-विनाशाय ज्ञान-दृष्टि-प्रदर्शिने। नमः सद्-गुरवे तुभ्यं भुक्ति-मुक्ति-प्रदायिने। नराकृति-परब्रह्म-रूपायाज्ञान-हारिणे। कुल-धर्म-प्रकाशाय तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ अर्थात् संसार के बन्धन को नष्ट करने के लिए आपने ज्ञान-दृष्टि को खोल दिया है और आप भोग एवं मोक्ष को प्रदान करते हैं। अतएव आप सद्-गुरु हैं। आपको नमस्कार (३१)। जो मनुष्य-रूप होकर भी परम ब्रह्म-स्वरूप हैं, जो अज्ञान को विनष्ट करनेवाले हैं और कुल-धर्म के प्रकाश करनेवाले हैं, उन श्रीगुरुदेव को नमस्कार (३२)। इस प्रकार गुरुदेव को प्रणाम कर अपने देवता का ध्यान करे। फिर पूर्ववत् अर्थात् मानस उपचारों से अपने देवता की पूजा कर मूल-मन्त्र का जप करे (३३)। यथा-शक्ति जपकर देवी के बाएँ हाथ में जप को समर्पित करे और निम्न मन्त्र से ज्ञानी व्यक्ति इष्ट-देवता को नमस्कार करे— नमः सर्व-स्वरूपिण्यै जगद्धात्र्यै नमो नमः । आद्यायै कालिकायै ते कत्र्र्यै हत्र्र्यै नमो नमः ॥ अर्थात् तुम सर्व-स्वरूपिणी हो, तुम्हें नमस्कार । तुम जगद्धात्री हो, तुम्हें बार-बार नमस्कार। तुम जगत् की सृष्टि और संहार करनेवाली हो, हे आद्या कालिके ! तुम्हें बार-बार नमस्कार (३४-३५)। इस प्रकार इष्ट-देवता को प्रणाम कर पहले बायाँ पैर रखकर बाहर निकले। फिर मल-मूत्र त्याग कर दन्त-धावन करे (३६)। फिर जलाशय के पास जाकर पहले आचमन करे। तब जल में प्रवेश करे (३७)। नाभि तक गहरे जल में खड़े होकर शरीर के मैल को दूर करने के लिए एक बार स्नान कर—डुबकी लगाकर मन्त्राचमन करे (३८)। साधक-श्रेष्ठ कुल-साधक निम्न मन्त्रों से तीन बार जल पिये— १ आत्म-तत्वाय स्वाहा, २ विद्या-तत्वाय स्वाहा, ३ शिव-तत्वाय स्वाहा। फिर ओष्ठाधर के मार्जन के लिए दो बार आचमन करे (३६)। सुधी व्यक्ति जल में त्रिकोण कुल-यन्त्र को लिखकर उसके मध्य में मूल-मन्त्र को लिखे। हे प्रिये ! उसके ऊपर बारह बार मूल-मन्त्र का जप करे (४०)। फिर साधक उस मन्त्र-पूत जल को तेजो रूप भावना कर सूर्यदेव के लिए तीन अञ्जलि जल देकर, उसी जल से तीन बार अपने मस्तक को अभिषिक्त कर मुख, दोनों नासिकाओं, दोनों कानों और दोनों आँखों इन सात छिद्रों को अपनी अँगुलियों से बन्द करे (४१)। तदनन्तर देवता की प्रसन्नता के लिए जल में तीन बार डुबकी लगाकर बाहर निकले और शरीर पोंछकर दो शुद्ध वस्त्र अर्थात् उत्तरीय और परिधेय वस्त्र पहने (४२)। इसके बाद गायत्री से शिखा-बन्धन कर मिट्टी या भस्म द्वारा अपने ललाट में विन्दु-युक्त त्रिपुण्ड्र-तिलक धारण करे (४३)। फिर साधक क्रमशः वैदिकी और तान्त्रिकी सन्ध्या करे। तान्त्रिकी सन्ध्या बताता हूँ, सुनो (४४)। हे शिवे ! जल द्वारा पूर्ववत् मन्त्रों से आचमन कर निम्न मन्त्र से तीर्थों का आवाहन करे (४५)— ॐ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ! नर्मंदे सिन्धु कावेरि ! जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥ अर्थात् हे गंगे ! हे यमुने ! हे गोदावरि ! हे सरस्वति ! हे नर्मदे ! हे सिन्धु ! हे कावेरि ! तुम इस जल में सन्निहित हो जाओ (४६)।