भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार | २३ बुद्धिमान व्यक्ति इस मन्त्र का पाठ करता हुआ अंकुश मुद्रा द्वारा जल में तोर्थों का आवाहन करे और आवाहित तीर्थ-जल के ऊपर बारह बार मूल-मन्त्र का जप करे (४७) । फिर मूल-मन्त्र का उच्चारण करते हुए उसी जल से मध्यमा-अनामा अँगुंलियों से भूमि पर तीन बार जल-विन्दु छिड़के (४८) । इसी प्रकार जल-विन्दुओं से अपना मस्तक अभिषिक्त करे । फिर कुछ जल बाईं हथेली में लेकर, दाएँ हाथ से उसे ढँक ले (४६) । बाएँ हाथ के उस जल के ऊपर ईशान-बीज (हं), वायु-बीज (यं), वरुण-बीज (वं), वह्नि-बीज (रं), इन्द्र-बीज (लं)— इन पाँच बीजों को चार बार जप कर उस जल को दाईं हथेली में ले ले (५०)। फिर साधक उस जल का दर्शन कर उसे तेजोमय भावना करता हुआ इड़ा (बाईं नासिका) द्वारा उसे आकृष्ट कर उस जल के साथ शारीरिक और मानसिक पापों को पिंगला नामक नाड़ी (दाईं नासिका) से निकाल दे (५१) । इस प्रकार साधक पापों को निकालकर ‘फट्’ मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उस जल को अपने सामने कल्पित वज्र-शिला के ऊपर तीन बार ताड़ित कर दोनों हाथ धो डाले (५२) । तब आचमन कर निम्न मन्त्र द्वारा सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे— ॐ ह्रीं घृणि सूर्य ! इदमर्घ्यं तुभ्यं स्वाहा तार (ॐ), माया (ह्रीं), इनके बाद ‘घृणि सूर्य’, फिर ‘इदमर्घ्यं तुभ्य स्वाहा’ पद का उच्चारण करते हुए अर्घ्य प्रदान करे (५३-५४) । तदनन्तर प्रातःकाल, मध्याह्न-काल एवं सन्ध्या-काल में गुण-तारतम्य के अनुसार त्रि-रूपिणी परमदेवता महा-देवी गायत्री का ध्यान करे (५५) । यथा— प्रातर्ब्राह्मीं रक्त-वर्णां द्वि-भुजां च कुमारिकाम् । कमण्डलुं तोर्थ-पूर्णमच्छ-मालां च विभ्रतीम् ॥ कृष्णाजिनाम्बर-धरां हंसारूढां शुचि-स्मिताम् ॥१ मध्याह्ने तां श्याम-वर्णां वैष्णवों च .चतुर्भुजाम् । शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-धारिणीं गरुडासनाम् ॥ पीनोत्तुङ्ग-कुच-द्वन्द्वां वन-माला-विभूषिताम् । युवतीं सततं ध्यायेन्मध्ये मार्तण्ड-मण्डले ॥२ सायाह्ने वरदां देवी गायत्रीं संस्मरेद् यतिः । शुक्लां शुक्लाम्बर-धरां वृषासन-कृताश्रयाम् ॥ त्रि-नेत्रां वरदां पाशं शूलं च नृ-करोटिकाम् । विभ्रतीं कर-पद्मैश्च वृद्धां गलित-यौवनाम् ॥३ अर्थात् प्रातःकाल रक्त-वर्णा, द्विभुजा, कुमारी, तीर्थोदक-पूर्ण कमण्डलु एवं निर्मल माल्य-धारिणी, कृष्णाजिन-परिधाना, हंसारूढ़ा एवं विशुद्ध स्मित-शोभिता ब्राह्मी—ब्रह्म-शक्ति का ध्यान करे (५६) । मध्याह्न-काल में श्याम-वर्णा, चतुर्भुजा, शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-धारिणी, गरुडासना, युवती, पीन व उच्च- स्तनी, वन-माला-विभूषिता वैष्णवी शक्ति को निरन्तर रवि-मण्डल में ध्यान करे (५७-५८) । सायं-काल में जितेन्द्रिय व्यक्ति शुक्ल-वर्णा, शुक्ल-वस्त्र-परिधाना, वृषासन पर बैठी हुई, त्रिनेत्रा, चार कर-कमलों में वर-पाश-शूल और नर-कपाल-धारिणी, वृद्धा एवं विगत-यौवना वरदा गायत्री देवी का स्मरण करे (५६-६०) । इस प्रकार ध्यान कर महा-देवी को तीन अञ्जलि जल देकर सौ बार या दस बार गायत्री-मन्त्र का जप करे (६१) । हे देवेशि ! मैं तुम्हारे लिए गायत्री मन्त्र बताता हूँ, सुनो। पहले ‘आद्यायै’ पद का उच्चारण कर फिर ‘विद्महे’ इस पद का उच्चारण करे (६२) । फिर ‘परमेश्वर्यै धीमहि तन्नः काली प्रचोदयात्’ यह कहे । अर्थात् पूरा गायत्री-मन्त्र है—आद्यायै विद्महे परमेश्वर्यै धीमहि तन्नः काली प्रचोदयात् । इस मन्त्र का अर्थ है कि हम आद्या परमेश्वरी को प्राप्त करने के लिए जिनका ध्यान करते हैं और जिनमें