महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र पूर्ण रूप से विश्वास रखते हैं, वे ही जगत्-कारण-स्वरूपा काली हम लोगों को धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष में तत्पर करें । महा-पाप की ध्वंस-कारिणी यह गायत्री मैने तुम्हें बताई है (६३) । हे भद्रे ! जो तीनों सन्ध्याओं में इसका जप करते हैं, उन्हें नित्य त्रि-सन्ध्या करने का फल मिलता है । इसके बाद देव, ऋषि, पितृ-गण एवं इष्ट-देवता का तर्पण करे (६४) । पहले प्रणव का उच्चारण कर, द्वितीयान्त उन-उनके नाम का उच्चारण करते हुए अन्त में 'तर्पयामि नमः' इस पद का उच्चारण करे । शक्ति- विषय में अर्थात् इष्ट-देवता के तर्पण में प्रणव के स्थान पर माया-बीज (ह्रीं) और 'नमः' के स्थान पर 'द्विठ' अर्थात् 'स्वाहा' का योग करे (६५) । मूल-मन्त्र (स्त्रीं ह्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा) के बाद 'सर्व-भूत', यह पद, उसके बाद 'निवासिन्यै' यह पद कहे । फिर 'स्व-स्वरूपायै' यह पद कहकर 'सायुधायै' यह पद पढ़े (६६) । तदनन्तर 'सावरणायै परात्परायै आद्यायै कालिकायै' इस पद का उच्चारण कर 'इदमर्घ्यं स्वाहा' यह कहे । सुधी व्यक्ति इसी मन्त्र द्वारा महा- देवी को अर्घ्य दे और तब यथा-शक्ति मूल-मन्त्र का जप कर देवी के बाएँ हाथ में जप का समर्पण करे (६७) । फिर साधक देवी की प्रणाम-पूजा के लिए जल ग्रहण एवं तीर्थ को नमस्कार कर स्तव-पाठ करते-करते और इष्ट-देवता के ध्यान में तत्पर होकर याग-मण्डप में आकर हाथ-पैर का शोधन करे । तदनन्तर द्वार-देश के सामने सामान्यार्घ्य का स्थापन करे (६८-७०) । यथा— ज्ञानवान् व्यक्ति एक त्रिकोण, उसके बाहर एक गोलाकार-मण्डल, उसके बाहर एक चतुष्कोण मण्डल बना कर उसमें 'ॐ आधार-शक्तये नमः' इस मन्त्र से गन्ध-पुष्प द्वारा आधार-शक्ति की पूजा कर उस पर आधार स्थापित करे (७१) । फिर 'फट्' मन्त्र से पात्र को धोकर उक्त आधार पर रखे और 'नमः' मन्त्र से उसे जल से पूर्ण करे । तब उसमें गन्ध-पुष्प छोड़कर सब तीर्थों का उसमें आवाहन करे (७२) । आधार पर अग्नि का, पात्र में सूर्य-मण्डल का और जल में चन्द्र-मण्डल की पूजा कर दस बार माया-बीज (ह्रीं) के जप द्वारा उस जल को पवित्र करे (७३) । तब उसके ऊपर धेनु-मुद्रा और योनि-मुद्रा दिखाए । इसे ही 'सामान्यार्घ्य' कहते हैं । फिर उक्त-जल और पुष्प द्वारा द्वार-देवताओं की पूजा करे (७४) । इन द्वार-देवताओं में गणेश, क्षेत्रपाल, वटुक, योगिनी, गङ्गा, यमुना, लक्ष्मी और सरस्वती का पूजन क्रमशः निम्न मन्त्रों से करे (७५)— गं गणेशाय नमः । क्षं क्षेत्रपालाय नमः । वं वटुकाय नमः । यां योगिन्यै नमः । गां गङ्गायै नमः । यां यमुनायै नमः । श्रीं लक्ष्म्यै नमः । ऐं सरस्वत्यै नमः । इसके बाद ज्ञानी व्यक्ति द्वारस्थ चतुष्काष्ठ (चौखट) के बाईं ओर के काष्ठ को कुछ छूते हुए, बायाँ पैर आगे बढ़ाकर, भगवती के चरण-कमलों को स्मरण करते हुए पूजा-गृह में प्रवेश करे (७६) । फिर पूजा-गृह के मध्य में नैऋत्य-कोण में निम्न मन्त्रों से गन्ध-पुष्प द्वारा वास्तु-पुरुष, ईश और ब्रह्मा का अर्चन करे— ॐ वास्तु-पुरुषाय नमः । ॐ ईशाय नमः । ॐ ब्रह्मणे नमः । तदनन्तर सामान्यार्घ्य जल से याग-मन्दिर को प्रोक्षित करे (७७) । फिर साधक-श्रेष्ठ एकटक दृष्टि से ऊपर की ओर देखकर सभी दिव्य विघ्नों को दूर करने की भावना करे और 'फट्' मन्त्र से जल फेंककर आकाश- सम्बन्धी सभी विघ्न दूर करे (७८) । तब तीन बार पैर के तलवे के किनारे से पृथ्वी पर आघात कर भूमि- सम्बन्धी विघ्नों के दूर करने की भावना करे । पूजा-गृह को चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कपूर द्वारा सुगन्धित करे । अपने बैठने के लिए त्रिकोण-गर्भ चतुष्कोण-मण्डल बनाकर उसमें 'कामरूपाय नमः' मन्त्र से काम-रूप की पूजा करे (७९-८०) । उसी मण्डल के ऊपर आसन बिछाकर काम-बीज (क्लीं) का उच्चारण कर 'आधार-