भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार । २५ शक्तये कमलासनाय नमः' इस मन्त्र से आसन की पूजा करे (८१)। धर्मज्ञ साधक पूर्व या उत्तर-मुख होकर वीरासन से उस पूजित आसन पर बैठकर विजया का शोधन करे (८२)। यथा— तार (ॐ) और माया-बीज (ह्रीं) का उच्चारण कर 'अमृते अमृतोद्भवे अमृत-वर्षिणि अमृतमाकर्षया- कर्षय सिद्धिं देहि कालिकां मे वशमानय स्वाहा ।'—यही सम्बिदा के शोधन का मन्त्र है (८३-८४)। फिर उस विजया के ऊपर सात बार मूल-मन्त्र का जप कर आवाहनी, स्थापनी, सन्निधापनी, सन्निरोधिनी, सम्मुखी- करणी, धेनु और योनि-मुद्रायें दिखाये। जिस प्रकार संकेत-मुद्रा अर्थात् गुरुपदिष्ट तत्त्व-मुद्रा द्वारा सहस्रार-पद्म में विजया द्वारा तीन बार गुरु का तर्पण करे, उसी प्रकार मूल-मन्त्र का उच्चारण कर हृदय में तीन बार देवी का तर्पण करे (८५-८६)। फिर वाग्भव (ऐं) के बाद 'वद वद', उसके बाद 'वाग्वादिनि' यह पद, तब 'मम जिह्वाग्रे स्थिरीभव सर्व-सत्त्व-वशङ्करि स्वाहा'—इस मन्त्र का पाठ कर कुण्डली के मुख में विजया द्वारा आहुति दे (८७)। उक्त प्रकार विजया ग्रहण कर बाएँ कान के ऊपर श्री गुरु को, दाएँ कान के ऊपर गणेश को और मध्य स्थान में सनातनी आद्या काली को प्रणाम करे (८८)। बुद्धिमान् साधक हाथ जोड़कर देवी का ध्यान कर सारे पूजा-द्रव्य को दाईं ओर और सुवासित जल तथा जो कुल-द्रव्य हों, उन सबको बाईं ओर रखे (८६)। मूल-मन्त्र के अन्त में 'फट्' को जोड़कर उसे पढ़ते हुए सामान्यार्घ्य के कुछ जल द्वारा सारी पूजा-सामग्री को प्रोक्षित कर उसे जल-धारा देकर वेष्ठित करे। फिर वह्नि-बीज (रं) द्वारा अग्नि-प्राचीर की भावना करे (६०)। तब कर- शुद्धि करने के लिए दोनों हाथों में चन्दन-युक्त पुष्प लेकर 'फट्' मन्त्र को पढ़ते हुए सचन्दन पुष्पों को घर्षित कर फेंक दे (६१)। हे शिवे ! परस्पर मिली हुई तर्जनी और मध्यमा अंगुलियों से हथेली पर क्रमशः तीन बार ऊपर और ऊपर को ओर ताली बजाकर 'फट्' मन्त्र का पाठ करते हुए छोटिका (चुटकी-ध्वनि) द्वारा दश-दिग्बन्धन करे। तदनन्तर भूत-शुद्धि करे (६२)। यथा— साधक-श्रेष्ठ अपनी गोद में दोनों हथेलियों को उत्तान (चित्त) रखे। फिर मन को प्रथम चक्र मूलाधार में सन्निवेशित कर हुङ्कार द्वारा कुण्डली को उठाए और फिर 'हंस' मन्त्र को पढ़ते हुए पृथिवी के सहित उसे नाभि-मूल में स्थित द्वितीय चक्र स्वाधिष्ठान में लाकर पृथिवी आदि सभी कार्य-तत्त्वों को क्रमशः जलादि कारण- तत्त्व में प्रविष्ट करे (६३-६४)। घ्राणेन्द्रिय, गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द-सहित पृथिवी को जल में लय करे। रसनेन्द्रिय व रसादि गुण-चतुष्टय-सहित जल को अग्नि (तेज) में विलीन करे (६५)। रूपादि गुण-त्रय और चक्षु के सहित अग्नि (तेज) को वायु में विलीन कर स्पर्श, शब्द, त्वक् इन्द्रिय सहित वायु को आकाश में लय करे (६६)। शब्द अर्थात् शब्द और श्रोतृ के सहित आकाश को अहंकार में तथा अहंकार को बुद्धि-तत्त्व में विलीन करे। बुद्धि-तत्त्व को प्रकृति में और उस सर्व-ग्रासिनी प्रकृति को ब्रह्म में लय करे (६७)। सुबुद्धि व्यक्ति इस प्रकार सभी तत्त्वों को विलीन कर बाईं कोख में कृष्ण-वर्ण, ताम्र-लोहित, शुभ्र, आरक्त-नयन, खड्ग-चर्म-धारी, क्रोधाविष्ट, अंगुष्ठ-मात्र परिमित, सदा अधोमुख रहनेवाले, सर्व-पाप-स्वरूप पुरुष का ध्यान करे (६८-६६)। यथा— पुरुषं कृष्ण-वर्णं च रक्त-श्मश्रु-विलोचनम् । खड्ग-चर्म-धरं क्रुद्धमंगुष्ठ-परिमाणकम् । सर्व-पाप-स्वरूपं च सर्वदाधोमुख-स्थितम् ॥ इसके बाद बाईं नासिका में धूम्र-वर्ण 'यं' बीज का ध्यान कर १६ बार इसका जप करते हुए उसी बाईं नासिका से वायु खींचे। तब उत्तम साधक उस खींची हुई वायु द्वारा पाप-पुरुष की देह को सुखा डाले (१००)। फा०—४