भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 139 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 27

१८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र पृथिवी पर मनुष्य लोग काम-किंकर और स्त्री के वशीभूत होकर गुरु, मित्र आदि की अवमानना करेंगे, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५२) । जब पृथ्वी कम फल देनेवाली होगी, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५३) । जिस समय भाई, स्वजन और मन्त्री लोग धन-लाभ की इच्छा से आपस में झगड़ा कर मार-पीट करने लगें, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५४) । जिस समय खुले स्थान में मद्य-मांस खाने में निन्दा हो, दण्ड-वर्जित हो और सभी लोग छिपकर सुरा-पान करें, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५५) । सत्य, त्रेता और द्वापर युग में जिस प्रकार प्रकट रूप से मद्यादि सेवन किया जाता था, उसी प्रकार कलियुग में भी कुल-धर्मानुसार सेवन कर सकते हैं (५६) । जो लोग सत्य द्वारा पवित्र और जितेन्द्रिय होकर कुलाचार का अनुष्ठान करेंगे, जिनका आचार सर्वत्र व्यक्त रहेगा, जो दयालु होंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (५७) । जो गुरु की सेवा में लगे रहेंगे, जो माता के चरण-कमलों में भक्ति करेंगे, जो अपनी पत्नी में ही अनुरक्त रहेंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (५८) । जो सत्य-व्रत, सत्य-निष्ठ और सत्य-धर्म-परायण होकर, कुल-साधन को जो सत्य कहकर विश्वास रखेंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (५६) । जो कुल-धर्म की पद्धति के अनुसार शोधित मत्स्य, मांस, मद्य आदि सत्यवादी योगी को प्रदान करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (६०) । जो हिंसा और मात्सर्य से रहित होंगे, जो दम्भ और द्वेष से शून्य होंगे और जो कुल-धर्म-निष्ठ होंगे, कलि उन्हें पीड़ा नहीं दे सकेगा (६१) । जो कौलों का सत्संग करेंगे, कुल-साधुओं के पास निवास करेंगे, कुल-साधुओं की सेवा करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (६२) । जो कुल-धर्मावलम्बी कुलाचार से विचलित न होकर विविध वेश धारण करते हुए कुलाचार-क्रम से तुम्हारी पूजा करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा न दे सकेगा (६३) । जो कुलाचार के अनुसार स्नान, दान, तपस्या, तीर्थ- दर्शन, व्रत और तर्पण करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा न दे सकेगा। (६४) । जो कुलाचार के अनुसार गर्भाधान आदि संस्कार में संस्कृत होकर पितृ-श्राद्ध आदि कर्म करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा न दे सकेगा (६५) । जो भक्तिपूर्वक कुल-तत्त्व और कुल-द्रव्य का अर्चना करेंगे और कुल-योगी को नमस्कार करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा न दे सकेगा (६६) । कुटिलता और मिथ्याचार-विहीन, निर्मल अन्तःकरण वाले कुल-मार्गानुसारी और परोपकार व्रत में दीक्षित—ऐसे साधुजनों का कलि दास के समान रहेगा (६७) । हे प्रिये ! कलि के दोष-समूह के बीच एक प्रधान गुण भी है कि सत्य-प्रतिज्ञ कौलिक लोगों को सङ्कल्प मात्र से श्रेय प्राप्त होता है (६८) । हे देवि ! अन्य युग में मनुष्यों के पाप-पुण्य मानसिक होते थे अर्थात् सङ्कल्प द्वारा होते थे किन्तु कलियुग में केवल मानसिक पुण्य होता है, पाप नहीं होता (६६) । जो सदा मिथ्या बोलते हैं, जो दूसरों का अनिष्ट करने में लगे रहते हैं, कुलाचार- विहीन हैं—वे सब मनुष्य कलि के किङ्कर होते हैं (७०) । जो कुल-मार्ग में भक्ति नहीं रखते, जो पराई स्त्रियों में आसक्त रहते हैं और जो कुलाचार में लगे व्यक्तियों से द्वेष करते हैं, उन्हें कलि का दास जानना चाहिए (७१) । हे पार्वति ! हे भद्रे ! युगाचार के प्रसङ्ग में तुम्हारी प्रसन्नता के लिए संक्षेप में कलि की प्रबलता के लक्षण कहे गए (७२) । हे देवि ! इस कलि के प्रबल होने पर सभी धर्म दुर्बल हो जायेंगे किन्तु एकमात्र ‘सत्य’ ही रहेगा । अतएव ‘सत्य’-मय होना ही सबका कर्तव्य है (७३) । हे सुव्रते ! ‘सत्य’-धर्म का आश्रय लेकर मनुष्य जो कर्म करेगा, वही कर्म सफल होगा, यही सत्य जाने (७४) । सत्य की अपेक्षा और कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं है, मिथ्या के समान पाप-कार्य और कुछ नहीं है। अतएव मनुष्य का यही कर्तव्य है कि सभी अवस्थाओं में एकमात्र ‘सत्य’ का अवलम्बन करे (७५) । क्षार-भूमि में जिस प्रकार बीज का बोना निष्फल होता है, उसी प्रकार ‘सत्य’- हीन पूजा व्यर्थ होती है, ‘सत्य’-हीन जप व्यर्थ होता है और सत्य’-हीन तपस्या भी व्यर्थ होती है (७६) । ‘सत्य’- रूप ही परम ब्रह्म है, ‘सत्य’ ही परम तपस्या-रूप है, सारी क्रियायें ‘सत्य’-मूलक हैं, ‘सत्य’ से श्रेष्ठ और कुछ