महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा उल्लास : प्रकृति-साधना का उपक्रम । १६ नहीं है (७७) । अतएव मैंने कहा है कि पाप-मय कलि के प्रबल होने पर 'सत्य' का अवलम्बन कर प्रकट रूप से 'कुलाचार' का अनुष्ठान करे (७८) । गोपन करने से 'सत्य' की हानि होती है। मिथ्या बोले बिना गोपन करना सम्भव नहीं होता। अतएव कौलिक व्यक्ति प्रकट भाव से कुल-साधन करे (७६) । मैंने पहले कुल-तन्त्र में कहा है कि कुल-धर्म की रक्षा के लिए मिथ्या बोलना निन्दित नहीं है किन्तु कलि की प्रबलता होने पर यह उपदेश प्रशस्त नहीं है (८०) । सत्य-युग में चतुष्पाद अर्थात् परिपूर्ण धर्म था। त्रेता-युग में उसका एक पद कम होकर वह त्रि-पाद रह गया। द्वापर-युग में धर्म द्वि-पाद मात्र रहता है। कलि-युग में उसी धर्म का केवल एक पाद शेष रहता है (८१) । धर्म का वह एक पाद भी 'तपस्या' और 'दया'-रूप दो अंशों से भग्न हो जाता है, एकमात्र 'सत्य'-अंश ही दृढ़ रहता है। इस समय वह 'सत्य'-रूप पाद भग्न करने से धर्म का लोप हो जायगा (८२) । हे कुलेश्वरि ! इसी कारण 'सत्य' का सम्यक्-रूप से अवलम्बन करके ही सारे कार्य सम्पन्न करने चाहिए। इस कलि-काल में 'कुला- चार' को छोड़कर अन्य उपाय नहीं है। इस कलि-काल में यदि मिथ्या आचार में प्रवेश करता है, तो कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। अतएव सर्वतोभाव से 'सत्य' द्वारा पवित्रात्मा होकर, मेरे द्वारा बताए मार्ग के अनुसार मनुष्य लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रम के उपयोगी दीक्षा, पूजा, जप, होम, पुरश्चरण, तर्पण आदि सारे कर्मों का आचरण करें (८३-८५) । विशेष कर इस रूप में व्रत, उद्वाह, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जात-कर्म, नाम-करण, चूडाकरण, अन्त्येष्टि-क्रिया, पितृ-श्राद्ध आगम-सम्मत ही करे। तीर्थ-श्राद्ध, वृषोत्सर्ग, शारदोत्सव, यात्रा, गृह- प्रवेश, नूतन वस्त्रालङ्कारादि परिधान, वापी, कूप, गृहारम्भ और गृह-प्रतिष्ठा, देवता-स्थापन, दिवा-कृत्य, रात्रि- कृत्य, पर्व-कृत्य, मास-कृत्य, ऋतु-कृत्य, वर्ष-कृत्य, नित्य-नैमित्तिक कर्म, कर्त्तव्य कर्म, अकर्त्तव्य कर्म, त्याज्य कर्म, ग्राह्य कर्म—इन सबका निर्दिष्ट विधान के अनुसार ही साधन करे (८६-६१) । यदि कोई व्यक्ति मोह, दुर्बुद्धि या अश्रद्धा के वश में होकर उक्त सब कर्मों को निर्दिष्ट विधि से नहीं करता, तो वह सब कर्मों से बहिष्कृत होकर अन्त में विष्ठा में कृमि का जन्म ग्रहण करता है (६२) । हे महेश्वरि ! कलि-युग के प्रबल होने पर यदि कोई मेरे मत को छोड़कर कर्म करता है, तो वह कर्म उल्टा फल देनेवाला होगा (६३) । हे देवि ! मेरे मत से असम्मत दीक्षा साधक को प्राण-घातिनी होगी और भस्म में आहुति देने के समान उसकी पूजा भो निष्फल होगी (६४) । देवता उसके प्रति क्रुद्ध होंगे और पद-पद पर उसे विघ्न होंगे (६५) । हे अम्बिके ! कलिकाल के प्रबल होने पर जो व्यक्ति मेरे कहे शास्त्र को जानते हुए भी अन्य पथ के अनुसार कर्म करेगा, वह महा-पापी होगा (६६) । हे जो व्यक्ति अन्य पथ का अवलम्बन कर व्रत या विवाह करेगा, वह जब तक चन्द्र-सूर्य रहेंगे, तब तक नरक में रहेगा (६७) । अन्य मत से उपनयन होने से ब्रह्म-हत्या का पाप होगा। जिसका उपनयन होगा, वह व्रात्य होगा। वह व्यक्ति केवल सूत्र-वाही होगा और चाण्डाल की भी अपेक्षा अधम होगा (६८) । कुल-नायिके ! अन्य पद्धति के अनुसार जो नारी विवाहिता होगी, वह निन्दिता होगी और विवाह करनेवाला पुरुष भी उसके संसर्ग से पापी होगा, यह जानना उचित है (६६) । उस प्रकार विवाहिता स्त्री-गमन से पुरुष को दिन-दिन वेश्यागमन-जनित पाप होगा। देवता उस नारी के हाथ का अन्न-जलादि ग्रहण न करेंगे (१००) । पितृ लोग भी उसे नहीं खाएँगे-पिएँगे क्योंकि वह मल-मूत्र-समान है। उस स्त्री-पुरुष की जो सन्तान होगी, वह सर्व-धर्म-बहिष्कृत होगी (१०१) । अतः अशााम्भव शास्त्र अर्थात् तन्त्र से भिन्न शास्त्र द्वारा देव-कर्म, पितृ-कर्म और कुलाचार-कर्म में उसे अधिकार न होगा। अशााम्भव अर्थात् तन्त्र- भिन्न शास्त्र की पद्धति से देव-मूर्ति की स्थापना करने से, उस मूर्ति में देवता का सान्निध्य नहीं होगा। उससे इह-लोक या परलोक में कोई फल नहीं मिलेगा। उससे केवल शरीर-कष्ट और धन-नाश ही होगा (१०२-१०३) ।