भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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२० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र जो व्यक्ति आगमोक्त विधि को छोड़कर श्राद्ध करेगा, उसका वह श्राद्ध निष्फल होगा और श्राद्ध-कर्त्ता पितृ-लोगों के साथ नरक को जायगा (१०४) । उसके द्वारा दिया हुआ जल रक्त-समान और पिण्ड मल-मय होगा। अतएव मनुष्यों को सर्वतोभाव से शङ्कर द्वारा प्रदर्शित मत का आश्रय करना ही कर्त्तव्य है (१०५) । हे देवि ! यह अधिक और क्या कहूँ, मैं सत्य-सत्य कहता हूँ कि शिव से असम्मत जो भी कर्म होंगे, वे सब निष्फल होंगे (१०६)। जो शम्भु-प्रोक्त आचार से हीन हैं, उनके उन कर्मों से धर्म होना तो दूर रहा, उनका पूर्व-सञ्चित धर्म भी नष्ट हो जायगा और नरक से उनका उद्धार नहीं होगा (१०७) । हे महेशानि ! मेरे द्वारा कही पद्धति के अनुसार जो नित्य, नैमित्तिक कर्म का साधन है, वही तुम्हारा साधन होगा (१०८) । उनके बीच कलि-रूप रोग का ओषधि-स्वरूप बहु-विध मन्त्र और यन्त्रादि-संयुक्त तुम्हारी विशेष आराधना मैं बताता हूँ, सुनो (१०६) । • — • पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार श्री सदाशिव ने कहा—तुम आद्या और परमा शक्ति हो । तुम सर्व-शक्ति-स्वरूपा हो । तुम्हारी शक्ति के प्रभाव से मैं सृष्टि, स्थिति और प्रलयादि नाश-कार्य में समर्थ होता हूँ (१) । तुम्हारे विविध वर्ण और विविध आकार और बहु प्रयासवाली साधनाओं के अनन्त रूप हैं। कौन व्यक्ति उन सब रूपों का वर्णन कर सकता है (२) । तुम्हारी कृपा से कुल-तन्त्र आदि एवं आगम-समूह में तुम्हारी उन्हीं सब रूपों की पूजा और साधन को मैंने यथा-मति कहा है (३) । किन्तु इस गुप्त साधन को कहीं प्रकट नहीं किया है। हे कल्याणि ! इस गुप्त साधन के प्रभाव से मेरे प्रति तुम्हारी ऐसी कृपा हुई है (४) । हे प्रिये ! इस समय तुम्हारे द्वारा पूछे जाने पर मैं गोपन करने में समर्थ नहीं हूँ। अतएव वह मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय होने पर भी उसे तुम्हारी प्रसन्नता के लिए कहता हूँ (५) । यह गुप्त साधन सब दुःखों को शान्त करनेवाला, सब विपत्तियों को नष्ट करनेवाला है, तुम्हें सन्तुष्ट करनेवाला और शीघ्र ही तुम्हें प्राप्त करानेवाला है (६) । हे प्रिये ! कलि-काल में कलि के पापों द्वारा व्याकुल और अधिक परिश्रम करने में असमर्थ मनुष्य लोगों के लिए यह गुप्त साधन परम धन है (७) । इस गुप्त साधन में न्यासों का आधिक्य नहीं है, उपवास आदि संयम नहीं है। यह साधन सुख-साध्य और संक्षिप्त है। भक्तों को यह चतुर्वर्ग के फल का देनेवाला है, अतः यही श्रेष्ठ है (८) । हे देवेशि शिवे ! मैं पहले इस विषय में मन्त्रोद्धार का क्रम कहता हूँ, सुनो। मनुष्य लोग इसके सुनने मात्र से जीवन्मुक्त हो जाएँगे (६) । हे प्रिये ! 'तजस' अर्थात् रेफ में आरूढ़ 'प्राणेश' अर्थात् हकार में 'भेरूण्डा' अर्थात् 'ई' का योग कर उनमें 'व्योम-बिन्दु' अर्थात् अनुस्वार शोभित कर 'ह्रीं' बीज का उद्धार कर दूसरे बीज का उद्धार करे (१०)। 'सन्ध्या' अर्थात् 'श' 'रक्त' अर्थात् 'र' के ऊपर आरोहण करे, उनमें 'वाम नेत्र' अर्थात् 'ई' और 'इन्दु' अर्थात् अनुस्वार योग करने से दूसरा मन्त्र 'श्रीं' होगा। हे कल्याणि ! इसके बाद तीसरा मन्त्र सुनो प्रजापति (क), दीप (रेफ) के ऊपर रहे (११) । उनमें गोविन्द (ई) और बिन्दु (अनुस्वार) का संयोग करे। यह 'क्रीं' बीज साधकों को सुख देनेवाला है। इन तीन बीजों के बाद 'परमेश्वरि !' यह सम्बोधन-पद है (१२) । इस मन्त्र के शेष भाग में 'वह्नि-कान्ता' अर्थात् 'स्वाहा' यह पद है।