महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र प्रदान करे (७) । साधक-श्रेष्ठ व्यक्ति स्तोत्र-कवच का पाठ कर (बाद में उक्त मन्त्र के जप-पूर्वक) प्रणाम करे। यथा- ॐ नमस्ते परमं ब्रह्म नमस्ते परमात्मने । निर्गुणाय नमस्तुभ्यं सद्-रूपाय नमो नमः ।। अर्थात् तुम परम ब्रह्म हो, तुम्हें नमस्कार। तुम परमात्मा हो, तुम्हें नमस्कार। तुम गुणातीत हो, तुम्हें नमस्कार । तुम सत्-स्वरूप हो, तुम्हें बारम्बार नमस्कार (६७-७४) । परब्रह्म की आराधना में कायिक, वाचिक या मानसिक-जैसी इच्छा हो, तीनों नमस्कार किए जा सकते हैं। परन्तु जिससे अन्तःकरण शुद्ध हो, वही विधि करनी चाहिए (७५) । ज्ञानी व्यक्ति इसी प्रकार ब्रह्म की पूजा कर आत्मीय स्वजनों के साथ महा-प्रसाद ग्रहण करे (७६) । परब्रह्म को पूजा के समय न आवाहन होता है, न विसर्जन । सभी समय, सभी स्थानों में ब्रह्म की साधना हो सकती है। स्नान किए हो या बिना नहाए, भोजन किए हो या भूखा हो, जिस किसी अवस्था में या जो भी समय हो, विशुद्ध-चित्त होकर परमात्मा की पूजा करे (७७-७८) । इस ब्रह्म-मन्त्र द्वारा जो कोई भक्ष्य, पेयादि वस्तु परब्रह्म को समर्पित की जाती है, वह अति पवित्र- कारी होती है (७६) । गङ्गा-जल या शालग्राम शिला आदि में अर्पित वस्तु को स्पर्श-दोष लग सकता है किन्तु परब्रह्म को अर्पित वस्तु को स्पर्श-दोष नहीं लगता (८०) । जो कोई भी द्रव्य, पका हो या कच्चा, उक्त मन्त्र द्वारा उसे ब्रह्मसात् कर साधक व्यक्ति स्वजनों के साथ भोजन कर सकता है (८१) । ब्रह्म को निवेदित वस्तु के खाने में ब्राह्मणादि वर्ण का विचार नहीं होता। उच्छिष्टादि का भी विचार नहीं होता। इसमें समय-असमय, पवित्र-अपवित्र की व्यवस्था नहीं है (८२) । जिस समय, जिस स्थान में, जिसके द्वारा ब्रह्म को अर्पित नैवेद्य प्राप्त हो, उसका विचार न कर भोजन करे (८३) । ब्रह्मसात् किया हुआ अन्न यदि चाण्डाल लाये, या कुत्ते के मुख से लाया गया हो, तो भी वह पवित्र है; यह अन्न देवताओं को भी दुर्लभ है (८४) । हे सुर-वन्दिते ! मनुष्यों के लिए इसकी दुर्लभता को क्या बात कही जाय (८५) । यदि कोई व्यक्ति महा-पाप से युक्त हो, या किसी अन्य पातक से युक्त हो, वह यदि एक बार मात्र प्रसाद ग्रहण कर ले, तो वह सभी पापों से मुक्त हो जायगा, इसमें कोई सन्देह नहीं (८६) । साढे तीन कोटि तीर्थों में स्नान और दान करने से जो फल होता है, वही फल ब्रह्म को अर्पित वस्तु का सेवन करने से मनुष्यों को मिलता है (८७) । मनुष्य लोग अश्वमेधादि यज्ञ कर जो फल भोगते हैं, उससे कोटि गुणा अधिक फल ब्रह्म को निवेदित वस्तु के भक्षण से मिलता है (८८) । यदि सहस्र कोटि जिह्वा हों, सौ कोटि मुख हों, तो भी महा-प्रसाद के माहात्म्य का वर्णन करने में समर्थ नहीं हो सकता (८६) । जिस किसी भी स्थान में स्थित हो, ब्रह्म को अर्पित महा-प्रसाद के मिलने पर, उसे ग्रहण करने से चाण्डाल-जाति के लोग भी ब्रह्म का सायुज्य प्राप्त करते हैं (६०) । यदि नीच जाति के लोगों का अन्न है, किन्तु यदि वह ब्रह्म को समर्पित हुआ है, तो वेदान्त-पारदर्शी ब्राह्मण भी उसे ग्रहण कर सकता है (६१) । परम ब्रह्म का प्रसाद ग्रहण करते समय जाति-भेद का विचार न करे। जो इस महा-प्रसाद को (नीच जाति के स्पर्श से) अशुद्ध समझता है, वह महा-पापी होता है (६२) । हे प्रिये ! भले ही सौ पाप करे, भले ब्रह्म-हत्या करे किन्तु ब्रह्म को अर्पित अन्न की अवहेलना न करे (६३) । हे भद्रे ! जो मूर्ख लोग इस महा-मन्त्र द्वारा संस्कृत अन्न-जल आदि का त्याग करते हैं, उनके पितृ-गण का अधःपतन होता है (६४) । और स्वयं वे प्रलय-काल तक अन्ध-तामिस्र नामक नरक में गिर कर रहते हैं। जिन्हें ब्रह्म को निवेदन अन्न से द्वेष होता है, उनका कुछ भी निस्तार नहीं होता (६५) । जो महा-मन्त्र का साधन करते हैं, उनके सभी अपुण्य कर्म पुण्य कर्मों में बदल जाते हैं; सुषुप्ति भी सुकर्म- स्वरूप होती है और स्वेच्छाचार भी विहित कर्म माना जाता है (६६) । जो व्यक्ति ब्रह्म-निष्ठ ज्ञानी है, उसे वैदिकाचार से क्या प्रयोजन अथवा तान्त्रिक अनुष्ठान से क्या प्रयोजन, उसका स्वेच्छाचार ही विधि-स्वरूप