भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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तीसरा उल्लास : ब्रह्मोपासना-विधि | १३ कहा जाता है (९७) । ब्रह्म-निष्ठ व्यक्ति जो समस्त वैध कर्मानुष्ठान करते हैं, उनसे उन्हें कोई फल नहीं लगता और वे जिन वैध कर्मों का अनुष्ठान नहीं करते, उससे भी उन्हें कोई पाप नहीं लगता । ब्रह्म-मन्त्र के साधन के कारण उन्हें कोई विघ्न या दोष नहीं होता (९८) । हे महेश्वरि ! इस धर्म का अनुष्ठान करते समय सत्यवादी, जितेन्द्रिय, परोपकार-परायण, निर्विकार-चित्त और सदाशय रहना होता है (९९) । ब्रह्म-निष्ठ व्यक्ति मात्सर्य-विहीन, दम्भ-रहित, दयालु, विशुद्ध-हृदय, माता- पिता का प्रिय करनेवाला और माता-पिता की सेवा में तत्पर रहता है (१००) । वह सदा ब्रह्म-प्रतिपादक बातों को सुनता है, ब्रह्म का चिन्तन करता है और सदा ब्रह्म का अनुसन्धान या तत्त्व की जिज्ञासा करता है । वह सदा संयत-चित्त और दृढ़-बुद्धि रहता है, वह सदा 'ब्रह्म-साक्षात्' की भावना करता है (१०१) । वह कभी मिथ्या बात नहीं करता, दूसरों का अनिष्ट नहीं करता । ब्रह्म-मन्त्रोपासक व्यक्ति पर-स्त्री-गमन नहीं करता (१०२) । ब्रह्म-निष्ठ व्यक्ति सभी कर्मों के आरम्भ में 'तत्-सत्' इन शब्दों का उच्चारण करता है । हे देवि ! ब्रह्म-निष्ठ व्यक्ति खाने-पीने आदि सभी कार्यों में 'ब्रह्मार्पणमस्तु' इस वाक्य को कहे । जिस उपाय से सभी मनुष्यों की लोक- यात्रा का निर्वाह उत्तम रूप से हो, वही उपाय ब्रह्मज्ञ व्यक्ति करे । यही सनातन धर्म है (१०३-४) । हे शाम्भवि ! अब ब्रह्म-मन्त्र की सन्ध्योपासना-विधि बताता हूँ। इस सन्ध्या-वन्दना को करके ब्रह्म-निष्ठ मनुष्य लोग पृथिवी पर ब्रह्म-रूप सम्पत्ति पा सकते हैं (१०५) । हे देवि ! साधक-श्रेष्ठ सुधी व्यक्ति प्रातःकाल, मध्याह्न-काल और सन्ध्या-काल में उपयुक्त स्थान पर यथोचित आसन पर पूर्ववत् बैठकर परम ब्रह्म का ध्यान कर १०८ बार गायत्री का जप करे । फिर यथा-विधि ('ब्रह्मार्पणमस्तु' यह कहकर) जप समर्पित कर पूर्ववत् प्रणाम करे (१०६-७) । यह मैंने तुमसे ब्रह्म-मन्त्र-विषयक सन्ध्या-विधि कही। इस सन्ध्या का अनुष्ठान करने से साधक व्यक्ति का अन्तःकरण शुद्ध होता है (१०८) । हे चार्वङ्गि ! अब सर्व-पाप-नाशिनी 'गायत्री' को बताता हूँ, सुनो— परमेश्वराय विद्महे पर-तत्त्वाय धीमहि तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात् । इस ब्रह्म-गायत्री से धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतुर्वर्ग का फल पाया जा सकता है । पूजा, याग, स्नान, पान, भोजन आदि जो-जो कर्म करने हों, उन सबको इसी ब्रह्म-मन्त्र द्वारा सिद्ध करे । (१०९-११२) ब्राह्म मुहूर्त्त में उठकर ब्रह्म-मन्त्र देनेवाले गुरु को प्रणाम करने के बाद परम ब्रह्म का ध्यान कर यथाशक्ति मन्त्र का स्मरण करे । फिर पूर्ववत् ब्रह्म को नमस्कार करे । ब्रह्मोपासकों के लिए यही प्रातःकृत्य कहा गया है (११३) । ३२ हजार जप से इस मन्त्र का पुरश्चरण होता है । जप का दशांश होम, होम का दशांश तर्पण करे (११४) । तर्पण का दशांश अभिषेक करे । हे सुन्दरि ! मन्त्र-साधक व्यक्ति पुरश्चरण-कर्म में अभिषेक के दशमांश ब्राह्मणों को भोजन कराए (११५) । ब्रह्म-मन्त्र का पुरश्चरण करते समय भक्ष्याभक्ष्य विचार नहीं है, त्याज्यात्याज्य का विचार नहीं है, काल-शुद्धि का भी नियम नहीं है, स्थान का भी निरूपण नहीं है (११६) । बिना खाए हो या खाए हुए हो । स्नान किए हो या बिना स्नान के हो, यथेच्छानुसार ही इस परम मन्त्र की साधना करे (११७) । इस ब्रह्म-साधन के सम्बन्ध में क्लेश नहीं है, परिश्रम नहीं है, स्तव या कवच का पाठ नहीं करना होता, न्यास या मुद्रा-प्रदर्शन नहीं करना होता । हे वरानने ! अन्य मन्त्र में जिस प्रकार हृदय में सेतु- चिन्ता करनी होती है, उस प्रकार सेतु-चिन्ता इसमें आवश्यक नहीं है (११८) । इस ब्रह्म-मन्त्र के साधन के सम्बन्ध में चौर-गणेशादि के मन्त्र का जप नहीं करना होता, कुल्लुका का भी विन्यास नहीं करना होता । इन समस्त अनुष्ठानों को न करने पर भी अल्पकाल में निश्चय ही परम ब्रह्म का साक्षात्कार-लाभ होता है (११९) ।