महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र इस महा-मन्त्र के साधन के सम्बन्ध में 'मानसिक सङ्कल्प' कहा जाता है। इसमें भाव-शुद्धि बड़ी आवश्यक है (१२०)। हे देवि ! ब्रह्म-साधक सभी को ब्रह्म-मय की भावना करे। इस ब्रह्म-साधना में त्रुटि होने से अङ्ग-वैगुण्य नहीं होता और प्रत्यवाय भी नहीं होते। इस महा-मन्त्र के साधन में कोई स्थल अंग-हीन होने पर भी वह निश्चय ही सांग हो जाता है (१२१)। इस अति दुस्तर, तपस्या-हीन, घोर पाप-मय कलि-युग में ब्रह्म- मन्त्र का साधन ही एकमात्र निस्तार का उपाय है (१२२)। हे महेश्वरि ! विविध तन्त्रों और विविध आगमादि शास्त्र में विभिन्न प्रकार के साधन के विषय कहे गए हैं। परन्तु कलि-युग में दुर्बल जीव के लिए वह सब असाध्य है (१२३)। हे प्रिये ! कलि-युग के मनुष्य लोग अल्पायु होते हैं, वे बड़े अनुष्ठान नहीं कर पाते। अन्न में ही उनके प्राण रहते हैं। वे लोभी, धन कमाने में व्याकुल और सदा चंचल चित्त वाले होते हैं (१२४)। समाधि में उनकी बुद्धि स्थिर रहतो नहीं। वे योग-जन्य कष्ट सहन करने में असमर्थ होते हैं, अतः उनके हित एवं मोक्ष के लिए मैंने इस ब्रह्मोपासना का पथ प्रकट किया है (१२५)। हे देवि ! मैं सत्य-सत्य कहता हूँ, कलि-युग में ब्रह्म-दीक्षा के सिवा सुख और मुक्ति के लिए दूसरा कोई उपाय नहीं है (१२६)। सब तन्त्रों में यही विधि है कि प्रातःकाल प्रातःकृत्य सम्पन्न कर त्रि-काल सन्ध्या करे और मध्याह्न में पूजा करे। हे शिव ! परम ब्रह्म की उपासना में साधक की इच्छा ही विधि-स्वरूप मानी जाती है (१२७)। ब्रह्म-साधन में शास्त्रीय सभी विधियाँ दासी-स्वरूप हो जाती हैं, सारे निषेध भी कुछ प्रभाव नहीं डाल पाते। स्वेच्छानुरूप आचरण द्वारा ही इष्ट-सिद्धि होती है। इस प्रकार के ब्रह्म-साधक को छोड़कर अन्य किसका सहारा लिया जा सकता है (१२८) ? स्थिर-चित्त, प्रशान्त, ब्रह्म-ज्ञानी गुरु को पाते ही उनके चरण-कमलों को पकड़कर भक्ति-भाव के साथ प्रार्थना करे कि— करुणामय ! दीनेश ! तवाहं शरणं गतः । त्वत्-पदाम्भोरुहच्छायां देहि मूर्ध्नि यशोधन ॥ अर्थात् हे करुणामय ! हे दीन लोगों के ईश्वर ! मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ। हे यशोधन ! मेरे मस्तक पर अपने चरण-कमलों की छाया प्रदान करें (१२६-३०)। यह प्रार्थना कर शिष्य गुरु को यथा-शक्ति पूजा करे। फिर गुरु के सामने हाथ जोड़कर चुप होकर बैठे (१३१)। तब गुरु यथा-विधि शिष्य के लक्षणों की परीक्षा कर सत् शिष्य को बुलाकर कृपा-पूर्ण हृदय से महा-मन्त्र प्रदान करें (१३२)। फिर वे ज्ञानी गुरु पूर्व या उत्तर-मुख होकर आसन पर बैठकर शिष्य को अपनी बाईं ओर बैठाकर करुणा-पूर्ण हृदय से उसे देखें (१३३)। तदनन्तर साधक को इष्ट-सिद्धि के लिए ऋषि-न्यास कर शिष्य के मस्तक पर एक सौ आठ बार मन्त्र का जप करें (१३४)। फिर करुणानिधि सद्गुरु ब्राह्मण के दाएँ कान में, अन्य जातियों के बाएँ कान में सात बार मन्त्र सुनायें (१३५)। हे कालिके ! यह तुमसे ब्रह्म-मन्त्र के उपदेश की विधि मैंने कही। इसमें पूजादि की अपेक्षा नहीं है। इसमें केवल मानसिक सङ्कल्प करना होता है (१३६) तब शिष्य गुरु के चरण-कमलों में दण्डवत् गिरे और गुरु उसे स्नेहपूर्वक निम्न मन्त्र पढ़ते हुए उठायें— उत्तिष्ठ वत्स ! मुक्तोऽसि ब्रह्म-ज्ञान-परो भव । जितेन्द्रियः सत्य-वादी बलारोग्यं सदास्तु ते ॥ अर्थात् हे पुत्र, उठो। तुम मुक्त हो, तुम ब्रह्म-ज्ञान-परायण बनो। तुम सत्य-वादी और जितेन्द्रिय रहो। बल और आरोग्य सदा तुम्हारे रहें (१३७)। इस पर साधक-श्रेष्ठ उठकर गुरु को यथाशक्ति दक्षिणा-स्वरूप धन या फल प्रदान करे। फिर गुरु का आज्ञाकारी होकर देवता के समान भू-मण्डल पर विचरण करे (१३८-३६)। जो ब्रह्म-मन्त्र ग्रहण करता है, उसकी