महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा उल्लास : प्रकृति-साधना का उपक्रम | १५ आत्मा मन्त्र ग्रहण करने मात्र से ब्रह्म-मय हो जाती है। हे देवि ! जो ब्रह्म-स्वरूप हो जाता है, उसे अन्य बहुत से साधनों की क्या आवश्यकता ? हे प्रिये ! यह मैंने तुमसे संक्षेप में ब्रह्म-दीक्षा कही (१४०) । जिस समय गुरु की दया हो, उसी समय ब्रह्म-मन्त्र की दीक्षा ग्रहण करे (१४१) । शाक्त हो या शैव हो, वैष्णव हो या सौर हो अथवा गाणपत्य हो, चाहे जिस मन्त्र का उपासक हो, ब्राह्मण हो या अन्य किसी जाति का हो, सभी ब्रह्म-मन्त्र के अधिकारी हैं (१४२ । हे देवि ! मैं इसी मन्त्र के प्रसाद से मृत्युञ्जय, देवदेव, जगद्- गुरु, स्वेच्छाचारो और निर्विकल्प होकर रहता हूँ (१४३) । पूर्वकाल में ब्रह्मा और भृगु आदि ब्रह्मर्षि-गण, इन्द्र आदि देव-गण और नारद आदि देवर्षि-गण ने मुझसे इसी ब्रह्म-मन्त्र को प्राप्त कर उपासना की है (१४४) । हे प्रिये ! नारद के मुख से व्यासादि मुनि-गण और उनसे जनकादि राजर्षि-गण ने इस महा-मन्त्र को प्राप्त कर परमात्मा की प्रसन्नता से ब्रह्म-स्वरूप का लाभ किया है (१४५) । हे महेश्वरि ! ब्रह्म-मन्त्र में किसी विषय का विचार नहीं है। गुरु बिना विचार किए शिष्य को अपना मन्त्र दे सकता है (१४६) । पिता पुत्र को, भाई भाई को, पति स्त्री को, मामा भांजे को और नाना नाती को दीक्षित कर सकता है (१४७) । अपना मन्त्र देने में जो दोष कहा गया है और पिता आदि की दीक्षा में जो दोष उल्लिखित है, वह सब दोष इस महा-सिद्ध ब्रह्म-मन्त्र में घटित नहीं होते (१४८) । ब्रह्म-ज्ञानी गुरु के मुख से जिस किसी विधान से ब्रह्म-मन्त्र को सुनकर मनुष्य ब्रह्म- भूत और पवित्र हो जाता है, जिससे वह पुण्य-पाप में लिप्त नहीं होता (१४६) । ब्राह्मण या अन्य जाति के जो लोग ब्रह्म-मन्त्र की उपासना करते हैं, वे सब अपने-अपने वर्ण के लोगों में श्रेष्ठ, पूज्य और विशेष रूप से मान्य होते हैं (१५०) । ब्रह्मोपासक ब्राह्मण-गण साक्षात् यति-स्वरूप होते हैं और अन्य जाति के लोग ब्राह्मण के समान होते हैं। इस प्रकार ब्रह्म-मन्त्र में दीक्षित ब्रह्मज्ञ व्यक्ति की पूजा सभी को करना कर्तव्य है (१५१) । जो ब्रह्मज्ञ व्यक्ति को अवमानना करते हैं, वे ब्रह्म-घातक होते हैं और जब तक सूर्य और तारे हैं तब तक वे घोर नरक में रहते हैं (१५२) । स्त्री-हत्या करने से जो पाप होता है, भ्रूण-हत्या से जो पातक लगता है, उससे कोटि गुना अधिक पाप ब्रह्मोपासक की निन्दा करने से होता है (१५३) । ब्रह्म-मन्त्र में उपदिष्ट होकर लोग जिस प्रकार सब पापों से मुक्त हो ब्रह्म-सायुज्य को पाते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे साधन द्वारा भी होता है (१५४) । चौथा उल्लास : प्रकृति-साधना का उपक्रम इसके बाद भगवती ने परब्रह्म की उपासना का विवरण सुनकर परमानन्द से युक्त होकर शङ्कर से जिज्ञासा की (१) । हे नाथ ! आपने ब्रह्मोपासना का जो विषय कहा है, वह सब लोगों को प्रिय है और साक्षात् ब्रह्म-पद का देनेवाला है (२) । इस ब्रह्म-साधन से तेज, बुद्धि, बल और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है और सभी सुखों का साधन है। हे जगदीश्वर ! मैं तुम्हारे वचनामृत से बहुत सन्तुष्ट हुई हूँ (३) । हे दया-सागर ! आपने कहा है कि ब्रह्म-साधन द्वारा जिस प्रकार ब्रह्म का सायुज्य मिलता है, उस प्रकार मेरी साधना द्वारा भी ब्रह्म का सायुज्य पाया जा सकता है (४) । हे प्रभो ! जो आपने बताया है, जिसके द्वारा ब्रह्म का सायुज्य मिलता है, उसी प्रकार की मेरी साधना मैं जानना चाहती हूँ (५) । मेरी साधना की विधि किस प्रकार की है और किस