महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
चौथा उल्लास : प्रकृति-साधना का उपक्रम | १५ आत्मा मन्त्र ग्रहण करने मात्र से ब्रह्म-मय हो जाती है। हे देवि ! जो ब्रह्म-स्वरूप हो जाता है, उसे अन्य बहुत से साधनों की क्या आवश्यकता ? हे प्रिये ! यह मैंने तुमसे संक्षेप में ब्रह्म-दीक्षा कही (१४०) । जिस समय गुरु की दया हो, उसी समय ब्रह्म-मन्त्र की दीक्षा ग्रहण करे (१४१) । शाक्त हो या शैव हो, वैष्णव हो या सौर हो अथवा गाणपत्य हो, चाहे जिस मन्त्र का उपासक हो, ब्राह्मण हो या अन्य किसी जाति का हो, सभी ब्रह्म-मन्त्र के अधिकारी हैं (१४२ । हे देवि ! मैं इसी मन्त्र के प्रसाद से मृत्युञ्जय, देवदेव, जगद्- गुरु, स्वेच्छाचारो और निर्विकल्प होकर रहता हूँ (१४३) । पूर्वकाल में ब्रह्मा और भृगु आदि ब्रह्मर्षि-गण, इन्द्र आदि देव-गण और नारद आदि देवर्षि-गण ने मुझसे इसी ब्रह्म-मन्त्र को प्राप्त कर उपासना की है (१४४) । हे प्रिये ! नारद के मुख से व्यासादि मुनि-गण और उनसे जनकादि राजर्षि-गण ने इस महा-मन्त्र को प्राप्त कर परमात्मा की प्रसन्नता से ब्रह्म-स्वरूप का लाभ किया है (१४५) । हे महेश्वरि ! ब्रह्म-मन्त्र में किसी विषय का विचार नहीं है। गुरु बिना विचार किए शिष्य को अपना मन्त्र दे सकता है (१४६) । पिता पुत्र को, भाई भाई को, पति स्त्री को, मामा भांजे को और नाना नाती को दीक्षित कर सकता है (१४७) । अपना मन्त्र देने में जो दोष कहा गया है और पिता आदि की दीक्षा में जो दोष उल्लिखित है, वह सब दोष इस महा-सिद्ध ब्रह्म-मन्त्र में घटित नहीं होते (१४८) । ब्रह्म-ज्ञानी गुरु के मुख से जिस किसी विधान से ब्रह्म-मन्त्र को सुनकर मनुष्य ब्रह्म- भूत और पवित्र हो जाता है, जिससे वह पुण्य-पाप में लिप्त नहीं होता (१४६) । ब्राह्मण या अन्य जाति के जो लोग ब्रह्म-मन्त्र की उपासना करते हैं, वे सब अपने-अपने वर्ण के लोगों में श्रेष्ठ, पूज्य और विशेष रूप से मान्य होते हैं (१५०) । ब्रह्मोपासक ब्राह्मण-गण साक्षात् यति-स्वरूप होते हैं और अन्य जाति के लोग ब्राह्मण के समान होते हैं। इस प्रकार ब्रह्म-मन्त्र में दीक्षित ब्रह्मज्ञ व्यक्ति की पूजा सभी को करना कर्तव्य है (१५१) । जो ब्रह्मज्ञ व्यक्ति को अवमानना करते हैं, वे ब्रह्म-घातक होते हैं और जब तक सूर्य और तारे हैं तब तक वे घोर नरक में रहते हैं (१५२) । स्त्री-हत्या करने से जो पाप होता है, भ्रूण-हत्या से जो पातक लगता है, उससे कोटि गुना अधिक पाप ब्रह्मोपासक की निन्दा करने से होता है (१५३) । ब्रह्म-मन्त्र में उपदिष्ट होकर लोग जिस प्रकार सब पापों से मुक्त हो ब्रह्म-सायुज्य को पाते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे साधन द्वारा भी होता है (१५४) । चौथा उल्लास : प्रकृति-साधना का उपक्रम इसके बाद भगवती ने परब्रह्म की उपासना का विवरण सुनकर परमानन्द से युक्त होकर शङ्कर से जिज्ञासा की (१) । हे नाथ ! आपने ब्रह्मोपासना का जो विषय कहा है, वह सब लोगों को प्रिय है और साक्षात् ब्रह्म-पद का देनेवाला है (२) । इस ब्रह्म-साधन से तेज, बुद्धि, बल और ऐश्वर्य की वृद्धि होती है और सभी सुखों का साधन है। हे जगदीश्वर ! मैं तुम्हारे वचनामृत से बहुत सन्तुष्ट हुई हूँ (३) । हे दया-सागर ! आपने कहा है कि ब्रह्म-साधन द्वारा जिस प्रकार ब्रह्म का सायुज्य मिलता है, उस प्रकार मेरी साधना द्वारा भी ब्रह्म का सायुज्य पाया जा सकता है (४) । हे प्रभो ! जो आपने बताया है, जिसके द्वारा ब्रह्म का सायुज्य मिलता है, उसी प्रकार की मेरी साधना मैं जानना चाहती हूँ (५) । मेरी साधना की विधि किस प्रकार की है और किस
१६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र प्रकार के पथ का अवलम्बन करना होगा या साधन करना होगा, उसका मन्त्र क्या है, अथवा ध्यान-पूजा आदि क्या है (६) ? हे देव-देव ! आप यह सब विशेष रूप से और सम्पूर्ण रूप में आद्योपान्त बताइए । इससे मेरो प्रसन्नता होगी और लोगों का हित होगा । हे शम्भो ! आपको छोड़कर कौन व्यक्ति संसार-रूपी व्याधि का निवा- रण करने में समर्थ होगा ? आप ही सद्-वैद्य और उपदेष्टा हैं (७) । पार्वती-पति देव-देव महा-देव ने पार्वती के ये वचन सुनकर प्रीति-पूर्वक कहा (८) । श्री सदाशिव ने कहा कि—हे महा-भागे ! हे देवि ! मनुष्य लोग तुम्हारी साधना द्वारा ब्रह्म-सायुज्य पा सकें, इसके लिए मैं तुम्हारी आराधना का विषय कहता हूँ, सुनो (६) । तुम साक्षात् परम ब्रह्म की परमा प्रकृति अर्थात् शक्ति हो। यह सारा जगत् तुम्हीं से उत्पन्न हुआ है। हे शिवे ! तुम सारे जगत् की जननी हो (१०) । हे भद्रे ! महत् तत्त्व से परमाणु तक और स्थूल सूक्ष्म सारा स्थावर- जङ्गम-स्वरूप जगत् तुम्हारे ही द्वारा उत्पन्न हुआ है । यह सारा जगत् तुम्हारे ही अधीन है (११) । तुम सबकी आद्या अर्थात् आदि-भूता हो । सारी विद्याएँ और हम सब तुम्हीं से उत्पन्न हुए हैं। सारे जगत् के सभी विषयों को तुम जानती हो । तुम्हें कोई नहीं जान सकता (१२) । तुम काली हो, तुम तारिणी हो, तुम दुर्गा हो, तुम षोडशी हो, तुम भुवनेश्वरी हो, तुम धूमावती हो, तुम बगला हो, तुम भैरवी हो, तुम छिन्न-मस्ता हो (१३) । तुम अन्नपूर्णा हो, तुम वाग्-देवी हो, तुम कमलालया लक्ष्मी हो, तुम सर्व-शक्ति-स्वरूपा हो, तुम सर्व-देव-मयी हो (१४) । तुम सूक्ष्मा हो, तुम स्थूला हो, तुम व्यक्त-स्वरूपा हो, तुम अव्यक्त-स्वरूपा हो, तुम निराकारा होकर भी साकारा हो । तुम्हें कोई भी नहीं जान सकता (१५) । तुम उपासकों के कार्य के लिए, जगत् के कल्याण के लिए और दानवादि के संहार के लिए समय-समय पर विविध प्रकार की देह धारण करती हो (१६) । तुम विश्व-रक्षा के लिए कभी चतुर्भुजा, कभी द्विभुजा, कभी षड्-भुजा, कभी अष्ट-भुजा होकर विविध प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करती हो (१७) । सभी तन्त्रों में उन्हीं विविध रूप-भेदों के विविध प्रकार के मन्त्र और विविध प्रकार के यन्त्रादि और विविध साधन बताए गए हैं। पशु, दिव्य और वीर—ये तीन प्रकार के भाव कहे गए हैं (१८) । कलियुग में पशु-भाव नहीं है, दिव्य भाव भी दुर्लभ है । कलियुग में वीर-साधन ही प्रत्यक्ष फल-दायक है (१६) । हे देवि ! कलियुग में कुलाचार के बिना सिद्धि नहीं हो सकती । अतएव सब प्रयत्न करके कुल-साधन करे (२०) । हे देवि ! कुलाचार द्वारा ब्रह्म- ज्ञान का जन्म होता है । जिस मनुष्य को ब्रह्म-ज्ञान होता है, वही जीवन्मुक्त है, इसमें सन्देह नहीं (२१) । शास्त्रों के ज्ञान द्वारा सभी वस्तुएँ पवित्र ज्ञात होती हैं और उसी ज्ञान द्वारा सभी वस्तुएँ अपवित्र प्रतीत होती हैं किन्तु जब ब्रह्म-ज्ञान प्राप्त होता है, तब कोई वस्तु पवित्र या अपवित्र नहीं रहती (२२) । जो यह जानता है कि परब्रह्म सर्व-व्यापी है, उसके लिए कौन वस्तु अपवित्र है ? कारण वह सारे जगत् को 'ब्रह्म' नाम से ही जानता है (२३) । हे देवेशि ! तुम सर्व-स्वरूपिणी हो और संसार-चक्र द्वारा क्रीड़ा करनेवाली हो तथा सबकी परम जननी हो । तुम्हारे परितुष्ट होने पर सभी का परितोष होता है (२४) । सृष्टि के आदि में तुम्हीं 'तमो' अर्थात् प्रकृति-रूप से विद्यमान रहती हो । तुम्हारा वही रूप वाणी और मन से अगोचर है । परब्रह्म को सिसृक्षा- सृष्टि करने की इच्छा से तुम्हारे द्वारा सारा जगत् उत्पन्न होता है (२५) । महत् तत्त्व से महा-भूत पृथिवी तक सारा जगत् तुम्हीं से सृष्ट होता है । सब कारणों का कारण हो, वह ब्रह्म निमित्त मात्र है (२६) । वह सत्-स्वरूप और सर्व-व्यापी है। सारे जगत् को वेष्टन कर अवस्थित रहता है, सभी वस्तुओं में वह सदा एक-रूप, परिणाम- रहित, चिन्मात्र और निर्लिप्त है (२७) । वह कोई कार्य नहीं करता, वह भक्षण करता नहीं, गमन करता नहीं ।
चौथा उल्लास : प्रकृति-साधना का उपक्रम | १७ किसी वस्तु-विशेष में उसका अवस्थान नहीं है। वह निष्क्रिय है। वह सत्य-स्वरूप है। वह आदि-अन्त से रहित है। वह वाणी और मन से अगोचर है (२८) । तुम परात्परा महा-योगिनी हो। तुम उस (ब्रह्म) की इच्छा मात्र का अवलम्बन कर इस चराचर जगत् की सृष्टि करती हो ओर इस जगत् का पालन करती हो तथा सर्वान्त में सारे जगत् का संहार करती हो (२६) । जगत् का संहारक महा-काल है, यह तुम्हारा ही एक रूप है। यही महा-काल महा-संहार के समय सब का ग्रास करता है (३०) । सब प्राणियों का 'कलन' अर्थात् ग्रास करता है, इसी से वह 'महा-काल' नाम से कहा जाता है। तुम महा-काल का कलन अर्थात् ग्रास करती हो, इसी से तुम्हारा नाम है आद्या परमा कालिका (३१) । तुम काल को ग्रास करती हो, इसी से तुम 'काली' हो। तुम सबकी आदि हो। तुम सबकी काल-स्वरूपा और आदि-भूता हो। इसी से तुमको संसार में 'आद्या काली' कहते हैं (३२) । सर्व-संहार-समय प्रलय-काल में तुम वाणी के अतीत, मन से अगम्य, तमोमय आकृति-रहित स्वरूप का अवलम्बन कर अकेली स्थित रहती हो (३३) । तुम साकारा होकर भी निराकारा हो। तुम माया द्वारा बहुत से रूप धारण करती हो, तुम सबको आदि हो, अनादि हो, कर्त्री, हर्त्री और पालिका हो (३४) । इसलिए हे भद्रे ! मैं तुमसे कहता हूँ कि ब्रह्म-मन्त्र में दीक्षित व्यक्ति जो फल प्राप्त करता है, वह तुम्हारे साधन द्वारा भी उसी फल को पा सकता है (३५) । हे देवि ! देश, काल और अधिकार-भेद से विविध आचारों और भावों को प्रकट करता हूँ। किसी-किसी तन्त्र में मैंने गुप्त साधन भी कहे हैं (३६) । उनमें से जिस साधन में जो मनुष्य अधिकारी है, वह उसके अनुरूप अनुष्ठान कर फल को प्राप्त करता है और पाप-रहित होकर भव-सागर को पार करता है (३७) । बहुत से जन्मों में अर्जित पुण्य के द्वारा जीव की प्रवृत्ति कुलाचार में होती है। कुलाचार द्वारा जिसकी आत्मा पवित्र होती है, वह साक्षात् शिव-मय होता है (३८) । जहाँ भोग का बाहुल्य है, वहाँ क्या योग की सम्भावना है ? जहाँ योग का अनुष्ठान है, वहाँ भोग की भी सम्भावना दिखाई नहीं देती। कुलाचार में प्रवृत्त जीव भोग और योग—इन दोनों का भोग करता है (३६) । हे सुव्रते ! जिस व्यक्ति द्वारा कुल-तत्त्व-ज्ञानी एक साधक की पूजा की जाती है, उसके द्वारा सभी देव एवं सभी देवियाँ पूजा पा जाती हैं, इसमें सन्देह नहीं (४०) । सोने से भरी हुई पृथिवी का दान करने से जो फल मिलता है, उससे कोटि गुना अधिक पुण्य कुलाचार-निरत एक व्यक्ति की पूजा करने से प्राप्त होता है (४१) । यदि चाण्डाल भी कुल-तत्त्व-ज्ञानी है, तो वह ब्राह्मण की भी अपेक्षा श्रेष्ठ है किन्तु यदि ब्राह्मण कुलाचार-हीन है, तो वह चाण्डाल से भी नीच है (४२) । मैं जानता हूँ कि कुल-धर्म की अपेक्षा कोई अन्य धर्म श्रेष्ठ नहीं है। यह जो कुल-धर्म है, इसके अनुष्ठान मात्र से मनुष्य लोग ब्रह्म-ज्ञानी हो जाते हैं (४३) । हे देवि ! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, तुम हृदय में इसे धारण कर लो। कुल-धर्म सब धर्मों की अपेक्षा उत्तम है, इससे श्रेष्ठ और कोई धर्म नहीं है (४४) । यही परम पथ है, पशु-समूह से गुप्त है। जब प्रबल कलिकाल होगा, तब शीघ्र ही यही पथ प्रकाशित हो उठेगा (४५) । मैं सत्य सत्य कहता हूँ, जब कलिकाल प्रकृष्ट रूप में वर्द्धित होगा, तब कौलाचारी मनुष्यों के सिवा पश्वाचारी लोग पृथिवी पर नहीं रहेंगे (४६) । हे वरारोहे ! जब देखना कि पृथिवी पर वैदिकी दीक्षा और पौराणिकी दीक्षा नहीं हैं, तभी समझना कि कलि प्रबल है (४७) । हे शान्ते शिवे ! जिस समय पाप-पुण्य की वेदोक्त परीक्षा नहीं रहेगी, तभी विवेचन करना कि कलि प्रबल है (४८) । हे कुलेश्वरि ! जिस समय गंगा कहीं छिन्न और कहीं भिन्न रूप में होंगी, तभी समझना कि कलि प्रबल है (४६) । हे महा-प्राज्ञे ! जिस समय म्लेच्छ जाति के लोग शासक होंगे और वे धन-लोलुप होंगे, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५०) । जिस समय स्त्रियाँ बहुत दुर्दान्त, कर्कश- भाषिणी और कलह-तत्परा होकर स्वामी की निन्दा करेंगी, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५१) । जिस समय फा० ३
१८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र पृथिवी पर मनुष्य लोग काम-किंकर और स्त्री के वशीभूत होकर गुरु, मित्र आदि की अवमानना करेंगे, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५२) । जब पृथ्वी कम फल देनेवाली होगी, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५३) । जिस समय भाई, स्वजन और मन्त्री लोग धन-लाभ की इच्छा से आपस में झगड़ा कर मार-पीट करने लगें, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५४) । जिस समय खुले स्थान में मद्य-मांस खाने में निन्दा हो, दण्ड-वर्जित हो और सभी लोग छिपकर सुरा-पान करें, तभी समझना कि कलि प्रबल है (५५) । सत्य, त्रेता और द्वापर युग में जिस प्रकार प्रकट रूप से मद्यादि सेवन किया जाता था, उसी प्रकार कलियुग में भी कुल-धर्मानुसार सेवन कर सकते हैं (५६) । जो लोग सत्य द्वारा पवित्र और जितेन्द्रिय होकर कुलाचार का अनुष्ठान करेंगे, जिनका आचार सर्वत्र व्यक्त रहेगा, जो दयालु होंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (५७) । जो गुरु की सेवा में लगे रहेंगे, जो माता के चरण-कमलों में भक्ति करेंगे, जो अपनी पत्नी में ही अनुरक्त रहेंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (५८) । जो सत्य-व्रत, सत्य-निष्ठ और सत्य-धर्म-परायण होकर, कुल-साधन को जो सत्य कहकर विश्वास रखेंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (५६) । जो कुल-धर्म की पद्धति के अनुसार शोधित मत्स्य, मांस, मद्य आदि सत्यवादी योगी को प्रदान करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (६०) । जो हिंसा और मात्सर्य से रहित होंगे, जो दम्भ और द्वेष से शून्य होंगे और जो कुल-धर्म-निष्ठ होंगे, कलि उन्हें पीड़ा नहीं दे सकेगा (६१) । जो कौलों का सत्संग करेंगे, कुल-साधुओं के पास निवास करेंगे, कुल-साधुओं की सेवा करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा नहीं दे सकेगा (६२) । जो कुल-धर्मावलम्बी कुलाचार से विचलित न होकर विविध वेश धारण करते हुए कुलाचार-क्रम से तुम्हारी पूजा करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा न दे सकेगा (६३) । जो कुलाचार के अनुसार स्नान, दान, तपस्या, तीर्थ- दर्शन, व्रत और तर्पण करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा न दे सकेगा। (६४) । जो कुलाचार के अनुसार गर्भाधान आदि संस्कार में संस्कृत होकर पितृ-श्राद्ध आदि कर्म करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा न दे सकेगा (६५) । जो भक्तिपूर्वक कुल-तत्त्व और कुल-द्रव्य का अर्चना करेंगे और कुल-योगी को नमस्कार करेंगे, उन्हें कलि पीड़ा न दे सकेगा (६६) । कुटिलता और मिथ्याचार-विहीन, निर्मल अन्तःकरण वाले कुल-मार्गानुसारी और परोपकार व्रत में दीक्षित—ऐसे साधुजनों का कलि दास के समान रहेगा (६७) । हे प्रिये ! कलि के दोष-समूह के बीच एक प्रधान गुण भी है कि सत्य-प्रतिज्ञ कौलिक लोगों को सङ्कल्प मात्र से श्रेय प्राप्त होता है (६८) । हे देवि ! अन्य युग में मनुष्यों के पाप-पुण्य मानसिक होते थे अर्थात् सङ्कल्प द्वारा होते थे किन्तु कलियुग में केवल मानसिक पुण्य होता है, पाप नहीं होता (६६) । जो सदा मिथ्या बोलते हैं, जो दूसरों का अनिष्ट करने में लगे रहते हैं, कुलाचार- विहीन हैं—वे सब मनुष्य कलि के किङ्कर होते हैं (७०) । जो कुल-मार्ग में भक्ति नहीं रखते, जो पराई स्त्रियों में आसक्त रहते हैं और जो कुलाचार में लगे व्यक्तियों से द्वेष करते हैं, उन्हें कलि का दास जानना चाहिए (७१) । हे पार्वति ! हे भद्रे ! युगाचार के प्रसङ्ग में तुम्हारी प्रसन्नता के लिए संक्षेप में कलि की प्रबलता के लक्षण कहे गए (७२) । हे देवि ! इस कलि के प्रबल होने पर सभी धर्म दुर्बल हो जायेंगे किन्तु एकमात्र ‘सत्य’ ही रहेगा । अतएव ‘सत्य’-मय होना ही सबका कर्तव्य है (७३) । हे सुव्रते ! ‘सत्य’-धर्म का आश्रय लेकर मनुष्य जो कर्म करेगा, वही कर्म सफल होगा, यही सत्य जाने (७४) । सत्य की अपेक्षा और कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं है, मिथ्या के समान पाप-कार्य और कुछ नहीं है। अतएव मनुष्य का यही कर्तव्य है कि सभी अवस्थाओं में एकमात्र ‘सत्य’ का अवलम्बन करे (७५) । क्षार-भूमि में जिस प्रकार बीज का बोना निष्फल होता है, उसी प्रकार ‘सत्य’- हीन पूजा व्यर्थ होती है, ‘सत्य’-हीन जप व्यर्थ होता है और सत्य’-हीन तपस्या भी व्यर्थ होती है (७६) । ‘सत्य’- रूप ही परम ब्रह्म है, ‘सत्य’ ही परम तपस्या-रूप है, सारी क्रियायें ‘सत्य’-मूलक हैं, ‘सत्य’ से श्रेष्ठ और कुछ
चौथा उल्लास : प्रकृति-साधना का उपक्रम । १६ नहीं है (७७) । अतएव मैंने कहा है कि पाप-मय कलि के प्रबल होने पर 'सत्य' का अवलम्बन कर प्रकट रूप से 'कुलाचार' का अनुष्ठान करे (७८) । गोपन करने से 'सत्य' की हानि होती है। मिथ्या बोले बिना गोपन करना सम्भव नहीं होता। अतएव कौलिक व्यक्ति प्रकट भाव से कुल-साधन करे (७६) । मैंने पहले कुल-तन्त्र में कहा है कि कुल-धर्म की रक्षा के लिए मिथ्या बोलना निन्दित नहीं है किन्तु कलि की प्रबलता होने पर यह उपदेश प्रशस्त नहीं है (८०) । सत्य-युग में चतुष्पाद अर्थात् परिपूर्ण धर्म था। त्रेता-युग में उसका एक पद कम होकर वह त्रि-पाद रह गया। द्वापर-युग में धर्म द्वि-पाद मात्र रहता है। कलि-युग में उसी धर्म का केवल एक पाद शेष रहता है (८१) । धर्म का वह एक पाद भी 'तपस्या' और 'दया'-रूप दो अंशों से भग्न हो जाता है, एकमात्र 'सत्य'-अंश ही दृढ़ रहता है। इस समय वह 'सत्य'-रूप पाद भग्न करने से धर्म का लोप हो जायगा (८२) । हे कुलेश्वरि ! इसी कारण 'सत्य' का सम्यक्-रूप से अवलम्बन करके ही सारे कार्य सम्पन्न करने चाहिए। इस कलि-काल में 'कुला- चार' को छोड़कर अन्य उपाय नहीं है। इस कलि-काल में यदि मिथ्या आचार में प्रवेश करता है, तो कभी मुक्ति नहीं मिलेगी। अतएव सर्वतोभाव से 'सत्य' द्वारा पवित्रात्मा होकर, मेरे द्वारा बताए मार्ग के अनुसार मनुष्य लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रम के उपयोगी दीक्षा, पूजा, जप, होम, पुरश्चरण, तर्पण आदि सारे कर्मों का आचरण करें (८३-८५) । विशेष कर इस रूप में व्रत, उद्वाह, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जात-कर्म, नाम-करण, चूडाकरण, अन्त्येष्टि-क्रिया, पितृ-श्राद्ध आगम-सम्मत ही करे। तीर्थ-श्राद्ध, वृषोत्सर्ग, शारदोत्सव, यात्रा, गृह- प्रवेश, नूतन वस्त्रालङ्कारादि परिधान, वापी, कूप, गृहारम्भ और गृह-प्रतिष्ठा, देवता-स्थापन, दिवा-कृत्य, रात्रि- कृत्य, पर्व-कृत्य, मास-कृत्य, ऋतु-कृत्य, वर्ष-कृत्य, नित्य-नैमित्तिक कर्म, कर्त्तव्य कर्म, अकर्त्तव्य कर्म, त्याज्य कर्म, ग्राह्य कर्म—इन सबका निर्दिष्ट विधान के अनुसार ही साधन करे (८६-६१) । यदि कोई व्यक्ति मोह, दुर्बुद्धि या अश्रद्धा के वश में होकर उक्त सब कर्मों को निर्दिष्ट विधि से नहीं करता, तो वह सब कर्मों से बहिष्कृत होकर अन्त में विष्ठा में कृमि का जन्म ग्रहण करता है (६२) । हे महेश्वरि ! कलि-युग के प्रबल होने पर यदि कोई मेरे मत को छोड़कर कर्म करता है, तो वह कर्म उल्टा फल देनेवाला होगा (६३) । हे देवि ! मेरे मत से असम्मत दीक्षा साधक को प्राण-घातिनी होगी और भस्म में आहुति देने के समान उसकी पूजा भो निष्फल होगी (६४) । देवता उसके प्रति क्रुद्ध होंगे और पद-पद पर उसे विघ्न होंगे (६५) । हे अम्बिके ! कलिकाल के प्रबल होने पर जो व्यक्ति मेरे कहे शास्त्र को जानते हुए भी अन्य पथ के अनुसार कर्म करेगा, वह महा-पापी होगा (६६) । हे जो व्यक्ति अन्य पथ का अवलम्बन कर व्रत या विवाह करेगा, वह जब तक चन्द्र-सूर्य रहेंगे, तब तक नरक में रहेगा (६७) । अन्य मत से उपनयन होने से ब्रह्म-हत्या का पाप होगा। जिसका उपनयन होगा, वह व्रात्य होगा। वह व्यक्ति केवल सूत्र-वाही होगा और चाण्डाल की भी अपेक्षा अधम होगा (६८) । कुल-नायिके ! अन्य पद्धति के अनुसार जो नारी विवाहिता होगी, वह निन्दिता होगी और विवाह करनेवाला पुरुष भी उसके संसर्ग से पापी होगा, यह जानना उचित है (६६) । उस प्रकार विवाहिता स्त्री-गमन से पुरुष को दिन-दिन वेश्यागमन-जनित पाप होगा। देवता उस नारी के हाथ का अन्न-जलादि ग्रहण न करेंगे (१००) । पितृ लोग भी उसे नहीं खाएँगे-पिएँगे क्योंकि वह मल-मूत्र-समान है। उस स्त्री-पुरुष की जो सन्तान होगी, वह सर्व-धर्म-बहिष्कृत होगी (१०१) । अतः अशााम्भव शास्त्र अर्थात् तन्त्र से भिन्न शास्त्र द्वारा देव-कर्म, पितृ-कर्म और कुलाचार-कर्म में उसे अधिकार न होगा। अशााम्भव अर्थात् तन्त्र- भिन्न शास्त्र की पद्धति से देव-मूर्ति की स्थापना करने से, उस मूर्ति में देवता का सान्निध्य नहीं होगा। उससे इह-लोक या परलोक में कोई फल नहीं मिलेगा। उससे केवल शरीर-कष्ट और धन-नाश ही होगा (१०२-१०३) ।
२० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र जो व्यक्ति आगमोक्त विधि को छोड़कर श्राद्ध करेगा, उसका वह श्राद्ध निष्फल होगा और श्राद्ध-कर्त्ता पितृ-लोगों के साथ नरक को जायगा (१०४) । उसके द्वारा दिया हुआ जल रक्त-समान और पिण्ड मल-मय होगा। अतएव मनुष्यों को सर्वतोभाव से शङ्कर द्वारा प्रदर्शित मत का आश्रय करना ही कर्त्तव्य है (१०५) । हे देवि ! यह अधिक और क्या कहूँ, मैं सत्य-सत्य कहता हूँ कि शिव से असम्मत जो भी कर्म होंगे, वे सब निष्फल होंगे (१०६)। जो शम्भु-प्रोक्त आचार से हीन हैं, उनके उन कर्मों से धर्म होना तो दूर रहा, उनका पूर्व-सञ्चित धर्म भी नष्ट हो जायगा और नरक से उनका उद्धार नहीं होगा (१०७) । हे महेशानि ! मेरे द्वारा कही पद्धति के अनुसार जो नित्य, नैमित्तिक कर्म का साधन है, वही तुम्हारा साधन होगा (१०८) । उनके बीच कलि-रूप रोग का ओषधि-स्वरूप बहु-विध मन्त्र और यन्त्रादि-संयुक्त तुम्हारी विशेष आराधना मैं बताता हूँ, सुनो (१०६) । • — • पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार श्री सदाशिव ने कहा—तुम आद्या और परमा शक्ति हो । तुम सर्व-शक्ति-स्वरूपा हो । तुम्हारी शक्ति के प्रभाव से मैं सृष्टि, स्थिति और प्रलयादि नाश-कार्य में समर्थ होता हूँ (१) । तुम्हारे विविध वर्ण और विविध आकार और बहु प्रयासवाली साधनाओं के अनन्त रूप हैं। कौन व्यक्ति उन सब रूपों का वर्णन कर सकता है (२) । तुम्हारी कृपा से कुल-तन्त्र आदि एवं आगम-समूह में तुम्हारी उन्हीं सब रूपों की पूजा और साधन को मैंने यथा-मति कहा है (३) । किन्तु इस गुप्त साधन को कहीं प्रकट नहीं किया है। हे कल्याणि ! इस गुप्त साधन के प्रभाव से मेरे प्रति तुम्हारी ऐसी कृपा हुई है (४) । हे प्रिये ! इस समय तुम्हारे द्वारा पूछे जाने पर मैं गोपन करने में समर्थ नहीं हूँ। अतएव वह मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय होने पर भी उसे तुम्हारी प्रसन्नता के लिए कहता हूँ (५) । यह गुप्त साधन सब दुःखों को शान्त करनेवाला, सब विपत्तियों को नष्ट करनेवाला है, तुम्हें सन्तुष्ट करनेवाला और शीघ्र ही तुम्हें प्राप्त करानेवाला है (६) । हे प्रिये ! कलि-काल में कलि के पापों द्वारा व्याकुल और अधिक परिश्रम करने में असमर्थ मनुष्य लोगों के लिए यह गुप्त साधन परम धन है (७) । इस गुप्त साधन में न्यासों का आधिक्य नहीं है, उपवास आदि संयम नहीं है। यह साधन सुख-साध्य और संक्षिप्त है। भक्तों को यह चतुर्वर्ग के फल का देनेवाला है, अतः यही श्रेष्ठ है (८) । हे देवेशि शिवे ! मैं पहले इस विषय में मन्त्रोद्धार का क्रम कहता हूँ, सुनो। मनुष्य लोग इसके सुनने मात्र से जीवन्मुक्त हो जाएँगे (६) । हे प्रिये ! 'तजस' अर्थात् रेफ में आरूढ़ 'प्राणेश' अर्थात् हकार में 'भेरूण्डा' अर्थात् 'ई' का योग कर उनमें 'व्योम-बिन्दु' अर्थात् अनुस्वार शोभित कर 'ह्रीं' बीज का उद्धार कर दूसरे बीज का उद्धार करे (१०)। 'सन्ध्या' अर्थात् 'श' 'रक्त' अर्थात् 'र' के ऊपर आरोहण करे, उनमें 'वाम नेत्र' अर्थात् 'ई' और 'इन्दु' अर्थात् अनुस्वार योग करने से दूसरा मन्त्र 'श्रीं' होगा। हे कल्याणि ! इसके बाद तीसरा मन्त्र सुनो प्रजापति (क), दीप (रेफ) के ऊपर रहे (११) । उनमें गोविन्द (ई) और बिन्दु (अनुस्वार) का संयोग करे। यह 'क्रीं' बीज साधकों को सुख देनेवाला है। इन तीन बीजों के बाद 'परमेश्वरि !' यह सम्बोधन-पद है (१२) । इस मन्त्र के शेष भाग में 'वह्नि-कान्ता' अर्थात् 'स्वाहा' यह पद है।
पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार । २१ हे शिवे ! यह दश अक्षर वाला (ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा) मन्त्र कहा गया। सर्व-विद्या-स्वरूपा, उक्त मन्त्रात्मिका देवी परमेश्वरी विद्या है (१३) । श्रेष्ठ साधक 'सर्वाभीष्ट-सिद्धि' के लिए आद्य तीन बीजों में से एक-एक बीज का अथवा तोनों बीजों का जप करते हैं (१४) । पहले तीन बीजों (ह्रीं श्रीं क्रीं) को छोड़ने से उक्त दशाक्षर मन्त्र 'परमेश्वरि स्वाहा'- सात अक्षर वाले इस मन्त्र में बदल जाता है। सप्ताक्षर मन्त्र के पहले काम-बीज (क्लीं), वाग्-बीज (ऐं) और तार (ॐ) के जोड़ने से तीन प्रकार के अष्टाक्षर मन्त्र बनते हैं। यथा— १ क्लीं परमेश्वरि स्वाहा, २ ऐं परमेश्वरि स्वाहा और ३ ॐ परमेश्वरि स्वाहा (१५) । पूर्वोक्त दशाक्षर-मन्त्र के सम्बोधन-पद के अन्त में 'कालिके' इस पद का उच्चारण करे । उसके बाद आदि के बीज-त्रय (ह्रीं श्रीं क्रीं, का उच्चारण कर वह्नि-वधू (स्वाहा) पद कहे (१६) । इस प्रकार 'ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके ह्रीं श्रीं क्रीं स्वाहा' यह सोलह वर्णों वाला मन्त्र 'षोडशी' नाम से प्रख्यात होकर सभी तन्त्रों में गुप्त है। उक्त 'षोडशी' मन्त्र के आदि में वधू (स्त्रीं) अथवा प्रणव (ॐ) का योग करने से दो सप्त-दशाक्षर मन्त्र होते हैं। यथा—१ स्त्रीं ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके ह्रीं श्रीं क्रीं स्वाहा, २ ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके ह्रीं श्रीं क्रीं स्वाहा (१७) । हे प्रिये ! तुम्हारे कोटि-कोटि अर्बुद मन्त्र हैं अतएव असंख्य मन्त्र हैं। यहाँ संक्षेप में बारह मन्त्र कहे हैं (१८) । जिस-जिस तन्त्र में जो-जो मन्त्र कहे हैं, वे सभी तुम्हारे मन्त्र हैं क्योंकि तुम्हीं आद्या प्रकृति हो (१६) । इन सभी मन्त्रों के साधन का प्रकार एक हो है, मैं जगत् के हित और तुम्हारी प्रसन्नता के लिए उस साधन को बताता हूँ (२०) । हे देवि ! कुलाचार के बिना शक्ति-मन्त्र सिद्धि-प्रद नहीं होता। अतएव कुलाचार में तत्पर होकर शाक्त-साधन करना चाहिए (२१) । हे आद्ये ! शक्ति-पूजा के विधान में मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन—ये पञ्च-तत्त्व कहे हैं (२२) । पञ्च-तत्त्व से रहित पूजा करने से वह अभिचार का कारण अर्थात् प्राण- घातक हो उठती है। उससे साधक को इष्ट-सिद्धि होती नहीं और पग-पग पर विघ्न होता है (२३) । पत्थर के ऊपर अन्न बोने से जिस प्रकार अंकुर नहीं निकलता, उसी प्रकार पञ्च-तत्त्व-विहीन पूजा से फल नहीं मिलता (२४) । हे देवि ! प्रातः-कृत्य न करने से कर्म में अधिकार नहीं होता, अतः सबसे पहले यथोचित प्रातः- कृत्य बताता हूँ (२५) । रात्रि के अन्तिम प्रहर के शेषार्द्ध को 'अरुणोदय' काल कहते हैं। उसी समय निद्रा छोड़कर साधक उठ जाय और अपने मस्तक में श्वेत कमल में बैठे हुए दो हाथ वाले, द्वि-नेत्र गुरुदेव का ध्यान करे (२६,— ध्याये शिरसि शुक्लाब्जे द्वि-नेत्रं द्वि-भुजं गुरुं । श्वेताम्बर परीधानं श्वेत-माल्यानुलेपनम् ।। वराभय-करं शान्तं करुणामय-विग्रहं । वामेनोत्पल-धारिण्या शक्त्यालिङ्गित-विग्रहम् ।। श्वेताननं सुप्रसन्नं साधकाभीष्ट-दायकम् ।। वे श्वेत वस्त्र पहने हैं, श्वेत माला से युक्त हैं, श्वेत चन्दन लगाए हैं और एक हाथ से वर तथा एक हाथ से अभय दे रहे हैं। वे शान्त और करुणामय शरीरवाले हैं अर्थात् उनके शरीर को देखने से ही प्रतीत होता है कि वे दयालु हैं (२७) । उनके बाईं ओर उनकी शक्ति कमल लिए हैं और उनके शरीर का आलिङ्गन किए हैं (२८) । उनका मुख कुछ हँसो से युक्त है, वे अति प्रसन्न हैं और साधु जनों को अभीष्ट वर प्रदान करते
२२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र हैं। हे कुलेश्वर ! मन्त्र-साधक व्यक्ति इस प्रकार ध्यान कर, मानसिक उपचारों से उनकी पूजाकर गुरु-मन्त्र श्रेष्ठ वाग्भव-बीज (ऐं) का जप करे (२६)। सुबुद्धि व्यक्ति इस प्रकार यथा-शक्ति जप कर गुरुदेव के दाएँ हाथ में अपने जप को समर्पित कर निम्न मन्त्र का पाठ करते हुए उन्हें प्रणाम करे (३०)— भव-पाश-विनाशाय ज्ञान-दृष्टि-प्रदर्शिने। नमः सद्-गुरवे तुभ्यं भुक्ति-मुक्ति-प्रदायिने। नराकृति-परब्रह्म-रूपायाज्ञान-हारिणे। कुल-धर्म-प्रकाशाय तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ अर्थात् संसार के बन्धन को नष्ट करने के लिए आपने ज्ञान-दृष्टि को खोल दिया है और आप भोग एवं मोक्ष को प्रदान करते हैं। अतएव आप सद्-गुरु हैं। आपको नमस्कार (३१)। जो मनुष्य-रूप होकर भी परम ब्रह्म-स्वरूप हैं, जो अज्ञान को विनष्ट करनेवाले हैं और कुल-धर्म के प्रकाश करनेवाले हैं, उन श्रीगुरुदेव को नमस्कार (३२)। इस प्रकार गुरुदेव को प्रणाम कर अपने देवता का ध्यान करे। फिर पूर्ववत् अर्थात् मानस उपचारों से अपने देवता की पूजा कर मूल-मन्त्र का जप करे (३३)। यथा-शक्ति जपकर देवी के बाएँ हाथ में जप को समर्पित करे और निम्न मन्त्र से ज्ञानी व्यक्ति इष्ट-देवता को नमस्कार करे— नमः सर्व-स्वरूपिण्यै जगद्धात्र्यै नमो नमः । आद्यायै कालिकायै ते कत्र्र्यै हत्र्र्यै नमो नमः ॥ अर्थात् तुम सर्व-स्वरूपिणी हो, तुम्हें नमस्कार । तुम जगद्धात्री हो, तुम्हें बार-बार नमस्कार। तुम जगत् की सृष्टि और संहार करनेवाली हो, हे आद्या कालिके ! तुम्हें बार-बार नमस्कार (३४-३५)। इस प्रकार इष्ट-देवता को प्रणाम कर पहले बायाँ पैर रखकर बाहर निकले। फिर मल-मूत्र त्याग कर दन्त-धावन करे (३६)। फिर जलाशय के पास जाकर पहले आचमन करे। तब जल में प्रवेश करे (३७)। नाभि तक गहरे जल में खड़े होकर शरीर के मैल को दूर करने के लिए एक बार स्नान कर—डुबकी लगाकर मन्त्राचमन करे (३८)। साधक-श्रेष्ठ कुल-साधक निम्न मन्त्रों से तीन बार जल पिये— १ आत्म-तत्वाय स्वाहा, २ विद्या-तत्वाय स्वाहा, ३ शिव-तत्वाय स्वाहा। फिर ओष्ठाधर के मार्जन के लिए दो बार आचमन करे (३६)। सुधी व्यक्ति जल में त्रिकोण कुल-यन्त्र को लिखकर उसके मध्य में मूल-मन्त्र को लिखे। हे प्रिये ! उसके ऊपर बारह बार मूल-मन्त्र का जप करे (४०)। फिर साधक उस मन्त्र-पूत जल को तेजो रूप भावना कर सूर्यदेव के लिए तीन अञ्जलि जल देकर, उसी जल से तीन बार अपने मस्तक को अभिषिक्त कर मुख, दोनों नासिकाओं, दोनों कानों और दोनों आँखों इन सात छिद्रों को अपनी अँगुलियों से बन्द करे (४१)। तदनन्तर देवता की प्रसन्नता के लिए जल में तीन बार डुबकी लगाकर बाहर निकले और शरीर पोंछकर दो शुद्ध वस्त्र अर्थात् उत्तरीय और परिधेय वस्त्र पहने (४२)। इसके बाद गायत्री से शिखा-बन्धन कर मिट्टी या भस्म द्वारा अपने ललाट में विन्दु-युक्त त्रिपुण्ड्र-तिलक धारण करे (४३)। फिर साधक क्रमशः वैदिकी और तान्त्रिकी सन्ध्या करे। तान्त्रिकी सन्ध्या बताता हूँ, सुनो (४४)। हे शिवे ! जल द्वारा पूर्ववत् मन्त्रों से आचमन कर निम्न मन्त्र से तीर्थों का आवाहन करे (४५)— ॐ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति ! नर्मंदे सिन्धु कावेरि ! जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥ अर्थात् हे गंगे ! हे यमुने ! हे गोदावरि ! हे सरस्वति ! हे नर्मदे ! हे सिन्धु ! हे कावेरि ! तुम इस जल में सन्निहित हो जाओ (४६)।
पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार | २३ बुद्धिमान व्यक्ति इस मन्त्र का पाठ करता हुआ अंकुश मुद्रा द्वारा जल में तोर्थों का आवाहन करे और आवाहित तीर्थ-जल के ऊपर बारह बार मूल-मन्त्र का जप करे (४७) । फिर मूल-मन्त्र का उच्चारण करते हुए उसी जल से मध्यमा-अनामा अँगुंलियों से भूमि पर तीन बार जल-विन्दु छिड़के (४८) । इसी प्रकार जल-विन्दुओं से अपना मस्तक अभिषिक्त करे । फिर कुछ जल बाईं हथेली में लेकर, दाएँ हाथ से उसे ढँक ले (४६) । बाएँ हाथ के उस जल के ऊपर ईशान-बीज (हं), वायु-बीज (यं), वरुण-बीज (वं), वह्नि-बीज (रं), इन्द्र-बीज (लं)— इन पाँच बीजों को चार बार जप कर उस जल को दाईं हथेली में ले ले (५०)। फिर साधक उस जल का दर्शन कर उसे तेजोमय भावना करता हुआ इड़ा (बाईं नासिका) द्वारा उसे आकृष्ट कर उस जल के साथ शारीरिक और मानसिक पापों को पिंगला नामक नाड़ी (दाईं नासिका) से निकाल दे (५१) । इस प्रकार साधक पापों को निकालकर ‘फट्’ मन्त्र का उच्चारण करता हुआ उस जल को अपने सामने कल्पित वज्र-शिला के ऊपर तीन बार ताड़ित कर दोनों हाथ धो डाले (५२) । तब आचमन कर निम्न मन्त्र द्वारा सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे— ॐ ह्रीं घृणि सूर्य ! इदमर्घ्यं तुभ्यं स्वाहा तार (ॐ), माया (ह्रीं), इनके बाद ‘घृणि सूर्य’, फिर ‘इदमर्घ्यं तुभ्य स्वाहा’ पद का उच्चारण करते हुए अर्घ्य प्रदान करे (५३-५४) । तदनन्तर प्रातःकाल, मध्याह्न-काल एवं सन्ध्या-काल में गुण-तारतम्य के अनुसार त्रि-रूपिणी परमदेवता महा-देवी गायत्री का ध्यान करे (५५) । यथा— प्रातर्ब्राह्मीं रक्त-वर्णां द्वि-भुजां च कुमारिकाम् । कमण्डलुं तोर्थ-पूर्णमच्छ-मालां च विभ्रतीम् ॥ कृष्णाजिनाम्बर-धरां हंसारूढां शुचि-स्मिताम् ॥१ मध्याह्ने तां श्याम-वर्णां वैष्णवों च .चतुर्भुजाम् । शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-धारिणीं गरुडासनाम् ॥ पीनोत्तुङ्ग-कुच-द्वन्द्वां वन-माला-विभूषिताम् । युवतीं सततं ध्यायेन्मध्ये मार्तण्ड-मण्डले ॥२ सायाह्ने वरदां देवी गायत्रीं संस्मरेद् यतिः । शुक्लां शुक्लाम्बर-धरां वृषासन-कृताश्रयाम् ॥ त्रि-नेत्रां वरदां पाशं शूलं च नृ-करोटिकाम् । विभ्रतीं कर-पद्मैश्च वृद्धां गलित-यौवनाम् ॥३ अर्थात् प्रातःकाल रक्त-वर्णा, द्विभुजा, कुमारी, तीर्थोदक-पूर्ण कमण्डलु एवं निर्मल माल्य-धारिणी, कृष्णाजिन-परिधाना, हंसारूढ़ा एवं विशुद्ध स्मित-शोभिता ब्राह्मी—ब्रह्म-शक्ति का ध्यान करे (५६) । मध्याह्न-काल में श्याम-वर्णा, चतुर्भुजा, शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-धारिणी, गरुडासना, युवती, पीन व उच्च- स्तनी, वन-माला-विभूषिता वैष्णवी शक्ति को निरन्तर रवि-मण्डल में ध्यान करे (५७-५८) । सायं-काल में जितेन्द्रिय व्यक्ति शुक्ल-वर्णा, शुक्ल-वस्त्र-परिधाना, वृषासन पर बैठी हुई, त्रिनेत्रा, चार कर-कमलों में वर-पाश-शूल और नर-कपाल-धारिणी, वृद्धा एवं विगत-यौवना वरदा गायत्री देवी का स्मरण करे (५६-६०) । इस प्रकार ध्यान कर महा-देवी को तीन अञ्जलि जल देकर सौ बार या दस बार गायत्री-मन्त्र का जप करे (६१) । हे देवेशि ! मैं तुम्हारे लिए गायत्री मन्त्र बताता हूँ, सुनो। पहले ‘आद्यायै’ पद का उच्चारण कर फिर ‘विद्महे’ इस पद का उच्चारण करे (६२) । फिर ‘परमेश्वर्यै धीमहि तन्नः काली प्रचोदयात्’ यह कहे । अर्थात् पूरा गायत्री-मन्त्र है—आद्यायै विद्महे परमेश्वर्यै धीमहि तन्नः काली प्रचोदयात् । इस मन्त्र का अर्थ है कि हम आद्या परमेश्वरी को प्राप्त करने के लिए जिनका ध्यान करते हैं और जिनमें
२४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र पूर्ण रूप से विश्वास रखते हैं, वे ही जगत्-कारण-स्वरूपा काली हम लोगों को धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष में तत्पर करें । महा-पाप की ध्वंस-कारिणी यह गायत्री मैने तुम्हें बताई है (६३) । हे भद्रे ! जो तीनों सन्ध्याओं में इसका जप करते हैं, उन्हें नित्य त्रि-सन्ध्या करने का फल मिलता है । इसके बाद देव, ऋषि, पितृ-गण एवं इष्ट-देवता का तर्पण करे (६४) । पहले प्रणव का उच्चारण कर, द्वितीयान्त उन-उनके नाम का उच्चारण करते हुए अन्त में 'तर्पयामि नमः' इस पद का उच्चारण करे । शक्ति- विषय में अर्थात् इष्ट-देवता के तर्पण में प्रणव के स्थान पर माया-बीज (ह्रीं) और 'नमः' के स्थान पर 'द्विठ' अर्थात् 'स्वाहा' का योग करे (६५) । मूल-मन्त्र (स्त्रीं ह्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा) के बाद 'सर्व-भूत', यह पद, उसके बाद 'निवासिन्यै' यह पद कहे । फिर 'स्व-स्वरूपायै' यह पद कहकर 'सायुधायै' यह पद पढ़े (६६) । तदनन्तर 'सावरणायै परात्परायै आद्यायै कालिकायै' इस पद का उच्चारण कर 'इदमर्घ्यं स्वाहा' यह कहे । सुधी व्यक्ति इसी मन्त्र द्वारा महा- देवी को अर्घ्य दे और तब यथा-शक्ति मूल-मन्त्र का जप कर देवी के बाएँ हाथ में जप का समर्पण करे (६७) । फिर साधक देवी की प्रणाम-पूजा के लिए जल ग्रहण एवं तीर्थ को नमस्कार कर स्तव-पाठ करते-करते और इष्ट-देवता के ध्यान में तत्पर होकर याग-मण्डप में आकर हाथ-पैर का शोधन करे । तदनन्तर द्वार-देश के सामने सामान्यार्घ्य का स्थापन करे (६८-७०) । यथा— ज्ञानवान् व्यक्ति एक त्रिकोण, उसके बाहर एक गोलाकार-मण्डल, उसके बाहर एक चतुष्कोण मण्डल बना कर उसमें 'ॐ आधार-शक्तये नमः' इस मन्त्र से गन्ध-पुष्प द्वारा आधार-शक्ति की पूजा कर उस पर आधार स्थापित करे (७१) । फिर 'फट्' मन्त्र से पात्र को धोकर उक्त आधार पर रखे और 'नमः' मन्त्र से उसे जल से पूर्ण करे । तब उसमें गन्ध-पुष्प छोड़कर सब तीर्थों का उसमें आवाहन करे (७२) । आधार पर अग्नि का, पात्र में सूर्य-मण्डल का और जल में चन्द्र-मण्डल की पूजा कर दस बार माया-बीज (ह्रीं) के जप द्वारा उस जल को पवित्र करे (७३) । तब उसके ऊपर धेनु-मुद्रा और योनि-मुद्रा दिखाए । इसे ही 'सामान्यार्घ्य' कहते हैं । फिर उक्त-जल और पुष्प द्वारा द्वार-देवताओं की पूजा करे (७४) । इन द्वार-देवताओं में गणेश, क्षेत्रपाल, वटुक, योगिनी, गङ्गा, यमुना, लक्ष्मी और सरस्वती का पूजन क्रमशः निम्न मन्त्रों से करे (७५)— गं गणेशाय नमः । क्षं क्षेत्रपालाय नमः । वं वटुकाय नमः । यां योगिन्यै नमः । गां गङ्गायै नमः । यां यमुनायै नमः । श्रीं लक्ष्म्यै नमः । ऐं सरस्वत्यै नमः । इसके बाद ज्ञानी व्यक्ति द्वारस्थ चतुष्काष्ठ (चौखट) के बाईं ओर के काष्ठ को कुछ छूते हुए, बायाँ पैर आगे बढ़ाकर, भगवती के चरण-कमलों को स्मरण करते हुए पूजा-गृह में प्रवेश करे (७६) । फिर पूजा-गृह के मध्य में नैऋत्य-कोण में निम्न मन्त्रों से गन्ध-पुष्प द्वारा वास्तु-पुरुष, ईश और ब्रह्मा का अर्चन करे— ॐ वास्तु-पुरुषाय नमः । ॐ ईशाय नमः । ॐ ब्रह्मणे नमः । तदनन्तर सामान्यार्घ्य जल से याग-मन्दिर को प्रोक्षित करे (७७) । फिर साधक-श्रेष्ठ एकटक दृष्टि से ऊपर की ओर देखकर सभी दिव्य विघ्नों को दूर करने की भावना करे और 'फट्' मन्त्र से जल फेंककर आकाश- सम्बन्धी सभी विघ्न दूर करे (७८) । तब तीन बार पैर के तलवे के किनारे से पृथ्वी पर आघात कर भूमि- सम्बन्धी विघ्नों के दूर करने की भावना करे । पूजा-गृह को चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कपूर द्वारा सुगन्धित करे । अपने बैठने के लिए त्रिकोण-गर्भ चतुष्कोण-मण्डल बनाकर उसमें 'कामरूपाय नमः' मन्त्र से काम-रूप की पूजा करे (७९-८०) । उसी मण्डल के ऊपर आसन बिछाकर काम-बीज (क्लीं) का उच्चारण कर 'आधार-
पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार । २५ शक्तये कमलासनाय नमः' इस मन्त्र से आसन की पूजा करे (८१)। धर्मज्ञ साधक पूर्व या उत्तर-मुख होकर वीरासन से उस पूजित आसन पर बैठकर विजया का शोधन करे (८२)। यथा— तार (ॐ) और माया-बीज (ह्रीं) का उच्चारण कर 'अमृते अमृतोद्भवे अमृत-वर्षिणि अमृतमाकर्षया- कर्षय सिद्धिं देहि कालिकां मे वशमानय स्वाहा ।'—यही सम्बिदा के शोधन का मन्त्र है (८३-८४)। फिर उस विजया के ऊपर सात बार मूल-मन्त्र का जप कर आवाहनी, स्थापनी, सन्निधापनी, सन्निरोधिनी, सम्मुखी- करणी, धेनु और योनि-मुद्रायें दिखाये। जिस प्रकार संकेत-मुद्रा अर्थात् गुरुपदिष्ट तत्त्व-मुद्रा द्वारा सहस्रार-पद्म में विजया द्वारा तीन बार गुरु का तर्पण करे, उसी प्रकार मूल-मन्त्र का उच्चारण कर हृदय में तीन बार देवी का तर्पण करे (८५-८६)। फिर वाग्भव (ऐं) के बाद 'वद वद', उसके बाद 'वाग्वादिनि' यह पद, तब 'मम जिह्वाग्रे स्थिरीभव सर्व-सत्त्व-वशङ्करि स्वाहा'—इस मन्त्र का पाठ कर कुण्डली के मुख में विजया द्वारा आहुति दे (८७)। उक्त प्रकार विजया ग्रहण कर बाएँ कान के ऊपर श्री गुरु को, दाएँ कान के ऊपर गणेश को और मध्य स्थान में सनातनी आद्या काली को प्रणाम करे (८८)। बुद्धिमान् साधक हाथ जोड़कर देवी का ध्यान कर सारे पूजा-द्रव्य को दाईं ओर और सुवासित जल तथा जो कुल-द्रव्य हों, उन सबको बाईं ओर रखे (८६)। मूल-मन्त्र के अन्त में 'फट्' को जोड़कर उसे पढ़ते हुए सामान्यार्घ्य के कुछ जल द्वारा सारी पूजा-सामग्री को प्रोक्षित कर उसे जल-धारा देकर वेष्ठित करे। फिर वह्नि-बीज (रं) द्वारा अग्नि-प्राचीर की भावना करे (६०)। तब कर- शुद्धि करने के लिए दोनों हाथों में चन्दन-युक्त पुष्प लेकर 'फट्' मन्त्र को पढ़ते हुए सचन्दन पुष्पों को घर्षित कर फेंक दे (६१)। हे शिवे ! परस्पर मिली हुई तर्जनी और मध्यमा अंगुलियों से हथेली पर क्रमशः तीन बार ऊपर और ऊपर को ओर ताली बजाकर 'फट्' मन्त्र का पाठ करते हुए छोटिका (चुटकी-ध्वनि) द्वारा दश-दिग्बन्धन करे। तदनन्तर भूत-शुद्धि करे (६२)। यथा— साधक-श्रेष्ठ अपनी गोद में दोनों हथेलियों को उत्तान (चित्त) रखे। फिर मन को प्रथम चक्र मूलाधार में सन्निवेशित कर हुङ्कार द्वारा कुण्डली को उठाए और फिर 'हंस' मन्त्र को पढ़ते हुए पृथिवी के सहित उसे नाभि-मूल में स्थित द्वितीय चक्र स्वाधिष्ठान में लाकर पृथिवी आदि सभी कार्य-तत्त्वों को क्रमशः जलादि कारण- तत्त्व में प्रविष्ट करे (६३-६४)। घ्राणेन्द्रिय, गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द-सहित पृथिवी को जल में लय करे। रसनेन्द्रिय व रसादि गुण-चतुष्टय-सहित जल को अग्नि (तेज) में विलीन करे (६५)। रूपादि गुण-त्रय और चक्षु के सहित अग्नि (तेज) को वायु में विलीन कर स्पर्श, शब्द, त्वक् इन्द्रिय सहित वायु को आकाश में लय करे (६६)। शब्द अर्थात् शब्द और श्रोतृ के सहित आकाश को अहंकार में तथा अहंकार को बुद्धि-तत्त्व में विलीन करे। बुद्धि-तत्त्व को प्रकृति में और उस सर्व-ग्रासिनी प्रकृति को ब्रह्म में लय करे (६७)। सुबुद्धि व्यक्ति इस प्रकार सभी तत्त्वों को विलीन कर बाईं कोख में कृष्ण-वर्ण, ताम्र-लोहित, शुभ्र, आरक्त-नयन, खड्ग-चर्म-धारी, क्रोधाविष्ट, अंगुष्ठ-मात्र परिमित, सदा अधोमुख रहनेवाले, सर्व-पाप-स्वरूप पुरुष का ध्यान करे (६८-६६)। यथा— पुरुषं कृष्ण-वर्णं च रक्त-श्मश्रु-विलोचनम् । खड्ग-चर्म-धरं क्रुद्धमंगुष्ठ-परिमाणकम् । सर्व-पाप-स्वरूपं च सर्वदाधोमुख-स्थितम् ॥ इसके बाद बाईं नासिका में धूम्र-वर्ण 'यं' बीज का ध्यान कर १६ बार इसका जप करते हुए उसी बाईं नासिका से वायु खींचे। तब उत्तम साधक उस खींची हुई वायु द्वारा पाप-पुरुष की देह को सुखा डाले (१००)। फा०—४
२६ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र नाभि में रक्त-वर्ण 'रं' बीज का ध्यान करते हुए कुम्भक (सांस रोक) कर ६४ बार इस बीज का जप करते हुए उससे उत्पन्न अग्नि द्वारा पाप-परायण अपनी देह को जला डाले (१०१)। ललाट में शुक्ल-वर्ण वारुण बीज 'वं' का ध्यान कर खींची हुई और फिर कुम्भित निःश्वास वायु को छोड़ते हुए इस बीज का ३२ बार जप करते हुए इससे उत्पन्न अमृत-जल द्वारा जले हुए शरीर को प्लावित कर दे (१०२)। इस प्रकार पैर से मस्तक तक पूर्ण रूप से करने के बाद देव-मय नवीन शरीर उत्पन्न हुआ है, ऐसी भावना करे (१०३)। फिर मूलाधार चक्र में पीत-वर्ण पृथिवी-बीज 'लं' का ध्यान करते हुए इस बीज के उच्चारण और एकटक दर्शन से शीघ्र उत्पन्न अपने शरीर को दृढ़ करे (१०४)। अपने वक्ष (छाती) पर हाथ रखकर 'आं ह्रीं क्रों हंसः' का उच्चारण कर 'सोहं' कहे और इस मन्त्र द्वारा उस नव-जात देव-मय देह में देवी की प्राण-प्रतिष्ठा करे (१०५)। हे अम्बिके ! इस प्रकार भूत-शुद्धि का विधान कर 'मैं देवी-स्वरूप हूँ' यह सोचते हुए एकाग्र-चित्त से मातृका-न्यास करे (१०६)। यथा — विनियोग—अस्य मातृका-न्यासस्य ब्रह्मा ऋषिः । गायत्री छन्दः । मातृका सरस्वती देवी देवता । व्यञ्जनाः। बीजाः । स्वराः शक्तयः । सर्गः कीलकं । लिपि-न्यासे विनियोगः । अर्थात् इस मातृका-न्यास के ब्रह्मा ऋषि, गायत्री छन्द, मातृका सरस्वती देवी देवता, व्यञ्जन-वर्ण बीज, स्वर-वर्ण शक्तियाँ, विसर्ग कीलक और लिपि के न्यास में विनियोग है। इसी रूप में ऋषि-न्यास कर कर-न्यास और हृदयादि अङ्ग-न्यास करे (१०७-१०८) । (१) 'अं आं' इन दो वर्णों के मध्य में कवर्ग (ककारादि पञ्च-वर्णं) अर्थात् 'अं' के बाद 'कं खं गं घं ङं' फिर 'आं' (इसी प्रकार अन्यत्र भी समझे) ; (२) 'इं ईं' इन दो वर्णों के मध्य में चकारादि पञ्च-वर्णं ; (३) 'उं ऊं' इन दो वर्णों के मध्य में टकारादि पञ्च-वर्णं ; (४) 'एं ऐं' इनके मध्य में तकारादि पञ्च-वर्ण ; (५) 'ओं औं' इन दो वर्णों के मध्य में पकारादि पञ्च-वर्ण ; (६) अनुस्वार 'अं' और विसर्ग 'अः' इनके मध्य में 'य' से 'क्ष' तक के वर्ण—ये कर-न्यास और अङ्ग- न्यास में मन्त्र-रूप बताए गए हैं (१०६-११०) । न्यास-विधि के अनुसार (अर्थात् पूर्वोक्त एक-एक श्रेणी मन्त्र का उच्चारण कर उसके बाद यथा-क्रम) '१ अंगुष्ठाभ्यां नमः, २ तर्जनीभ्यां स्वाहा, ३ मध्यमाभ्यां वषट्, ४ अनामिकाभ्यां हुं, ५ कनिष्ठाभ्यां वौषट्, ६ करतल-करपृष्ठाभ्यां अस्त्राय फट्' का उच्चारण करे—यह कर- न्यास की विधि है और इसी प्रकार उक्त मन्त्रों का क्रमशः उच्चारण करते हुए यथा-क्रम '१ हृदयाय नमः, २ शिरसे स्वाहा, ३ शिखायै वषट्, ४ कवचाय हुं, ५ नेत्र-त्रयाय वौषट्, ६ करतल-करपृष्ठाभ्यां अस्त्राय फट्' का उच्चारण करना अङ्ग-न्यास की विधि है। इस प्रकार न्यास कर मातृका-सरस्वती का ध्यान करे (१११)— पञ्चाशल्लिपिभिर्विभक्त-मुख-दोः-पन्मध्य-वक्षःस्थलाम् भास्वन्मौलि-निबद्ध-चन्द्र-शकलामापीन-तुङ्ग-स्तनोम् । मुद्रामक्ष-गुणं सुधाढ्य-कलशं विद्यां च हस्ताम्बुजै- र्बिभ्राणां विशद-प्रभां त्रिनयनां वाग्-देवतामाश्रये ॥
पाँचवां उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार | २७ अर्थात् जिनका मुख, बाहु, पाद, कटि-देश और वक्षःस्थल पचास वर्णों में विभक्त है, जिनका किरीट उज्ज्वल शशि-कला से निबद्ध है, जिनके स्तन पीन और उच्च हैं तथा जो चार कर-कमलों में तत्त्व-मुद्रा, अक्ष- माला, अमृत-पूर्ण कलश और विद्या धारण किए हैं; उन्हीं शुक्ल-वर्णा, त्रिनयना वाग्-देवता का मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ (११२)। इस प्रकार मातृका देवी का ध्यान कर षट्-चक्रों में मातृका-न्यास करे। कुल-साधक भ्रू-मध्य में 'ह' 'क्ष' इन दो वर्णों का, कण्ठ-स्थित पद्म में अकार से विसर्ग तक के १६ स्वरों का और हृत्पद्म में 'क' से 'ठ' तक के वर्णों का न्यास कर नाभि-देश में 'ड' से 'फ' तक, लिङ्ग-मूल में वर्गीय 'ब' से 'ल' तक और चतुर्दल मूलाधार- चक्र में अन्तःस्थ 'व' से 'स' तक के वर्णों का न्यास करे। इस प्रकार अन्तर में मातृका-वर्णों का न्यास कर बहिर्देश में भी इन मातृका-वर्णों का न्यास करे (११३-११५)। ललाट, मुख, नेत्र-द्वय, कर्ण-द्वय, नासिका-द्वय, गण्ड-द्वय, ओष्ठ, अधर, उभय दन्त-पंक्ति, मस्तक, मुख- विवर, बाहु-द्वय की सन्धि और अग्र भाग, पद-द्वय की सन्धि और अग्र भाग, पार्श्व-द्वय, पृष्ठ, नाभि, उदर, हृदय, स्कन्ध-द्वय, ककुद, हृदय से दक्षिण बाहु, हृदय से वाम बाहु, हृदय से दक्षिण पद, हृदय से वाम पद, फिर हृदय से जठर और हृदय से मुख—इन सभी स्थानों में क्रमशः सभी मातृका-वर्णों का न्यास करे। इसी प्रकार वर्ण-न्यास कर प्राणायाम करे (११६-११८)। यथा— माया-बीज (ह्रीं) का १६ बार जप करते हुए बाईं नासा से खींची हुई वायु से अपने शरीर को पूर्ण करे। दाएँ हाथ की कनिष्ठा, अनामिका और अंगुष्ठ से दोनों नासा-पुटों को बन्द कर ६४ बार जप करते हुए कुम्भक करे (११६)। फिर अंगुष्ठ को छोड़कर केवल दो अँगुलियों से बाईं नासा को बन्द कर ३२ बार जप करते हुए दाईं नासा से धीरे-धीरे वायु निकाल दे (१२०)। तीन बार यह क्रिया करना ही प्राणायाम कहा जाता है। इस प्रकार प्राणायाम कर ऋषि-न्यास करे (१२१)। ब्रह्मा और ब्रह्मर्षि-गण इस मन्त्र के ऋषि हैं। गायत्री आदि इसके छन्द हैं। आद्या काली इसकी देवता हैं (१२२)। 'क्रीं' इसका बीज, आद्या माया 'ह्रीं' इसकी शक्ति, कमला 'श्रीं' इसका कीलक है। इनका न्यास क्रमशः शिर, मुख, हृदय, गुह्य, दोनों चरणों व सर्वाङ्ग में करना है (१२३)। मूल-मन्त्र का पाठ करते हुए दोनों हाथों से चरणों से लेकर मस्तक तक और मस्तक से लेकर चरणों तक सात या तीन बार न्यास करे। यह 'व्यापक न्यास' है, जो यथोक्त फल देने में समर्थ है (१२४)। मूल-मन्त्र के आद्य अक्षर में जो बीज होगा, उसमें क्रमशः आ, ई इत्यादि को जोड़कर अथवा उसके न होने से अंग-शुद्ध बीज द्वारा अंग-न्यास करे (१२५)। दोनों अँगूठों, दोनों तर्जनियों, दोनों मध्यमाओं, दोनों अनामिकाओं, दोनों कनिष्ठाओं और कर-तल तथा कर-पृष्ठ में क्रमशः 'नमः, स्वाहा, वषट्, हूँ, वौषट्, फट्' मन्त्र कहे हैं। आदि में हृदय में 'नमः', मस्तक में वह्नि-वल्लभा-'स्वाहा', शिखा में 'वषट्', दोनों कवचों में 'हूं'—ये मन्त्र कहे (१२६)। दोनों नेत्र में 'वौषट्' और करतल तथा कर- पृष्ठ इन दोनों में 'फट्' कहे। सुधी व्यक्ति क्रमशः इस प्रकार षडङ्ग-न्यास कर पीठ-न्यास करे (१२७)। यथा— वीर साधक अपने हृत्पद्म में आधार-शक्ति, कूर्म, अनन्त, पृथ्वी, सुधाम्बुधि, मणि-द्वीप, पारिजात तरु, चिन्ता-मणि गृह, मणि-माणिक्य-वेदिका और उस पर स्थित पद्मासन—इन सबका न्यास करे (१२८-१३०)। दक्षिण स्कन्ध में, वाम स्कन्ध में, वाम कटि में, दक्षिण कटि में धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य और वैराग्य का क्रमशः न्यास करे (१३१)। उत्तम साधक मुख में, वाम पार्श्व में, नाभि में, दक्षिण पार्श्व में नञ्-पूर्वक उक्त धर्मादि (अर्थात् अधर्म, अज्ञान, अनैश्वर्य और अवैराग्य) का यथा-क्रम न्यास करे (१३२)। फिर हृदय में आनन्द-कन्द, सूर्य, सोम, अग्नि और आद्याक्षर में अनुस्वार जोड़कर सत्व, रज, तम—इन सबका कर्णिका में न्यास कर हृत्पद्म के
२८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र सभी पत्रों (दलों-पंखुड़ियों) में पीठ-नायिकाओं का न्यास करे (१३३)। अष्ट-नायिकाओं के नाम हैं—मंगला, विजया, भद्रा, जयन्ती, अपराजिता, नन्दिनी, नारसिंही, वैष्णवी (१३४)। असितांग, रुरु, चण्ड, क्रोधोन्मत्त, भयङ्कर, कपाली, भीषण और संहारी—इन अष्ट भैरवों का न्यास अष्ट-दल पद्म के प्रत्येक दल के अग्र भाग में करे। फिर प्राणायाम करे (१३५)। इसके बाद कच्छप-मुद्रा बनाए हुए करतल में गन्ध-पुष्प लेकर हृदय पर दोनों हाथ रखकर सनातनी देवी का ध्यान करे (१३६)। ध्यान दो प्रकार के हैं—सरूप और अरूप अर्थात् साकार और निराकार। सरूप अर्थात् साकार, अरूप अर्थात् निराकार। इस प्रकार विषय-भेद से ध्यान दो प्रकार के कहे गए हैं। तुम्हारा निराकार-विषयक जो ध्यान है, वह वाक्य और मन के अगोचर है अतः अव्यक्त, सर्व-व्यापी यह रूप साधारण लोगों के लिए दुर्ज्ञेय, उपदेश से परे और बड़े कष्ट एवं बड़ी समाधि द्वारा केवल योगियों को ज्ञेय है (१३७-१३८)। इस समय मन की धारणा योग्य, शीघ्र अभीष्ट सिद्धि-दायक एवं सूक्ष्म ध्यान अर्थात् निराकार ध्यान के प्रबोध के लिए तुम्हारा स्थूल ध्यान कहता हूँ (१३६)। वस्तुतः निराकार, काल-जननी, महा-द्युति कालिका के गुण-क्रियानुसार उनकी रूप-कल्पना की जाती है (१४०)। यथा— मेघाङ्गीं शशि-शेखरां त्रि-नयनां रक्ताम्बरं विभ्रतीम्। पाणिभ्यामभयं वरं च विलसद् रक्तारविन्द-स्थिताम् ॥ नृत्यन्तं पुरतो निपीय मधुरं माध्वीक-मद्यं महा- कालं वीक्ष्य विकासितानन-वरामाद्यां भजे कालिकाम् ॥ अर्थात् जिनका वर्ण मेघ के समान है, जिनके ललाट पर चन्द्र-लेखा है, जो त्रि-नयना हैं, जो रक्त-वस्त्र धारण किए हैं, जो दो हाथों से वर और अभय दे रही हैं, जो खिलते हुए लाल कमल पर विराजमान हैं, मधूक- पुष्प से निर्मित मधुर मद्य का पान कर सम्मुख नाचते हुए महा-काल को देखकर जिनका मुख प्रफुल्ल हो उठा है, उन महा-कालिका का मैं भजन करता हूँ (१४१)। साधक अपने सिर पर फूल रख कर उक्त प्रकार ध्यान कर परम भक्ति के साथ मानसोपचार से उनकी पूजा करे (१४२)। यथा— आसन-रूप में हृदय-कमल को प्रदान करे। सहस्र-दल-कमल से निकलते हुए अमृत द्वारा दोनों चरणों में पाद्य अर्पित करे। मन को अर्घ्य करके निवेदन करे (१४३)। उसी अर्थात् सहस्र-दल-कमल से निकले अमृत द्वारा ही आचमनीय और स्नानीय जल प्रदान करे। वस्त्र-रूप में आकाश-तत्त्व और गन्ध रूप में गन्ध-तत्त्व की कल्पना करे (१४४)। चित्त को पुष्प-रूप में भावना करे। पञ्च-प्राणों को धूप-स्वरूप कल्पना करे। दीप के स्थान पर तेजस्तत्त्व, सुधाम्बुधि को नैवेद्य-रूप में, अनाहत-ध्वनि को घण्टा-ध्वनि के रूप में और वायु- तत्त्व को चामर तथा इन्द्रियों के समस्त कार्यों एवं मन की चंचलता को नृत्य-रूप में भावना करे (१४५-१४६)। अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए विविध प्रकार के पुष्प देवी को प्रदान करे। माया-राहित्य, अहङ्कार का अभाव, राग-राहित्य, मद-राहित्य, मोह-राहित्य, दम्भ-राहित्य, द्वेष-राहित्य, क्षोभ-राहित्य, मात्सर्य-राहित्य, लोभ-राहित्य—ये दस विषय ही पुष्प कहे गए हैं (१४७-१४८)।
पाँचवां उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार । २६ इसके बाद अहिंसा-रूप परम पुष्प, इन्द्रिय-निग्रह-रूप पुष्प, दया-रूप पुष्प, क्षमा-रूप पुष्प और ज्ञान-रूप पुष्प—ये पाँच पुष्प प्रदान करे (१४६) । इस प्रकार पन्द्रह भाव-रूप पुष्पों से पूजा करे। फिर सुधा-सागर, मांस-पर्वत, भर्जित-मत्स्य का पर्वत अर्थात् प्रभूत मत्स्य, मांस, मुद्रा की राशि, उत्तम अन्न, घृताक्त पायस, कुलामृत अर्थात् शक्ति-घटित अमृत-विशेष, स्त्री-पुष्प और पीठ-क्षालन-वारि और स्त्रियों के अंग-विशेष का प्रक्षालन-जल मन-ही-मन देवी को देता हुआ विघ्न-कारक काम और क्रोध की बलि देकर जप आरम्भ करे। कुण्डली-सूत्र में गुथी हुई माला को जप-माला कहा है (१५०-१५२) । यथा— पहले विन्दु-सहित अकार से लेकर अन्तिम लकार तक के वर्णों का उच्चारण कर मूल-मन्त्र का उच्चारण करे। यह जप—'अं ह्रीं क्रीं परमेश्वर्यै स्वाहा, आं ह्रीं क्रीं' इत्यादि क्रम से करने से अनुलोम जप कहा जाता है (१५३) । फिर विन्दु-युक्त लकार से अकारतक एवं प्रत्येक वर्ग के एक-एक वर्ण को लेकर आठ वर्णों को विन्दु- युक्त जप करने से विलोम जप कहा जाता है। 'क्ष'—मेरु-स्वरूप है (१५४) । तदनन्तर 'अष्ट-वर्गों के अर्थात् स्वर-वर्ण, ककारादि पञ्च, चकारादि पञ्च, टवर्ग-तवर्ग-पवर्ग के पञ्च-पञ्च वर्ण, यकारादि चार वर्ण, शकारादि पंच-वर्ण के अन्तिम वर्ण के साथ मूल-मन्त्र को योग कर एक सौ आठ बार जप कर निम्न मन्त्र से जप को समर्पित करे (१५५-५६)— सर्वान्तरात्म-निलये स्वान्तर्ज्योतिः-स्वरूपिणि ! गृहाणान्तर्जपं मात्राद्ये कालि ! नमोऽस्तु ते ॥ अर्थात् हे सर्वान्तःकरण-वासिनि ! हे अन्तरात्म-ज्योति-स्वरूपे ! हे मात: ! हे आद्ये कालिके ! तुमको प्रणाम करता हूँ। मेरे इस मानस जप को ग्रहण करो। इस प्रकार जप समर्पित कर मन-ही-मन भगवती को साष्टांग प्रणाम करे। अब बाह्य पूजा आरम्भ करे (१५७) । पहले विशेषार्घ्य का संस्कार बताता हूँ, सुनो। जिसके स्थापन मात्र से देवता प्रसन्न होता है (१५८), ब्रह्मा आदि देव-गण, योगिनी-गण और भैरव-गण अर्घ्य-पात्र का दर्शन कर नृत्य करने लगते हैं और प्रसन्न हृदय से सिद्धि प्रदान करते हैं (१५६) । अपनी बाईं ओर, सम्मुख स्थल पर, सामान्यार्घ्य के जल से एक त्रिकोण-मण्डल, उसके मध्य में माया-बीज 'ह्रीं', फिर त्रिकोण-मण्डल के बाहर एक गोलाकार मण्डल और उसके बाहर एक चतुष्कोण-मण्डल लिखे । (रेखाचित्र सं० १) इस पर 'ह्रीं आधार-शक्तये नमः' इस मन्त्र से आधार-शक्ति की पूजा करे (१६०-१६१) । फिर उक्त मण्डल के ऊपर धुला हुआ आधार स्थापित कर उसमें 'मं वह्नि-मण्डलाय दश-कलात्मने नमः' मन्त्र से पूजा कर 'फट्' मन्त्र से अर्घ्य-पात्र को धोकर उस आधार पर स्थापित करे (१६२-६३) । फिर 'अं अर्क-मण्डलाय द्वादश-कलात्मने नमः' से हे अम्बिके ! उस पात्र में पूजा करे। तदनन्तर मूल-मन्त्र से अर्घ्य-पात्र को पूरित करे (१६४) । साधक अर्घ्य-पात्र का तीन भाग मद्य से और शेष भाग जल से पूर्ण कर उसमें गन्ध-पुष्प छोड़े। फिर 'रक्षा-मन्त्र' से उसमें पूजा करे (१६५) । 'उं चन्द्र-मण्डलाय षोडश-कलात्मने नमः' से पूजा कर बिल्व-पत्र, रक्त चन्दन लगी हुई दूर्वा (दूब), पुष्प और आतप तण्डुल एकत्र कर उस पात्र के अग्र भाग में स्थापित करे (१६६-१६७) । तब मूलमन्त्र से उसमें तीर्थों का आवाहन कर देवी का ध्यान कर गन्ध-पुष्प से पूजन करे। फिर बारह बार मल-मन्त्र का जप करे (१६८) । इसके बाद साधक धेनु और योनि मुद्राँ दिखाकर धूप-दीप दिखावे।
३० | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र तब उस जल में से कुछ प्रोक्षणी-पात्र में डालकर उस जल को अपने ऊपर और समस्त देय द्रव्यों पर छिड़के। मन्त्रज्ञ व्यक्ति पूजा के समाप्त होने तक विशेषार्घ्य पात्र को हिलावे नहीं (१६९-७०) । हे निर्मल-स्मिते ! यह विशेषार्घ्य का संस्कार कहा, अब धर्मार्थ-काम-मोक्ष इस चतुर्वर्ग के देनेवाले यन्त्र- राज के लिखने की विधि बताता हूँ (१७१) । एक त्रिकोण-मण्डल बनाकर उसके मध्य में माया-बीज 'ह्रीं' लिखे । उसके बाहर दो गोलाकार मण्डल बनाए । इन दोनों गोलाकार मण्डलों के मध्य में दो-दो करके सोलह के शर बनाए (१७२)। इस वृत्त-द्वय के बाहर अष्टदल पद्म लिखे । इस पद्म के बाहर चतुर्द्वार-युक्त सरल रेखा- वाला सुन्दर भूपुर बनाए (१७३) । (रेखाचित्र सं० २) कुण्ड-गोल (शक्ति-विशेष के पुष्प) द्वारा या स्वयम्भू कुसुम (अन्यान्य शक्ति-घटित पुष्प) द्वारा लिप्त, चन्दन, अगरु और कुंकुम द्वारा या केवल रक्त-चन्दन द्वारा लिप्त सुवर्ण-मय पात्र में, रजत-मय पात्र में या ताम्र- मय पात्र में स्वर्ण-शलाका या बिल्व-कण्टक द्वारा मूल-मन्त्र का उच्चारण करते-करते देवता-भाव की सिद्धि के लिए उक्त यन्त्र-राज को लिखे अथवा स्फटिक-निर्मित पात्र में या प्रवाल-निर्मित पात्र में या वैदूर्य-निर्मित पात्र में उत्तम शिल्प-कार कारीगर द्वारा मन्त्र-रेखाएँ खुदवाकर प्रतिष्ठा-पूर्वक घर के अन्दर इसे स्थापित करे। ऐसा करने से इस यन्त्र के प्रसाद से दुष्ट भूत-गण, ग्रह-समुदाय और रोग, भय आदि सब दूर होते हैं। वह घर पुत्र, पौत्र, सुख और ऐश्वर्य के प्रभाव से आनन्दित होता है और स्वयं वह व्यक्ति इस यन्त्र के प्रसाद से दाता, भर्त्ता और यशस्वी होता है (१७४-७८) । उक्त प्रकार यन्त्र बनाकर अपने सम्मुख रत्न-सिंहासन पर उसे स्थापित कर पीठ-न्यासोक्त विधि से पीठ देवताओं की पूजा कर कर्णिका के मध्य में मूल-देवता की पूजा करे (१७९) । अब कलश-स्थापन और चक्रानुष्ठान को बताता हूँ, जिसके करने मात्र से निश्चय ही देवता को बड़ी प्रसन्नता होती है, मन्त्र-सिद्धि होती है और इच्छा-सिद्धि होती है (१८०) । विश्वकर्मा द्वारा देवताओं का एक-एक अंश लेकर इसकी रचना होती है, इसी से इसे 'कलश' कहते हैं (१८१) । यह ३६ अंगुल अर्थात् डेढ़ हाथ चौड़ा, सोलह अंगुल ऊँचा होता है, चार अंगुलि इसके कण्ठ का परिमाण है । मुख का विस्तार छः अंगुलि और तल-देश का परिमाण पाँच अंगुलि है-कलश-निर्माण की यही विधि है (१८२) । देवता की प्रीति के लिए सुवर्ण, रजत, ताम्र, कांस्य, मृण्मय, पाषाण या काच का बनवाए । घट को अभग्न और अच्छिद्र बनवाए । इसमें धन की कंजूसी न करे (१८३) । सुवर्ण-कलश भोग प्रदान करता है, रजत-मय कलश मोक्ष-प्रद होता है, ताम्र-मय कलश प्रीति-कर होता है। कांस्य-मय कलश पुष्टि-वर्द्धक होता है। काच-मय कलश वशीकरण में प्रशस्त कहा गया है। पाषाण से बना कलश स्तम्भन-कार्य में और मृण्मय कलश सभी कार्यों में प्रशस्त है। पूर्वोक्त द्रव्यों द्वारा निर्मित सभी प्रकार के ही कलश देखने में सुन्दर और सुडौल होने चाहिए (१८४) । अपने बाईं ओर एक षट्-कोण-मण्डल, उसके मध्य में एक शून्य और उक्त षट्कोण के बाहर एक चतुष्कोण-मण्डल बनाए (१८५) । (रेखाचित्र सं० ३) इस प्रकार सिन्दूर-रज या रक्त-चन्दन से मण्डल बनाकर उस पर आधार-देवता की पूजा करे (१८६) । यथा-ह्रीं आधार-शक्तये नमः (१८७) । इसके बाद 'नमः' से धोकर आधार (मृत्पिण्डादि) मण्डल के ऊपर स्थापित करे । फिर 'फट्' से कुम्भ को धोकर उसे आधार के ऊपर स्थापित करे (१८८) । मन्त्रज्ञ व्यक्ति 'क्ष' से लेकर अकार तक विपरीत क्रम
पाँचवाँ उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार । ३१ में वर्ण-समुदाय को विन्दु-युक्त कर उच्चारण कर मूल-मन्त्र का. उच्चारण करते हुए कारण (मद्य) द्वारा कुम्भ को पूरित करे (१५६) । कुलाचारज्ञ व्यक्ति देवी-भाव-परायण होकर आधार में वह्नि-मण्डल का, कुम्भ में सूर्य- मण्डल का और कुम्भ-स्थित मद्य में चन्द्र-मण्डल का पूजन करे (१६०)। फिर रक्त चन्दन, सिन्दूर, रक्त माला, आदि से अनुलेपन कर कलश को विभूषित कर 'पञ्चीकरण' करे (१६१) । यथा— ‘फट्’ का उच्चारण करते हुए कुश द्वारा कलश पर 'ताडना' कर 'हुं' का उच्चारण कर अवगुण्ठन मुद्रा द्वारा कलश को अवगुण्ठित करे । फिर 'ह्रीं' का उच्चारण करते हुए अपलक दृष्टि से कलश को अच्छी तरह देखकर 'नमः' का उच्चारण करते हुए जल से कलश को अभ्युक्षित करे । मूलमन्त्र से कलश में तीन बार चन्दन छिड़के । इसी को 'पञ्चीकरण' कहते हैं (१६२) । फिर कलश को प्रणाम कर उसमें स्थित सुरा को रक्त पुष्प प्रदान कर निम्न मन्त्रों से सुरा का शोधन करे (१६३)— एकमेव परं ब्रह्म स्थूल-सूक्ष्म-मयं ध्रुवम् । कचोद्भवं ब्रह्म-हत्यां तेन ते नाशयाम्यहम् ॥ अर्थात् परं ब्रह्म अद्वितीय स्थूल और सूक्ष्म तथा नित्य है। मैं उसके द्वारा कच-जनित ब्रह्म-हत्या का नाश करता हूँ (१६४) । सूर्य-मण्डल-मध्यस्थे वरुणालय-सम्भवे ! अमा-वीज-मये देवि ! शुक्र-शापाद् विमुच्यताम् ॥ अर्थात् हे देवि ! हे सूर्य-मण्डल-मध्यस्थे ! हे समुद्र-गर्भ-सम्भूते ! हे अमा-वीज-मयि ! तुम शुक्राचार्य के शाप से मुक्त हो जाओ (१६५) । वेदानां प्रणवो वीजं ब्रह्मानन्द-मयं यदि । तेन सत्येन ते देवि ! ब्रह्म-हत्या व्यपोहतु ॥ अर्थात् ब्रह्मानन्द-मय प्रणव वेदों का वीज-स्वरूप है। हे देवि ! उस सत्य द्वारा तुम्हारी ब्रह्म-हत्या नष्ट हो जाय (१६६-६७) । ह्रीं हंसः शुचिसद् वसुरन्तरिक्ष-सद्धोता, वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृसद्वर सद्गत-सद्-व्योम-सदब्जा गोजा, ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ अर्थात् परमहंस तेजोमय स्वर्ग में रहता है; वसु-रूप में स्वर्ग व पृथ्वी के मध्य अन्तरिक्ष में वह घूमता है। पृथ्वी पर वह वैदिक अग्नि और 'होता'-रूप में है। उसकी पूजा अतिथि-रूप में होती है। वह गृहस्थ की अग्नि में, मनुष्य की चेतनता में है और सत्य-लोक में रहता है। सत्य व आकाश में वह स्थित है। वरुण-वीज 'वं' में क्रमशः छः दीर्घ स्वर लगाकर 'ब्रह्म-शाप' शब्द के बाद 'विमोचितायै' कहे, फिर 'सुधा-देव्यै नमः' कहे। इस मन्त्र का सात बार पाठ करने से ब्रह्म का शाप दूर होता है। पूरा मन्त्र है (१६८)- वां वीं वूं वें वों वः ब्रह्म-शाप-विमोचितायै सुधा-देव्यै नमः । अंकुश अर्थात् 'क्रों' में छः दीर्घ स्वर लगाकर श्री-वीज 'श्रीं' और 'माया-वीज 'ह्रीं' जोड़े। फिर 'सुधा' शब्द के बाद 'कृष्ण-शापं मोचय अमृतं स्रावय स्रावय' कहकर अन्त में 'स्वाहा' कहे (१६६) । इस प्रकार शाप-मोचन कर एकाग्र-हृदय से उसमें आनन्द-भैरव और आनन्द-भैरवी की पूजा करे (२००) । 'सहक्ष-मल' पद के बाद 'वरयूं' के साथ मिलाकर 'आनन्द-भैरवाय' कहे और अन्त में 'वषट्' रहेगा। यह आनन्द-भैरव का मन्त्र है (२०१) । आनन्द-भैरवी की पूजा के समय 'सहक्षमलवरयूं' इस मन्त्र के 'आस्य' अर्थात् मुख के दो वर्णों को विपरीत अर्थात् 'हस' पड़े और 'श्रवण' अर्थात् उकार के स्थान पर 'वाम-लोचना'
३२ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र अर्थात् ईकार पाठ करे, बाद में 'सुधा-देव्यै वौषट्' इन दो पदों का प्रयोग करे । (इस प्रकार पूरा मन्त्र हुआ— सहक्षमलवरयीं आनन्द-भैरव्यै वौषट्) । उसी कलश में आनन्द-भैरव और आनन्द-भैरवी की सम-रसता का ध्यान कर उनके अमृत द्वारा उसे संसिक्त भावना कर उसके ऊपर बारह बार मूल-मन्त्र का जप करे (२०२-३) । तत्र देवता-बुद्धि से उस मद्य के ऊपर मूल-मन्त्र का पाठ करते हुए तीन बार पुष्पाञ्जलि प्रदान करे । फिर घण्टा-ध्वनि के साथ उसे धूप-दीप दिखाये (२०४) । देव-पूजा, व्रत, होम, विवाह और अन्य उत्सवों में इसी प्रकार सुरा का संस्कार करे (२०५) । सम्मुख स्थित त्रिकोण-मण्डल के ऊपर मांस-पात्र को लाकर 'फट्' से अभ्युक्षित कर वायु-बीज (यं) और वह्नि-बीज (रं) द्वारा उसे तीन बार अभिमन्त्रित करे (२०६) । फिर कवच अर्थात् 'हूं' का पाठ करते हुए अव- गुण्ठन-मुद्रा से उसे अवगुण्ठित कर 'अस्त्र' अर्थात् 'फट्' से उसकी रक्षा करे । तब 'वं' मन्त्र पढ़कर धेनु-मुद्रा से उसे अमृतीकृत कर निम्न मन्त्र पढ़े (२०७)— विष्णोर्वक्षसि या देवी या देवी शङ्करस्य च । मांसं मे पवित्री-कुरु कुरु तद्-विष्णोः परमं पदम् ॥ अर्थात् जो देवी विष्णु के वक्षःस्थल पर और जो देवी शङ्कर के वक्षःस्थल पर विराजती हैं, वह मेरे इस मांस को पवित्र करे; वह मेरे सम्बन्ध में विष्णु का प्रधान पद निश्चित करे । यह मांस-शोधन-विधि है (२०८) । इसी प्रकार कुल-धर्मज्ञ व्यक्ति मत्स्य-पात्र को लाकर उक्त मांस-शोधन- मन्त्रों से उसे शोधित कर निम्न मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करे (२०६)— त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि-वर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ॥ अर्थात् जैसे सूर्य को देखते हैं, वैसे ही विष्णु का परम पद सदा दिखाई देता है। जो अपने मन को वश में रखता है और जागता रहता है, वह विष्णु के परम पद का दर्शन करता है । हे प्रिये ! इसके बाद मुद्रा-पात्र को लाकर उसी प्रकार शोधित कर निम्न मन्त्रों से अभिमन्त्रित करे— ॐ तद् विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः, दिवीव चक्षुराततम् । ॐ तद् विप्रासो विपण्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत् परमं पदम् । अर्थात् उस त्र्यम्बक (शिव) की हम पूजा करते हैं, जो पुष्टि-कारक और सुगन्धिवाला है । उर्वारुक का फल जैसे अपने आप गिर जाता है, उसी प्रकार हम बन्धनों से छूट जायें और अन्त में मुक्त होकर परमात्मा में लय हो जायें । अथवा मूल-मन्त्र द्वारा ही पञ्च-तत्त्वों का शोधन करे । जिसे मूल-मन्त्र पर श्रद्धा है, उसे शाखा-पल्लव से क्या प्रयोजन (२१२) ? केवल मूल-मन्त्र से जो द्रव्य शोधित होता है, वही देवता की प्रीति के लिए सबसे अधिक प्रशस्त है, यह मैं कहता हूँ (२१३) । जिस समय साधक को अवसर न हो, तब सभी द्रव्यों को मूल-मन्त्र से ही शोधित कर महा-देवी को निवेदित करे (२१४) । मूल-मन्त्र से शोधित सभी तत्त्वों को देवी को निवेदन करने से कोई दोष नहीं होगा, किसी अङ्ग के कम होने का दोष नहीं होगा । यह सत्य है, सत्य है, पुनः कहता हूँ कि यह सत्य है, यह शङ्कर का शासन है (२१५) । ❁
छठा उल्लास : पात्र-स्थापन और होम, चक्र, करणादि श्री देवी ने जिज्ञासा की—हे नाथ ! आपने पूजादि कर्म के समय मुझे ‘पञ्च-तत्त्व’ बताए हैं। इस समय यदि मेरे प्रति आपकी कृपा हो तो उन्हें विशेष रूप से बताइए (१)। श्री सदाशिव ने कहा—उत्तम सुरा तीन प्रकार की है : १. गौड़ो, २. पेष्टी और ३. माध्वी। यह सुरा ताल और खर्जूर से बनने से विविध रूप की कही गई है। देश-भेद से और विभिन्न द्रव्य-भेद से सुरा अनेक प्रकार को है। यह सभी सुरा देवी की अर्चना के लिए प्रशस्त हैं (२)। यह सुरा जिस किसी रूप से समुत्पन्न हो, जिस किसी व्यक्ति द्वारा लाई गई हो, शोधित होने पर सब सिद्धियाँ प्रदान करती है। सुरा के सम्बन्ध में जाति का विचार नहीं है (३)। मांस तीन प्रकार का है—१. जलचर, २. भूचर और ३. खेचर। यह मांस जिस किसी स्थान से आया हो, जिस किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत किया गया हो, वह सभी देवता को प्रसन्न करता है, इसमें सन्देह नहीं (४)। देवता को देय वस्तु के सम्बन्ध में साधक की इच्छा ही बलवती है। जो वस्तु अपने को प्रिय है, वही इष्ट-देवता को प्रदान करे (५)। हे देवि ! बलि-दान में पुरुष पशु ही विहित है। महादेव के शासन के कारण स्त्री-पशु का हनन न करे (६)। शाल, बोयाल और रोहू—यही तीन प्रकार की मत्स्य उत्तम हैं (७)। अन्य कण्टक-हीन मत्स्य मध्यम और बहुत कण्टकवाली मत्स्य अधम हैं। बहुत कण्टकवाली मत्स्य को भी अच्छी तरह भूनकर देवी को दे सकते हैं (८)। मुद्रा भी उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकार की है। जो चन्द्र-बिम्ब के समान शुभ्र है, जो शालि- तण्डुल से प्रस्तुत की गई है अथवा जो यव या गेहूँ द्वारा बनी है और जो घी में पकी तथा मनोहर है, वही मुद्रा उत्तम है। जो भ्रष्ट धान्य से बनी है, वह मध्यम मुद्रा है। जो अन्य प्रकार की वनस्पति--शाक द्वारा प्रस्तुत है, वह अधम मुद्रा कही गई है (६-१०)। देवी को सुधा देते समय जो मांस, मत्स्य, मुद्रा, फल-मूल आदि दिया जाता है, उस सबको ‘शुद्धि’ कहते हैं (११)। शुद्धि के बिना देवी को सुरा देकर पूजा या तर्पण करने से सारा कर्म निष्फल होता है और देवता प्रसन्न नहीं होती (१२)। शुद्धि के बिना मद्य-पान करने से वह केवल विष-पान होता है और ऐसा व्यक्ति चिर- रोगी तथा स्वल्पायु होकर शीघ्र ही मर जाता है (१३)। हे महेशानि ! कलि के प्रबल होने पर शेष-तत्त्व का शोधन एकमात्र सर्व-दोष-विवर्जिता स्वकीया पत्नी से ही सम्पन्न होगा (१४)। हे प्राण-वल्लभे ! मैंने जो स्वयम्भू-कुसुमादि की बात कही है, उनके प्रतिनिधि के स्थान पर ‘रक्त-चन्दन’ को बताया है (१५)। उक्त पञ्च-तत्त्व एवं फल-मूल, पत्र बिना शोधन किए देवी को न दे, अन्यथा करनेवाला नरक-गामी होगा (१६)। [ ३३ ] फा०-५
३४ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र गुण-शीला अपनी पत्नी से श्रीपात्र का स्थापन करे और उस पत्नी को कारण या सामान्यार्घ्य के जल से अभिषिक्त करे (१७)। अभिषेक का मन्त्र यह है— पहले ‘बाला’ (‘ऐं क्लीं सौः’) कहे, फिर ‘त्रिपुरायै’ का उच्चारण कर ‘नमः’ अन्त में कहे। तब ‘इमां- शक्तिं’ कह कर ‘पवित्री कुरु’—इस शब्द के बाद ‘नमः शक्तिं कुरु स्वाहा’ कहे (१८-१९)। यदि नारी अदीक्षिता हो, तो उसके कान में माया-बीज ‘ह्रीं’ का उच्चारण करे। मैथुन-तत्त्व के सम्पादन के लिए अन्य जो परकीया शक्ति हों, उन सबका पूजन करे (२०)। फिर अपने और यन्त्र के मध्य में एक त्रिकोण- मण्डल लिखकर उसके मध्य में माया-बीज ‘ह्रीं’ लिखे। इस त्रिकोण-मण्डल के बाहर एक षट्कोण-मण्डल लिख कर उसके बाहर एक चतुष्कोण-मण्डल लिखे (२१)। (चित्र सं० ४) तदनन्तर उत्तम साधक चतुष्कोण-मण्डल के चार कोणों में १. पूं पूर्ण-शैलाय पीठाय नमः, २. उं उड्डीयानाय पीठाय नमः, ३. जां जालन्धराय पीठाय नमः, ४. कां काम-रूपाय पीठाय नमः' से क्रमशः पूर्ण- शैल, उड्डीयान, जालन्धर और कामरूप पीठों का पूजन करे (२२)। फिर षट्कोण के छः कोणों में ‘ह्वां नमः, ह्रीं नमः, ह्रू नमः, ह्रैं नमः, ह्रौं नमः, ह्रः नमः’ इन छः मन्त्रों से षट्-कोण की अधिष्ठात्री देवताओं को पूजा करे। तब त्रिकोण-मण्डल में ‘ह्रीं आधार-शक्तये नमः' से आधार-देवता की पूजा करे (२३)। इसके बाद ‘नमः' से प्रक्षालित आधार को पूर्ववत् उस स्थान पर स्थापित कर उसमें आदि अक्षर के उच्चारण-सहित वह्नि की दश कलाओं की पूजा करे (२४)। दश कलाओं के नाम हैं—१. धूम्रा, २. अर्चिः, ३. ज्वालिनी, ४. सूक्ष्मा, ५. ज्वालिनी, ६. विस्फुलिङ्गिनी, ७. सुश्री, ८. सुरूपा, ६. हव्यवाहा, १०. कव्यवाहा (२५)। इन सब नामों में चतुर्थी विभक्ति लगाकर अन्त में ‘नमः' जोड़कर वह्नि की दस कलाओं की पूजा करे (२६)। तब ‘मं वह्नि- मण्डलाय दश-कलात्मने नमः' से वह्नि-मण्डल की पूजा करे (२७)। फिर ‘फट्’ कार से विशोधित अर्घ्य-पात्र लाकर आधार पर स्थापित कर ‘क भ' से 'ठ ङ' तक के वर्ण-बीजों को पहले उच्चारण कर सूर्य की द्वादश कलाओं का पूजन करे (२८)। द्वादश कलाओं के नाम हैं—१. तपनी, २. तापिनी, ३. धूम्रा, ४. मरीचि, ५. ज्वालिनी, ६. रुचि, ७ सुषूम्ना, ८. भोगदा, ६. विश्वा, १०. बोधिनी, ११. धारिणी, १२. क्षमा (२६)। तब अर्घ्य-पात्र में ‘अं सूर्य-मण्डलाय द्वादश-कलात्मने नमः’ इस मन्त्र से सूर्य-मण्डल की पूजा करे (३०)। फिर मन्त्रज्ञ व्यक्ति क्षकार से अकार तक विलोम-मातृका वर्ण और उनके अन्त में मूल-मन्त्र का उच्चारण करते हुए कलशस्थ सुरा से अर्घ्य-पात्र के तीन भाग को पूर्ण करे (३१)। इसके बाद एकाग्र-चित्त से विशेषार्घ्य के जल से अर्घ्य-पात्र के शेष भाग को पूर्णकर सोलह स्वर-बीजों के अन्त में चतुर्थ्यन्त नाम का उच्चारण कर अन्त में ‘नमः’ शब्द का प्रयोग कर चन्द्रमा की षोडश कलाओं की पूजा करे (३२)। षोडश कलाओं के नाम हैं—१. अमृता, २. मानदा, ३. पूज्ञा, ४. तुष्टि, ५. पुष्टि, ६. रति, ७. धृति, ८. शशिनो, ६. चन्द्रिका, १०. कान्ति, ११. ज्योत्स्ना, १२. श्री, १३. प्रीति, १४. अङ्गदा, १५. पूर्णा और १६. पूर्णामृता। ये सोलह कलायें काम-दायिनी अर्थात् अभीष्ट कामना को पूर्ण करनेवाली हैं (३३)। फिर उक्त अर्घ्य-पात्र के जल में ‘उं सोम-मण्डलाय षोडश- कलात्मने नमः' से सोम-मण्डल की पूजा करे (३४)। तब दूर्वा, अक्षत, रक्त-पुष्प, बबंरा-पत्र, अपराजिता-पुष्प— ये सब लेकर ‘ह्रीं’ मन्त्र से पात्र में छोड़कर उसमें तीर्थों का आवाहन करे (३५)। फिर ‘हूँ’ बीज से अवगुण्ठन- द्वारा अर्घ्य-पात्रस्थ सुरा का अवगुण्ठन कर अस्त्र-मुद्रा द्वारा उसकी रक्षा करे। तब धेनु-मुद्रा से उसे अमृतीकृत कर उसे मत्स्य-मुद्रा से आच्छादित करे (३६)। फिर उस अर्घ्य-पात्रस्थ सुरा के ऊपर दस बार मूल-मन्त्र का जप कर उसमें इष्ट-देवता का आवाहन कर पुष्पाञ्जलि देकर निम्न पाँच मन्त्रों से सुधा को अभिमन्त्रित करे (३७)—