महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपाँचवां उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार | २७ अर्थात् जिनका मुख, बाहु, पाद, कटि-देश और वक्षःस्थल पचास वर्णों में विभक्त है, जिनका किरीट उज्ज्वल शशि-कला से निबद्ध है, जिनके स्तन पीन और उच्च हैं तथा जो चार कर-कमलों में तत्त्व-मुद्रा, अक्ष- माला, अमृत-पूर्ण कलश और विद्या धारण किए हैं; उन्हीं शुक्ल-वर्णा, त्रिनयना वाग्-देवता का मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ (११२)। इस प्रकार मातृका देवी का ध्यान कर षट्-चक्रों में मातृका-न्यास करे। कुल-साधक भ्रू-मध्य में 'ह' 'क्ष' इन दो वर्णों का, कण्ठ-स्थित पद्म में अकार से विसर्ग तक के १६ स्वरों का और हृत्पद्म में 'क' से 'ठ' तक के वर्णों का न्यास कर नाभि-देश में 'ड' से 'फ' तक, लिङ्ग-मूल में वर्गीय 'ब' से 'ल' तक और चतुर्दल मूलाधार- चक्र में अन्तःस्थ 'व' से 'स' तक के वर्णों का न्यास करे। इस प्रकार अन्तर में मातृका-वर्णों का न्यास कर बहिर्देश में भी इन मातृका-वर्णों का न्यास करे (११३-११५)। ललाट, मुख, नेत्र-द्वय, कर्ण-द्वय, नासिका-द्वय, गण्ड-द्वय, ओष्ठ, अधर, उभय दन्त-पंक्ति, मस्तक, मुख- विवर, बाहु-द्वय की सन्धि और अग्र भाग, पद-द्वय की सन्धि और अग्र भाग, पार्श्व-द्वय, पृष्ठ, नाभि, उदर, हृदय, स्कन्ध-द्वय, ककुद, हृदय से दक्षिण बाहु, हृदय से वाम बाहु, हृदय से दक्षिण पद, हृदय से वाम पद, फिर हृदय से जठर और हृदय से मुख—इन सभी स्थानों में क्रमशः सभी मातृका-वर्णों का न्यास करे। इसी प्रकार वर्ण-न्यास कर प्राणायाम करे (११६-११८)। यथा— माया-बीज (ह्रीं) का १६ बार जप करते हुए बाईं नासा से खींची हुई वायु से अपने शरीर को पूर्ण करे। दाएँ हाथ की कनिष्ठा, अनामिका और अंगुष्ठ से दोनों नासा-पुटों को बन्द कर ६४ बार जप करते हुए कुम्भक करे (११६)। फिर अंगुष्ठ को छोड़कर केवल दो अँगुलियों से बाईं नासा को बन्द कर ३२ बार जप करते हुए दाईं नासा से धीरे-धीरे वायु निकाल दे (१२०)। तीन बार यह क्रिया करना ही प्राणायाम कहा जाता है। इस प्रकार प्राणायाम कर ऋषि-न्यास करे (१२१)। ब्रह्मा और ब्रह्मर्षि-गण इस मन्त्र के ऋषि हैं। गायत्री आदि इसके छन्द हैं। आद्या काली इसकी देवता हैं (१२२)। 'क्रीं' इसका बीज, आद्या माया 'ह्रीं' इसकी शक्ति, कमला 'श्रीं' इसका कीलक है। इनका न्यास क्रमशः शिर, मुख, हृदय, गुह्य, दोनों चरणों व सर्वाङ्ग में करना है (१२३)। मूल-मन्त्र का पाठ करते हुए दोनों हाथों से चरणों से लेकर मस्तक तक और मस्तक से लेकर चरणों तक सात या तीन बार न्यास करे। यह 'व्यापक न्यास' है, जो यथोक्त फल देने में समर्थ है (१२४)। मूल-मन्त्र के आद्य अक्षर में जो बीज होगा, उसमें क्रमशः आ, ई इत्यादि को जोड़कर अथवा उसके न होने से अंग-शुद्ध बीज द्वारा अंग-न्यास करे (१२५)। दोनों अँगूठों, दोनों तर्जनियों, दोनों मध्यमाओं, दोनों अनामिकाओं, दोनों कनिष्ठाओं और कर-तल तथा कर-पृष्ठ में क्रमशः 'नमः, स्वाहा, वषट्, हूँ, वौषट्, फट्' मन्त्र कहे हैं। आदि में हृदय में 'नमः', मस्तक में वह्नि-वल्लभा-'स्वाहा', शिखा में 'वषट्', दोनों कवचों में 'हूं'—ये मन्त्र कहे (१२६)। दोनों नेत्र में 'वौषट्' और करतल तथा कर- पृष्ठ इन दोनों में 'फट्' कहे। सुधी व्यक्ति क्रमशः इस प्रकार षडङ्ग-न्यास कर पीठ-न्यास करे (१२७)। यथा— वीर साधक अपने हृत्पद्म में आधार-शक्ति, कूर्म, अनन्त, पृथ्वी, सुधाम्बुधि, मणि-द्वीप, पारिजात तरु, चिन्ता-मणि गृह, मणि-माणिक्य-वेदिका और उस पर स्थित पद्मासन—इन सबका न्यास करे (१२८-१३०)। दक्षिण स्कन्ध में, वाम स्कन्ध में, वाम कटि में, दक्षिण कटि में धर्म, ज्ञान, ऐश्वर्य और वैराग्य का क्रमशः न्यास करे (१३१)। उत्तम साधक मुख में, वाम पार्श्व में, नाभि में, दक्षिण पार्श्व में नञ्-पूर्वक उक्त धर्मादि (अर्थात् अधर्म, अज्ञान, अनैश्वर्य और अवैराग्य) का यथा-क्रम न्यास करे (१३२)। फिर हृदय में आनन्द-कन्द, सूर्य, सोम, अग्नि और आद्याक्षर में अनुस्वार जोड़कर सत्व, रज, तम—इन सबका कर्णिका में न्यास कर हृत्पद्म के