महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)
Mahanirvana Tantra with Hindi Translation
शिव-पार्वती संवाद द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८ | हिन्दी महा-निर्वाण तन्त्र सभी पत्रों (दलों-पंखुड़ियों) में पीठ-नायिकाओं का न्यास करे (१३३)। अष्ट-नायिकाओं के नाम हैं—मंगला, विजया, भद्रा, जयन्ती, अपराजिता, नन्दिनी, नारसिंही, वैष्णवी (१३४)। असितांग, रुरु, चण्ड, क्रोधोन्मत्त, भयङ्कर, कपाली, भीषण और संहारी—इन अष्ट भैरवों का न्यास अष्ट-दल पद्म के प्रत्येक दल के अग्र भाग में करे। फिर प्राणायाम करे (१३५)। इसके बाद कच्छप-मुद्रा बनाए हुए करतल में गन्ध-पुष्प लेकर हृदय पर दोनों हाथ रखकर सनातनी देवी का ध्यान करे (१३६)। ध्यान दो प्रकार के हैं—सरूप और अरूप अर्थात् साकार और निराकार। सरूप अर्थात् साकार, अरूप अर्थात् निराकार। इस प्रकार विषय-भेद से ध्यान दो प्रकार के कहे गए हैं। तुम्हारा निराकार-विषयक जो ध्यान है, वह वाक्य और मन के अगोचर है अतः अव्यक्त, सर्व-व्यापी यह रूप साधारण लोगों के लिए दुर्ज्ञेय, उपदेश से परे और बड़े कष्ट एवं बड़ी समाधि द्वारा केवल योगियों को ज्ञेय है (१३७-१३८)। इस समय मन की धारणा योग्य, शीघ्र अभीष्ट सिद्धि-दायक एवं सूक्ष्म ध्यान अर्थात् निराकार ध्यान के प्रबोध के लिए तुम्हारा स्थूल ध्यान कहता हूँ (१३६)। वस्तुतः निराकार, काल-जननी, महा-द्युति कालिका के गुण-क्रियानुसार उनकी रूप-कल्पना की जाती है (१४०)। यथा— मेघाङ्गीं शशि-शेखरां त्रि-नयनां रक्ताम्बरं विभ्रतीम्। पाणिभ्यामभयं वरं च विलसद् रक्तारविन्द-स्थिताम् ॥ नृत्यन्तं पुरतो निपीय मधुरं माध्वीक-मद्यं महा- कालं वीक्ष्य विकासितानन-वरामाद्यां भजे कालिकाम् ॥ अर्थात् जिनका वर्ण मेघ के समान है, जिनके ललाट पर चन्द्र-लेखा है, जो त्रि-नयना हैं, जो रक्त-वस्त्र धारण किए हैं, जो दो हाथों से वर और अभय दे रही हैं, जो खिलते हुए लाल कमल पर विराजमान हैं, मधूक- पुष्प से निर्मित मधुर मद्य का पान कर सम्मुख नाचते हुए महा-काल को देखकर जिनका मुख प्रफुल्ल हो उठा है, उन महा-कालिका का मैं भजन करता हूँ (१४१)। साधक अपने सिर पर फूल रख कर उक्त प्रकार ध्यान कर परम भक्ति के साथ मानसोपचार से उनकी पूजा करे (१४२)। यथा— आसन-रूप में हृदय-कमल को प्रदान करे। सहस्र-दल-कमल से निकलते हुए अमृत द्वारा दोनों चरणों में पाद्य अर्पित करे। मन को अर्घ्य करके निवेदन करे (१४३)। उसी अर्थात् सहस्र-दल-कमल से निकले अमृत द्वारा ही आचमनीय और स्नानीय जल प्रदान करे। वस्त्र-रूप में आकाश-तत्त्व और गन्ध रूप में गन्ध-तत्त्व की कल्पना करे (१४४)। चित्त को पुष्प-रूप में भावना करे। पञ्च-प्राणों को धूप-स्वरूप कल्पना करे। दीप के स्थान पर तेजस्तत्त्व, सुधाम्बुधि को नैवेद्य-रूप में, अनाहत-ध्वनि को घण्टा-ध्वनि के रूप में और वायु- तत्त्व को चामर तथा इन्द्रियों के समस्त कार्यों एवं मन की चंचलता को नृत्य-रूप में भावना करे (१४५-१४६)। अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिए विविध प्रकार के पुष्प देवी को प्रदान करे। माया-राहित्य, अहङ्कार का अभाव, राग-राहित्य, मद-राहित्य, मोह-राहित्य, दम्भ-राहित्य, द्वेष-राहित्य, क्षोभ-राहित्य, मात्सर्य-राहित्य, लोभ-राहित्य—ये दस विषय ही पुष्प कहे गए हैं (१४७-१४८)।