भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 139 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 38

पाँचवां उल्लास : कलश-स्थापन और तत्त्व-संस्कार । २६ इसके बाद अहिंसा-रूप परम पुष्प, इन्द्रिय-निग्रह-रूप पुष्प, दया-रूप पुष्प, क्षमा-रूप पुष्प और ज्ञान-रूप पुष्प—ये पाँच पुष्प प्रदान करे (१४६) । इस प्रकार पन्द्रह भाव-रूप पुष्पों से पूजा करे। फिर सुधा-सागर, मांस-पर्वत, भर्जित-मत्स्य का पर्वत अर्थात् प्रभूत मत्स्य, मांस, मुद्रा की राशि, उत्तम अन्न, घृताक्त पायस, कुलामृत अर्थात् शक्ति-घटित अमृत-विशेष, स्त्री-पुष्प और पीठ-क्षालन-वारि और स्त्रियों के अंग-विशेष का प्रक्षालन-जल मन-ही-मन देवी को देता हुआ विघ्न-कारक काम और क्रोध की बलि देकर जप आरम्भ करे। कुण्डली-सूत्र में गुथी हुई माला को जप-माला कहा है (१५०-१५२) । यथा— पहले विन्दु-सहित अकार से लेकर अन्तिम लकार तक के वर्णों का उच्चारण कर मूल-मन्त्र का उच्चारण करे। यह जप—'अं ह्रीं क्रीं परमेश्वर्यै स्वाहा, आं ह्रीं क्रीं' इत्यादि क्रम से करने से अनुलोम जप कहा जाता है (१५३) । फिर विन्दु-युक्त लकार से अकारतक एवं प्रत्येक वर्ग के एक-एक वर्ण को लेकर आठ वर्णों को विन्दु- युक्त जप करने से विलोम जप कहा जाता है। 'क्ष'—मेरु-स्वरूप है (१५४) । तदनन्तर 'अष्ट-वर्गों के अर्थात् स्वर-वर्ण, ककारादि पञ्च, चकारादि पञ्च, टवर्ग-तवर्ग-पवर्ग के पञ्च-पञ्च वर्ण, यकारादि चार वर्ण, शकारादि पंच-वर्ण के अन्तिम वर्ण के साथ मूल-मन्त्र को योग कर एक सौ आठ बार जप कर निम्न मन्त्र से जप को समर्पित करे (१५५-५६)— सर्वान्तरात्म-निलये स्वान्तर्ज्योतिः-स्वरूपिणि ! गृहाणान्तर्जपं मात्राद्ये कालि ! नमोऽस्तु ते ॥ अर्थात् हे सर्वान्तःकरण-वासिनि ! हे अन्तरात्म-ज्योति-स्वरूपे ! हे मात: ! हे आद्ये कालिके ! तुमको प्रणाम करता हूँ। मेरे इस मानस जप को ग्रहण करो। इस प्रकार जप समर्पित कर मन-ही-मन भगवती को साष्टांग प्रणाम करे। अब बाह्य पूजा आरम्भ करे (१५७) । पहले विशेषार्घ्य का संस्कार बताता हूँ, सुनो। जिसके स्थापन मात्र से देवता प्रसन्न होता है (१५८), ब्रह्मा आदि देव-गण, योगिनी-गण और भैरव-गण अर्घ्य-पात्र का दर्शन कर नृत्य करने लगते हैं और प्रसन्न हृदय से सिद्धि प्रदान करते हैं (१५६) । अपनी बाईं ओर, सम्मुख स्थल पर, सामान्यार्घ्य के जल से एक त्रिकोण-मण्डल, उसके मध्य में माया-बीज 'ह्रीं', फिर त्रिकोण-मण्डल के बाहर एक गोलाकार मण्डल और उसके बाहर एक चतुष्कोण-मण्डल लिखे । (रेखाचित्र सं० १) इस पर 'ह्रीं आधार-शक्तये नमः' इस मन्त्र से आधार-शक्ति की पूजा करे (१६०-१६१) । फिर उक्त मण्डल के ऊपर धुला हुआ आधार स्थापित कर उसमें 'मं वह्नि-मण्डलाय दश-कलात्मने नमः' मन्त्र से पूजा कर 'फट्' मन्त्र से अर्घ्य-पात्र को धोकर उस आधार पर स्थापित करे (१६२-६३) । फिर 'अं अर्क-मण्डलाय द्वादश-कलात्मने नमः' से हे अम्बिके ! उस पात्र में पूजा करे। तदनन्तर मूल-मन्त्र से अर्घ्य-पात्र को पूरित करे (१६४) । साधक अर्घ्य-पात्र का तीन भाग मद्य से और शेष भाग जल से पूर्ण कर उसमें गन्ध-पुष्प छोड़े। फिर 'रक्षा-मन्त्र' से उसमें पूजा करे (१६५) । 'उं चन्द्र-मण्डलाय षोडश-कलात्मने नमः' से पूजा कर बिल्व-पत्र, रक्त चन्दन लगी हुई दूर्वा (दूब), पुष्प और आतप तण्डुल एकत्र कर उस पात्र के अग्र भाग में स्थापित करे (१६६-१६७) । तब मूलमन्त्र से उसमें तीर्थों का आवाहन कर देवी का ध्यान कर गन्ध-पुष्प से पूजन करे। फिर बारह बार मल-मन्त्र का जप करे (१६८) । इसके बाद साधक धेनु और योनि मुद्राँ दिखाकर धूप-दीप दिखावे।